- शिवानन्द द्विवेदी सहर
साहित्य और विमर्श का ये वो दौर है जहाँ साहित्य और विवाद के बीच चोली-दामन का संबंध बन चुका है ! अभी कुछ दिन पहले की ही बात है प्रेमचंद जयन्ती पर हंस द्वारा एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था ! आयोजकों(राजेन्द्र यादव) की माने तो उक्त कार्यक्रम में अभिव्यक्ति और प्रतिबन्ध विषय पर बोलने के लिए गोविन्दाचार्य, अशोक वाजपेयी के अलावा मावोवादी विचारधारा के हिमायती लेखक वरवरा राव एवं अरुंधती राय को भी आमंत्रित किया गया था ! वक्ताओं में से दो आये और दो नहीं आये ! नहीं आने वाले दो वक्ताओं में से एक वरवरा राव दिल्ली पहुँच कर भी कार्यक्रम में नहीं पहुचे ! खैर, वरवरा राव के ना आने को लेकर खूब बतकही और विमर्श हो चुका है, सच कहूँ तो हद से ज्यादा ! अत: अब इस विषय पर बात करने की गुंजाइश शेष नहीं बची ! सोशल मीडिया के मंचों पर इस कार्यक्रम को लेकर एक सवाल ये भी उठा था कि हंस के साहित्यिक कार्यक्रम में बिहार के कुख्यात बाहुबली पप्पू यादव क्या कर रहे थे ? राजेन्द्र यादव पर निशाना साधते हुए कहा गया कि क्या राजेन्द्र यादव ने पप्पू यादव को कार्यक्रम में आमंत्रित किया था अथवा वो खुद से आये थे ? फेसबुक विमर्शों में तो यहाँ तक कहा गया कि कहीं पप्पू यादव से इस पुरे कार्यक्रम के लिए आयोजकों द्वारा आर्थिक मदद तो नहीं ली गयी ? हालाकि इन सवालों पर अपना रुख रखते हुए अपने फेसबुक वाल से राजेन्द्र यादव(पता नहीं उनका वाल कौन चलाता है) ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए लिखा “न मेरी पप्पू यादव से कोई सहानुभूति है, न उनके गुनाहों से। लेकिन संगोष्ठी में उनकी मौजूदगी पर आपत्ति उठाना मुझे उचित नहीं जान पड़ता। संगोष्ठी में किसी के प्रवेश पर प्रतिबन्ध नहीं था। न कार्ड साथ में लाने की हिदायत थी, न प्रवेश से पहले आगंतुक के चरित्र की जांच का प्रावधान। कोई मुलजिम या मुजरिम साहित्य न पढ़े या साहित्य की चर्चा न सुने, ऐसा कोई नैतिक या कानूनी बंधन भी आज के दौर में नहीं सुना। सुना तो यह है कि जेल में कैदियों के समक्ष कविता-पाठ के आयोजन करवाए जाते हैं। इसमें बुराई भी क्या है! क्या अपराधी पाठक या श्रोता नहीं हो सकता ?
हालाकि जिस भोलेपन के साथ राजेन्द्र यादव ने हंस के कार्यक्रम में पप्पू यादव के आने के मसले को टाल कर खुद को इससे अलग कर लिया है, उस भोलेपन के साथ पप्पू यादव के आगमन को पचाया नहीं जा सकता ! बेशक कोई मुलजिम या मुजरिम साहित्य पढ़े, कार्यक्रम में जाए और वक्ताओं को सुने मगर पप्पू यादव का हंस के कार्यक्रम में यूँ पहुच जाना इतनी सीधी और सुपाच्य बात नहीं लगती जितने भोलेपन से राजेन्द्र यादव इसे बता रहे हैं ! जेल में रहते हुए पप्पू यादव ने अपनी आत्मकथा अथवा डायरी सम्बन्धी कोई किताब भी लिखी है ! क्या इसी तर्क के आधार पर कि कोई क्या मुलजिम लेखक नहीं हो सकता, हंस प्रकाशन उस किताब को प्रकाशित करवा सकता है ? शायद राजेन्द्र यादव ऐसा करके भी भविष्य में दिखा दें तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा ! पप्पू यादव के अंदर साहित्यिक प्रेम जागना स्वागत योग्य है और इसे उनके अंदर हो रहे वयक्तिक सुधार के लिहाज से भी स्वीकार किया जा सकता है ! मगर यह तो कतई स्वीकारना मुश्किल हो रहा है कि उस कार्यक्रम में पप्पू यादव बिन बुलाये मेहमान की तरह पहुच गए थे और इसकी खबर राजेन्द्र यादव को बिलकुल भी नहीं थी ! आज सवाल कूछ ऐसा खड़ा हुआ है कि प्रेमचंद और कन्हैया लाल मुंशी की परम्परा में चलने की बजाय राजेन्द्र यादव वाला ये नया हंस कहीं कौवे की चाल तो नहीं चलने लगा है ?
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