(फेसबुक से लेकर जनसत्ता तक प्रेमचंद पर उठे विमर्श के बाद लिखा गया मेरा अपना विचार)  |
| राष्ट्रीय सहारा से |
विगत 31 जुलाई को हिंदी साहित्य इतिहास के सबसे बड़े कथाकार प्रेमचंद के जन्मदिवस पर हंस पत्रिका की तरफ से प्रतिबन्ध और अभिव्यक्ति विषय पर संघोष्ठी का आयोजन था ! आयोजन में बतौर मुख्य वक्ता माओवादी विचारधारा के वामपंथी लेखक वरवरा राव एवं अरुंधती राय के अलावा लेखक एवं साहित्यकार अशोक वाजपेयी सहित दक्षिणपंथी धारा के गोविंदाचार्य भी आमंत्रित थे ! वक्ताओं के लिहाज से देखें तो आयोजक के रूप में हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने शायद इस बार के आयोजन में प्रेमचंद को याद करने के बहाने उस विमर्श को भी टटोलने का प्रयास किया जिसमे प्रेमचंद को अपने पंथ का साबित करने की होड़ ना जाने किस-किस पंथ के लोगों में मची हुई है ! ये सच है कि साहित्य इतिहास के ख्यातिलब्ध विभूतियों पर अपना वैचारिक अधिपत्य साबित करने का कु-चलन वर्तमान में तेजी से विकसित हुआ है एवं इस कुरीति के दंश ने महान पंथनिरपेक्ष कथाकार प्रेमचंद को भी नहीं बख्सा है ! अलग-अलग पंथ के विद्द्वानों द्वारा यह साबित करने का हर संभव प्रयास किया जाता रहा है कि प्रेमचंद का वैचारिक झुकाव उनके अपने पंथ की तरफ था ! प्रेमचंद को लेकर वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ की बहस तो बहुत पहले से चलती आ रही है ! बेशक इस बहस का निष्कर्ष अब तक कुछ नहीं निकला हो लेकिन दोनों ही पंथ के लोग प्रेमचंद के कृतियों से अपने हिस्से की सामग्री ढूढ कर यह साबित करते रहे हैं कि प्रेमचंद उनके अपने पंथ के लेखक थे और उनपर सिर्फ उनका ही अधिकार है ! प्रेमचंद को लेकर वामपंथी धड़ा उन्हें धुर वामपंथी मानता है जबकि दक्षिण झुकाव वाले बुद्धिजीवी उन्हें धुर राष्ट्रवादी लेखक मानते हैं ! वर्तमान बुद्धिजीवियों के विचारों से इतर अगर प्रेमचंद को तलाशने के लिए साहित्य के इतिहास के पन्नों को पलटे तो स्थिति कुछ और ही नजर आती है ! इतिहास के पृष्ठ कुछ यूँ बयां करते हैं कि मानो प्रेमचंद ना तो वामपंथी थे और ना ही दक्षिण से ही उनका कोई सरोकार था ! वो निहायत पंथनिरपेक्ष लेखक थे और निरपेक्ष लेखन करते रहे ! प्रेमचंद के बारे में लिखते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार-व्यवहार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख और सूझ-बूझ को जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता ! सही अर्थों में अगर बिना किसी आग्रह से ग्रसित हुए देखा जाय तो प्रेमचंद सामाजिक सरोकारों के लेखक नजर आते हैं, जिनपर किसी पंथ की बजाय तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों का प्रभाव ज्यादा था ! प्रेमचंद के कहानियों एवं उपन्यासों में शोषित वर्ग की पीड़ा को बखूबी दिखाया गया है ! चुकि प्रेमचंद की लगभग हर कृति शोषित वर्ग को शोषक सत्ता के खिलाफ आंदोलित करती नजर आती है जिसके आधार पर तमाम बुद्धिजीवी उन्हें वामपंथी धारा का लेखक करार देते हैं ! लेकिन महज इस आधार पर प्रेमचंद को वामपंथी करार देना कतई उचित नहीं है ! प्रेमचंद के बारे में अगर ठीक से देखा जाय तो वे कई पहलुओं पर महात्मा गाँधी के अहिंसक विचारों के समर्थक नजर आते हैं तो कई जगह उनकी लेखनी में राष्ट्रप्रेम के भी दर्शन होते हैं ! प्रेमचंद द्वारा राष्ट्र को खारिज करके किसी वर्गसंघर्ष की हिमायत की गयी हों ऐसा उनकी कृतियों में नहीं मिलता है ! गाँधी के अहिंसावाद का दर्शन उनके लगभग हर उपन्यास में देखने को मिल सकता है ! कर्मभूमि उपन्यास तो पूरी तरह से गाँधी सिद्दांतों को पुष्ट करती कालजयी कृति है ! अपने उपन्यासों एवं कथानकों के माध्यम से प्रेमचंद ने ना सिर्फ तत्कालीन भारत के निम्न शोषित वर्ग की दशा को दिखाया है बल्कि गुलाम भारत के जमीदारों एवं सरकारी मुलाजिमो की मजबूरियों को भी पूरी इमानदारी के साथ चित्रित किया है ! प्रेमचंद के उपन्यास प्रेमाश्रम पर नजर डालें तो इस उपन्यास के माध्यम से प्रेमचंद ना सिर्फ मजदुर वर्ग के एकजुट होने की बात करते हैं बल्कि कथाभाव से स्पष्ट होता है कि वो समूचे भारतीय समाज जिसमे निम्न और उच्च दोनों वर्ग आते हैं,को एकजुट होकर अंग्रेजी हुकुमत के दमन के खिलाफ आंदोलित करते हैं ! चाहें मजदुर वर्ग के प्रति चिंता हो अथवा तत्कालीन भारतीय समाज में स्त्रियों की दशा का चित्रण हो, प्रेमचंद के उपन्यासों एवं कहानियों में इनका बखूबी दर्शन संभव है ! प्रेमचंद द्वारा की गयी कृति प्रतिज्ञा तत्कालीन भारतीय समाज में फैले विधवा विवाह निषेध की कुप्रथा के जड़ों पर सीधा चोट करती है ! निश्चित तौर पर प्रेमचंद की लेखनी में स्त्री संघर्षों पर भी काफी प्रकाश डाला गया है ! दरअसल शोषित समाज पर ज्यादा लिखने की वजह से वामपंथी आग्रह से ग्रसित बुद्धिजीवियों को ऐसा लगता है कि प्रेमचंद वामपंथी लेखक थे ! बेशक प्रेमचंद पर मार्क्स के विचारों अथवा रूस की क्रान्ति का अंशत: प्रभाव रहा हो लेकिन केवल इसी आधार पर उन्हें वाम विचारों का लेखक घोषित करना कुतर्क के सिवाय कुछ भी नहीं है ! मार्क्स ने विश्व के मजदूरों को एकजुट कर सरहदों को पाटने का ऐलान किया था लेकिन इसके ठीक उलट प्रेमचंद का मजदुर अपनी सरहद को बचाने की लड़ाई लड़ता नजर आता है ! प्रेमचंद का मजदुर कहीं ना कहीं मार्क्स उस मजदुर को सिरे से खारिज करता है जो सरहदों को तोड़ कर अंतर्राष्ट्रवाद की पहल में संघर्षरत है ! मार्क्स और प्रेमचंद के इसी विरोधाभाष के कारण राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी कहीं ना कहीं उनमे राष्ट्रवाद की संभावनाएं तलाश लेते हैं और उन्हें राष्ट्रवादी बताते नजर आते है ! अगर बारीकी से देखें तो प्रेमचंद की कृतियों में कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक खुद अपने पात्रों के साथ वैचारिक संघर्ष कर रहा हो ! प्रेमचंद की कृतियों का कोई एक पात्र अगर हिंसा की हिमायत करता है तो दूसरा पात्र उसे गलत ठहराते हुए उसे हिंसा से रोकता है ! यह दूसरा पात्र ही प्रेमचंद की मूल विचारधारा का परिचायक है ! बहुआयामी नजरिये से अगर बिना किसी आग्रह से ग्रसित हुए निष्पक्ष तरीके से प्रेमचंद का मूल्यांकन करें तो प्रेमचंद ना तो धुर वामपंथी नजर आते हैं ना ही धुर राष्टवादी ही दिखते है ! प्रेमचंद की लेखनी में बहु विचारों के दर्शन आसानी से उपलब्ध हैं ! बतौर लेखक प्रेमचंद अगर तमाम अलग-अलग विचारधाराओं को सहजता से स्वीकार लेते हैं तो वहीँ दूसरी तरफ उन्ही विचारधाराओं के जड़ पड़ गए सिद्धांतों को बेहिचक खारिज भी करते नजर आते हैं ! सही मायनों में देखा जाय तो प्रेमचंद ना तो वामपंथी थे ना ही धुर राष्ट्रवादी ही थे और ना ही किसी एक आग्रह से ग्रसित ही थे ! प्रेमचंद का शुरू से ही गांधीवाद के प्रति रुझान रहा और उनकी लेखनी देश के लिए समाज को एकजुट करने वाली रही है ! प्रेमचन्द की लेखनी के यही तेवर उनको एक पंथ निरपेक्ष लेखक के रूप में स्थापित करते हैं !
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