- शिवानन्द द्विवेदी सहर
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| राष्ट्रीय सहारा |
साहित्य की आम धारणाओं के अनुसार किसी भी भाषा में लिखी गयी लिपिबद्ध सामग्री को किसी दूसरी भाषा में ज्यों का त्यों बिना उसके मूल तथ्यों से छेड़-छाड़ किये लिखा जाना ही अनुवाद-कर्म कहलाता है ! अनुवाद-कर्म के संदर्भ में यह आम धारणा जितनी सहज और सपाट नजर आती है वास्तविकता के धरातल पर इसके मायने उतने ही बहुआयामी हैं ! अनुवाद-कर्म का दायरा सिर्फ साहित्य की तमाम विधाओं और बहु-भाषाओं में अनुवादक की निपुणता तक सीमित नहीं है ! वास्तविक तौर पर अगर देखा जाय तो अनुवाद-कर्म एक राष्ट्रीय कर्म है जो कभी एक राष्ट्र की संस्कृति को दूसरे राष्ट्र की संस्कृति से जोड़ने का काम करता है तो कभी एक समाज को दूसरे समाज के साथ जुडने के लिए प्रेरित करता है ! सीधे-सपाट शब्दों में अगर कहा जाय तो संकुचित और शिथिल पड़े साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संपदाओं को विस्तार देने का एकमात्र माध्यम अनुवाद ही है ! साहित्य में सृजन और रचनाकर्म के समानांतर या उससे एक कदम आगे बढ़कर ही अनुवाद की भूमिका है ! सृजन महज किसी रचना अथवा कृति को मूर्त रूप देता है जबकि अनुवाद की भूमिका उस सृजन और बहु-संस्कृतियों के बीच समन्वय-सेतु बनकर उस रचनाकर्म को गतिशील बनाने की होती है ! भारतीय साहित्य के संदर्भ में अगर वर्तमान अनुवाद-कर्म का मूल्यांकन किया जाय तो स्थिति उतनी संतुष्टिपरक नहीं नजर आती जितनी की जरुरत है ! ऐतिहासिक रूप साहित्य और सृजन की दिशा में अनुवाद और अनुवादक दोनों ही आदिकाल से ही प्रासंगिक रहे हैं ! अनुवादक एक प्रकार का भाषाई दूत होता है जो अपने प्रयासों से किसी एक भौगोलिक चारदीवारी में सिमटती साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सम्पदा को भूगोल की सीमा से बाहर ले जाते हुए अन्य संस्कृतियों से रूबरू कराता है ! अनुवाद और अनुवादक की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कालजयी कृति मधुशाला के रचयिता डा. हरिवंश राय बच्चन कहते हैं “अनुवाद एक भाषा का दूसरे भाषा की तरफ बढ़ाया गया मैत्री का हाथ होता है ! मैत्री का यह हाथ अधिकतम जितनी बार और जितनी दिशाओं में संभव हो सके बढ़ाया जाना चाहिए !” अनुवाद कोई साहित्य के आधुनिक काल में खोजी गयी कला नहीं है बल्कि यह आदि काल से सामाजिक जरुरत के रूप में चली आ रही प्रथा है ! बेशक समय के साथ-साथ साहित्य के तमामों कालों का प्रभाव अनुवाद-कर्म पर पड़ता रहा हो लेकिन अनुवाद का इतिहास तो हजारों वर्ष पुराना ही नजर आता है ! अनुवाद-कर्म के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर अगर नजर डाले तो आज के लगभग डेढ़ दशक पूर्व चौथी शताब्दी के अंतिम दौर में चीनी यात्री फाहियान द्वारा लगभग पच्चीस वर्षों तक भारत भ्रमण कर साहित्यिक संपदाओं का संकलन तैयार किया गया ! तत्कालीन दौर में हिंदी नामक कोई भाषा वजूद में नहीं थी और लगभग सभी ख्यातिलब्ध साहित्यिक सामग्री संस्कृत में उपलब्ध थी ! अत: फाहियान ने भारत यात्रा के दौरान संस्कृत व्याकरण का गहन अध्यन किया एवं यहाँ से कई पुस्तकों का संकलन लेकर चीन वापस लौटा जहाँ उसका चीनी भाषाओं में अनुवाद किया गया ! ऐसी मान्यता है कि अनुवाद-कर्म के मामले में चीन का इतिहास भारत से ज्यादा समृद्ध रहा है और चीनी यात्रियों ने दुनिया के हर कोने से लाये गए विभिन्न भौगोलिक संस्कृतियों का अनुवाद किया है ! अनुवाद के इतिहास का पहिया कभी जड़ नहीं रहा है बल्कि सदा ही गतिशील रहा है ! संस्कृत से चीनी भाषाओं में अनुवादित सामग्री सातवीं शताब्दी के शुरुआत में ही जापान पहुँच चुकी थी और उसका जापानी भाषाओं में अनुवाद भी किया जा चुका था ! अनुवाद का इतिहास कम से कम इतना तो जरुर बता पाने में सक्षम होता है कि अनुवाद-कर्म कोई साहित्य की नई-नवेली विधा नहीं बल्कि साहित्य की सबसे पुरानी रीतियों में से एक है !
साहित्य और संस्कृति के समृद्ध होने में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका पर तो कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता ! लेकिन सवाल की सुई भारतीय बहुभाषाई साहित्यिक सम्पदा में अनुवाद-कर्म की जड़ता पर जरुर उठते रहे हैं ! सांस्कृतिक एवं भाषाई पृष्ठिभूमि के नजरिये से भारत एक बहुभाषाई भूगोल में फैला देश है ! सांस्कृतिक एवं भाषाई विविधताओं के बीच अनुवाद-कर्म के प्रति हमारा रुझान किस स्तर का है इसका मूल्यांकन अवश्य किया जाना चाहिए ! बड़ा सवाल ये है अनुवाद-कर्म के माध्यम से दुनिया को अपनी सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संपदा उपलब्ध कराने वाला भारत क्या आंतरिक भाषाओं के बीच अनुवाद को उतना महत्व दे रहा है जितना कि वाकई दिया जाना अत्यंत जरूरी है ? साहित्य एकादमी के अध्यक्ष एवं प्रख्यात साहित्यकार विश्वनाथ तिवारी ने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा “हमें समस्त चौबीस भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाने पर काम करना होगा ! सभी चौबीस भाषाओं के बीच आपसी समरसता एवं सामंजस्य को बिठाए बिना अगर हम किसी एक भाषा को ही ढोने लगेंगे तो कहीं ना कहीं हम अपनी सम्पूर्ण साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संपदाओं को दुनिया के सामने नहीं रख पायेंगे !” डा. विश्वनाथ तिवारी के इन वक्तव्यों के मायनों को गहराई से समझने की जरुरत है ! भाषाओं को आधारभूत मानकर पचास के दशक में हुए राज्यों के गठन ने देश में भाषाई वैमनष्य की भावना को बल दिया जिसके परिणाम स्वरुप भारतीय भाषाएँ ही एक दूसरे से जुडने की बजाय दूर होती गयीं ! अनुवाद-कर्म के मामले में जितना काम हिंदी साहित्य के अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद पर हुआ है उसका दशांश भी भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर अनुवाद पर नहीं हुआ है ! भारत की तमाम भाषाओं में सृजित साहित्य का अनुवाद भारतीय भाषाओं में ही ना हो पाने का परिणाम है कि हम दक्षिण से उत्तर तक एक सार्वभौमिक संस्कृति स्थापित करने में नाकाम रहें हैं ! आंतरिक भाषाई द्वेष ने अनुवाद-क्रम को प्रभावित किया तो वहीँ अनुवाद ना होने के कारण सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी ना के बराबर रहा ! विविधताओं वाले इस देश में जहाँ दो दर्जन से ज्यादा भाषाएँ अपने साहित्यिक समृद्धि एवं संपदाओं के साथ अलग-अलग भौगोलिक दायरों में बंटी हुई हैं उसमे अनुवाद ही एकमात्र ऐसा माध्यम दिखता है जिसके द्वारा इस सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विषमता की गहरी होती खाई को पाटा जा सकता है ! भारतीय सांस्कृतिक विविधताओं में यह वक्तव्य बेहद सटीक एवं प्रासंगिक लगता है जिसमे डा. गोपीनाथन कहते हैं “भारत जैसे बहुभाषी लोगों के देश में अनुवाद की उपादेयता स्वयंसिद्ध है!”
इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रतिस्पर्धा के दौर में भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख मजबूत करनी है तो उसे अपनी सम्पूर्ण सांस्कृतिक उर्जा का प्रदर्शन करना होगा ! सम्पूर्ण सांस्कृतिक उर्जा का प्रदर्शन तभी संभव है जब भारत की समस्त साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सम्पदा का एकत्रीकरण किया जा सके ! चिंताजनक है कि जिस अनुवाद कर्म को हजारों साल पहले चीन और जापान जैसे देशों द्वारा पांचवी शताब्दी में दुनिया के साहित्यों के लिए इस्तेमाल किया गया उस अनुवाद-कर्म को भारत द्वारा अपने ही बिखरी पड़ी साहित्यिक संपदाओं को सहेजने के लिए अभी तक प्रयोग नहीं किया जा रहा है ! हालाकि इस दिशा में केंद्रीय ट्रांसलेशन ब्यूरो जैसी सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाएं काम कर रही हैं मगर अनुवाद में उन्मुक्त रचनाशीलता का अभाव अभी तक बना हुआ है ! साहित्य से सरोकार रखने वाला हर भाषाई जानकार अनुवाद-कर्म की बजाय स्व-सृजन की तरफ भागता नजर आ रहा है ! समकालीन वर्तमान साहित्यकारों में सृजनशीलता के अनुपात में अनुवाद-कर्म के प्रति आकर्षण बहुत कम देखने को मिल रहा है !

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