- शिवानन्द द्विवेदी सहर
बीस करोंड़ से ज्यादा लोगों द्वारा बोली एवं समझी जाने वाली भाषा भोजपुरी को लेकर अभी भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि भोजपुरी एक स्वतंत्र भाषा है अथवा हिन्दी बोली है ! हालाकि इस विमर्श पर तबतक विराम लगता नहीं दिख रहा जबतक भोजपुरी को संविधान की आठवी अनुसूची में जगह ना मिल जाए ! भोजपुरी भाषा बन पाए अथवा नहीं, इसमें रोजगार की संभावना हो अथवा नहीं, इस भाषा में पढ़ाई हो अथवा नहीं, लेकिन दो ऐसी बाते हैं इस भाषा में जिसके कारण यह भाषा हमेशा चर्चा में रहती है ! भोजपुरी अपने सैकड़ों साल पुरानी संपदा के कारण बेशक आज चर्चा में ना हो लेकिन अपने सम्मान समारोहों एवं सियासत की वजह से खूब चर्चा में रहती है ! अगर पिछला रिकोर्ड उठा कर देखा जाय तो भोजपुरी के नाम पर पिछले कुछ सालों में जितने सम्मान थोक की मात्रा में लिए और दिये गए हैं,उतने सम्मान कहीं और नहीं दिये गए होंगे ! हाल ही के एक वाकये में बिहार भोजपुरी एकादमी की तरफ से सम्मान देने का चलन शुरू किया गया जिसमे भोजपुरी गायक भरत शर्मा व्यास एवं मनोज तिवारी सहित कई कथित एवं स्वघोषित भोजपुरी के गणमान्य लोग एकादमी द्वारा सम्मानित किये गए ! उसी समारोह में भोजपुरी एकादमी के ब्रांड एम्बेसडर के तौर पर मालिनी अवस्थी के नाम की घोषणा हुई ! सम्मान समारोह के दो दिन बाद भरत शर्मा और मनोज तिवारी ने एकादमी के सम्मान को वापस करते हुए यह कहा कि भोजपुरी में योग्य लोगों के रहने के बावजूद अवधि गायिका मालिनी अवस्थी को ब्रांड एम्बेसडर क्यों बनाया गया ! सम्मान वापस करने और आरोप-प्रत्यारोप के बीच कई बातें सामने आईं और एकादमी अध्यक्ष से लगाए सम्मान लेने और देने वालों का अंदरूनी चरित्र खुलकर सामने आ गया ! यह स्थिति तब है जब बिहार सरकार की तरफ से यह साफ़ किया जा चुका है कि ये सारे सम्मान और घोषणाएं गैर-सरकारी हैं और इनका किसी भी सरकारी संस्था से कोई लेना-देना नहीं है ! अब बड़ा सवाल ये उठता है कि भोजपुरी वालों को सम्मान और पुरस्कार का लेन-देन इतना प्रिय क्यों है ? वो सम्मानित होने को इतना आतुर क्यों रहते हैं ? इन सबसे इतर अगर बात भोजपुरी की दिन-दशा की करें तो फिलहाल भोजपुरी की स्थिति ना इधर की है ना उधर की, लेकिन भोजपुरी के नाम पर अपनी साख बनाने वाले लोग खूब फल-फुल रहे हैं ! इस पुरे मामले को अगर बारीकी से देखें तो सवाल सब पर उठते हैं और कोई पाक साफ़ नहीं नजर आता ! सबसे पहले बात अगर बिहार भोजपुरी अकादमी की करें तो सवाल ये है कि भोजपुरी एकादमी को अगर बिहार सरकार द्वारा इस आयोजन अथवा सम्मान घोषणा की स्वीकृति नहीं दी गयीं थी तो ये सारी घोषणाएं किसके अधिकार क्षेत्र से की गयीं ? दूसरा सवाल ये है कि भोजपुरी के क्षेत्र में दिये गए इन सम्मानों को लेकर पैमाना क्या रखा गया एवं उसको तय करने वाले लोग कौन थे ? एक सवाल ये भी है कि कहीं सम्मान देने और लेने के नाम पर धन-उगाही का धंधा तो नहीं किया जा रहा है ? एकादमी के द्वारा किये गए कार्यों के बाद उठने वाले ये सवाल फ़िज़ूल नहीं हैं बल्कि ये निहायत गंभीर सवाल हैं ! चुकि बिना सरकार की अनुमति अथवा स्वीकृति के अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बिहार भोजपुरी एकादमी अध्यक्ष द्वारा निजी स्तर पर इस कार्यक्रम का आयोजन कराया गया अत: पूरी उम्मीद है कि सम्मानों की घोषणाओं का पैमाना भी वही अथवा उन्ही के लोग तय किये होंगे ! आज जब मामला सार्वजनिक हो गया है तो इस बात का जवाब भोजपुरी एकादमी के अध्यक्ष के पास भी नहीं होगा की उस समारोह में जिन लोगों को सम्मानित किया गया वो लोग भोजपुरी के लिए क्या खास किये हैं ! हालाकि इन सवालों के जवाब में सिवाय बचाव और कुतर्क के कुछ मिलता नहीं दिख रहा ! अब अगर बात ब्रांड एम्बेसडर को लेकर उठे विवाद कि की जाय तो बेशक यह पद गायिका मालिनी अवस्थी को मिला है लेकिन उन्हें भी इस पद को लेकर इतराने की जरूरत नहीं हैं ! मालिनी अवस्थी को गैर आधिकारिक तौर पर केवल एक व्यक्ति विशेष द्वारा भोजपुरी एकादमी का ब्रांड एम्बेसडर बनाया गया है ना कि भोजपुरी का ब्रांड एम्बेसडर ! दरअसल, भोजपुरी में ब्रांड एम्बेसडर बनाए जाने का कोई औचित्य ही नहीं है और सही मायने में देखा जाय यह पद ही औचित्यविहीन है ! जिस भाषा का ही वजूद सरकारी स्तर पर शून्य हो उस भाषा के नाम पर संस्था चलाकर सम्मान आदि देना कहीं से भी न्याय संगत और तर्कपूर्ण नहीं लगता है !
आज जब मालिनी अवस्थी के ब्रांड एम्बेसडर बनाये जाने पर भरत शर्मा व्यास और भोजपुरी गायक मनोज तिवारी एकादमी पर सवाल उठा रहे हैं तो एक सवाल उनपर भी उठता है कि आखिर वो सम्मान लेने के मामले में खुद इतने लालायित क्यों रहते हैं ! गौरतलब बात है कि एकादमी का सम्मान वापस करने वाले लोग ठीक चार दिन बाद दिल्ली में एक सम्मान समारोह भोजपुरी के नाम पर ही सम्मान लेते देखे गए ! वो भी उस मंच से जिसका भोजपुरी की अस्मिता से कोई लेना देना नहीं !
अब जब भोजपुरी में हालात ऐसे हों तो किसे गलत और किसे सही कहा जाय, इसकी पहचान बहुत ही मुश्किल है ! गिरगिट की नस्ल में घूम रहे ये स्वघोषित भोजपुरिया प्रचारक लोग कब,कहाँ और किस करवट अपना पाला बदले इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता ! हमें समझना होगा कि भोजपुरी परम्परा में रामनाथ पाण्डेय,महेंद्र मिसिर,पाण्डे कपिल जी, विवेकी राय, अर्जुन सिंह अशांत जैसे भोजपुरी साहित्यकारों जिन्होंने कम ही सही मगर भोजपुरी दर्शन को अपनी लेखनी में उकेरने का काम किया है , आज उन्हें हाशिए पर लाया जा चुका है ! लेकिन सम्मान लेने और देने के नाम पर ऐसे-ऐसे लोगों का नाम लिया जाता है जिनको ढंग से भोजपुरी बोलने तक नहीं आती है ! भोजपुरी में अश्लीलता के विरोध के नाम पर जो लोग आज झंडा उठाये नजर आते हैं, कमोबेश वही लोग भोजपुरी में अश्लीलता फैलाने वालों के साथ मंच साझा करते एवं सम्मान लेते-देते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं !
आज जब भाषाओं पर किये गए एक सर्वे में यह रिपोर्ट आई है कि पिछले साठ सालों में सैकड़ों भाषाएँ मृतप्राय हो चुकी हैं ऐसे में भोजपुरी को लेकर चिंता लाजिमी है ! कहीं ऐसा ना हो कि भोजपुरी के ये ठेकेदार अपनी अंदरूनी राजनीति चमकाने के लिए अपना स्तर इसी तरह गिराते रहे और आठवीं अनुसूची में भोजपुरी को शामिल कराने के नाम पर राजनीति करते रहे तो भोजपुरी की दशा भी वही हो जो बाक़ी अन्य विलुप्त होती भाषाओं की हुई है ! सरकार तो पहले से ही भोजपुरी को हाशिए पर ला चुकी है अब भोजपुरी को ज्यादा खतरा अपने सम्मान वाहकों और अंदरूनी राजनीति करने वालों से है ! ऐसे में आम भोजपुरिया लोगों को चाहिए कि वो ऐसी हर अकादमी और ऐसे हर व्यक्ति को खारिज करें जो सम्मान परम्परा का वाहक हो !!
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