पैसा कहाँ से लायेगी सरकार (7-मई-13)
संप्रग सुप्रीमो सोनिया गाँधी के महत्वाकांक्षी योजना वाला खाद्य सुरक्षा विधेयक तमाम खीँच-तान के बीच आखिरकार लोकसभा में पेश कर ही दिया गया ! सोनिया गाँधी का महत्वाकांक्षी विधेयक होने के कारण इस विधेयक को लेकर सरकार की साख दाँव पर लगी हुई है ! दरअसल, इस विधेयक के तहत जो प्रावधान रखे गए हैं उनको लेकर सरकार के ही कई सहयोगियों द्वारा आपत्ति जताए जाने के कारण यह विधेयक अभी तक सदन पटल पर नहीं रखा जा सका था ! सरकार की तरफ से इस विधेयक को लेकर आम सहमति बनाने की कोई कोशिश छोड़ी नहीं गयी ! लोकसभा में संख्याबल के हिसाब से अगर खाद्य सुरक्षा विधेयक के पास होने की गुंजाइशों का आकलन करें तो इस विधेयक के पास होने में कोई खास अडचन नहीं नजर आ रही !क्योंकि इस विधेयक पर सरकार द्वारा यूपीए की अंदरूनी असहमतियों को सुलझाने का हर संभव उपाय किये जाने के बाद ही इसे सदन के पटल पर रखा गया है ! विपक्ष के तमाम विरोधों के बावजूद यह विधेयक पास होता दिख रहा है ! अत: आज जब खाद्य सुरक्षा विधेयक के पास होने की संभावना ज्यादा बनती नजर आ रही है तो इस बात पर जरुर बहस होनी चाहिए कि क्या वाकई सोनिया गाँधी का यह महत्वाकाक्षी विधेयक अपने उद्देश्यों में शत-प्रतिशत कामयाब हो पायेगा या इसका भी हश्र मनरेगा की तरह ही होगा ! खाद्य सुरक्षा विधेयक में निहित प्रावधानों के तहत यह तय किया गया है कि गरीबी में जीवन यापन कर रहे प्रत्येक व्यक्ति को पाँच किलों अनाज सस्ते दर पर प्राप्त करने का अधिकार होगा ! हालाकि अन्त्योदय अन्न योजना के अंतर्गत आने वाल लगभग ढाई करोंड़ गरीब परिवारों को प्रत्येक महीने 35 किलोग्राम अनाज पाने की अहर्ता है ! खाद्य सुरक्षा विधेयक को अगर कानूनी जामा पहनाने में सरकार कामयाब हो जाती है तो सरकार के सामने कई चुनौतियाँ भी आयेंगी जिनपर अभी तक सरकार द्वारा कुछ विशेष योजना नहीं तैयार की गयी है ! खाद्य सुरक्षा विधेयक लागू होते ही छ: करोंड़ बारह लाख टन खाद्यान की जरुरत पडने के अलावा लगभग 20,000 करोंड़ रुपये का सब्सिडी बोझ पड़ना लगभग तय है ! लिहाजा सरकार के सामने बड़ी चुनौती यह है कि महंगे दर पर खाद्यान खरीदकर सस्ते दर पर उपलब्ध कराने के इस आर्थिक जोखिम की भारपाई कैसे की जायेगी ! इस बावत गौर करने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि पहले से ही आर्थिक सुधारों का हवाला देकर रसोई गैंस आदि से सब्सिडी हटाने वाली यूपीए सरकार किस आधार पर सब्सिडी के इस नए बोझ का जोखिम उठाने को तैयार दिख रही है ! सरकार द्वारा प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक के तहत दी जाने वाली सस्ते अनाज की गारंटी को लेकर अनाज के उत्पादन एवं उसके रख-रखाव के लिए खाद्द्यान्नो के भंडारण आदि पर गंभीरता से विचार किये बिना अगर यह महत्वाकांक्षी विधेयक लाया जाता है तो इसके सफल होने की संभावना पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा होता नजर आ रहा है ! मौसम के बदलते मिजाज एवं अनाज उत्पादन में पड़ते इस अप्रत्यशित मौसम के प्रभावों से खाद्य सुरक्षा विधेयक को अलग रखकर नहीं देखा जा सकता है ! अगर किसी साल सुखा आदि पड़ जाय और अनाज उत्पादन में भारी कमी आ जाए जैसा कि हाल ही महाराष्ट्र में देखा गया है तो ऐसे में सरकार के सामने अनाज उपलब्ध कराने का बड़ा संकट उत्पन्न हो जाएगा ! ऐसे हालातों में हमारे वर्तमान खाद्यान्न भण्डारण के भरोसे सरकार द्वारा जरुरत के अनुरूप अनाज उपलब्ध कराया जा सकेगा ऐसा कहना ख्याली-पुलाव पकाने से ज्यादा कुछ भी नहीं है ! भारत में अनाज भण्डारण की स्थिति अत्यंत ही दयनीय है जिसपर केन्द्र एवं राज्य दोनों ही सरकारों द्वारा हीला-हवाली कई सालों से देखी जा रही है ! अत: एक बात तो साफ़ तौर पर कही जा सकती है कि खाद्यान्नों के उत्पादन एवं उनके रख-रखाव के साथ-साथ भण्डारण सम्बंधित अन्य बिंदुओं को समझे बिना इस बात के प्रति आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक अपने उद्देश्यों में कारगर हो सकता है ! 1970 में हुई हरित क्रान्ति के बाद अनाज उत्पादन के क्षेत्र में हुए व्यापक बदलावों को अगर आंकड़ों के ग्राफ पर समझने का प्रयास करें तो यह स्पष्ट होता है कि अनाज उत्पादन में साल दर साल हुई बढोत्तरी के अनुपात में उसके रख-रखाव एवं भंडारण के इंतजाम नहीं किये गए !परिणामत: लाखों टन अनाज प्रत्येक साल बारिश की भेंट चढ़ सड़ जाता है !
सवाल यही है कि एक तरफ तो सरकार कई जरूरी वस्तुओं में सामान रूप से सब्सिडी हटा रही है तो वहीँ दूसरी तरफ सस्ता अनाज उपलब्ध कराने के नाम पर सब्सिडी का बोझ झेलने को तैयार दिख रही है ! सरकार की यह दोहरी नीति इस बात की द्दोतक है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक के नाम पर सरकार की नीयत महज अपना आगामी चुनावी हित साधने की है ! इसमें कोई दो राय नहीं है कि अगर सही नीति निर्माण और तमाम बिंदुओं पर विचार किये बिना यह विधेयक क़ानून का रूप लेता है तो मनरेगा की तरह इसे भी भ्रष्टाचार का बड़ा गढ़ बनते देर नहीं लगेगी ! इस विधेयक के कारण देश पर पडने वाले आर्थिक बोझ को हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि देश का आम नागरिक आर्थिक सुधारों के नाम पर बढ़ती महंगाई की मार पहले से ही झेल रहा है !
शिवानन्द द्विवेदी सहर

