पाकिस्तान के चरित्र को समझे : दैनिक जागरण नेशनल में प्रकशित लेख
आजादी के बाद अंग्रेजी हुकुमत द्वारा चली गयी भारत-पाक विभाजन की अंतिम चाल आज दोनों मुल्कों के लिए नासूर बन चुकी है ! आज भारत और पाकिस्तान के बीच शान्ति और समझौतों की सारी संभावनाएं थकी हारी सी लाचार नजर आ रही हैं ! इसमें कोई दो राय नहीं कि विभाजन के बाद पाकिस्तान को तो भारत के रूप में एक पड़ोसी मिला था लेकिन भारत को पाकिस्तान के रूप में एक दुश्मन ही मिला ! अपने दोहरे चरित्र के लिए हमेशा से कुख्यात पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत-पाक सीमा पर वही किया है जिसके लिए वो जाना जाता है ! अभी दो दिन पहले ही पाकिस्तानी सेना ने पाँच भारतीय सैनिकों की नृशंस हत्या कर दी,जिसको लेकर भारत-पाक के बीच एक बार फिर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गयी है ! दरअसल, पाक द्वारा की गयी यह नापाक हरकत तो उसके चरित्र के अनुरूप है लेकिन इस गंभीर मामले पर भारत सरकार के रक्षामंत्री का गैर जिम्मेदाराना बयान ज्यादा दुखद और आश्चर्यजनक है ! इस दुर्भाग्य पूर्ण घटना के तुरंत बाद पाकिस्तान पर सख्त नीति अख्तियार करने की बजाय रक्षामंत्री का यह कहना कि यह पाकिस्तानी सेना के लिबास में आये आतंकवादीयों की करतूत है, बेहद निराशापूर्ण बयान है ! एकतरफ जब भारत-पाक सीमा पर हमारे जाबांज सैनिक बिना किसी वजह के जान गवां रहे हैं वहीँ दुसरी तरफ हमारे सियासी रहनुमा अपने बयानों से देश और सेना का हौसला पस्त करने में लगे हैं ! क्या हमारे जांबाज सिपाहियों के जान की कीमत चंद मुआवजों और नौकरियों से ही चुकाई जा सकती है और मुआवजा दे देना भर इस समस्या का समाधान है ? इतिहास पर अगर नजर डालें तो आजादी के समय हुए भारत-पाक विभाजन के बाद से ही भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्तों में तल्खी रही है ! चुकि पाकिस्तान एक ऐसा अस्थिर देश है जिसकी वजह से वो अंतर्राष्ट्रीय कुटिलताओं के मोहरे के तौर पर इस्तेमाल होता रहा है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि काश्मीर को हथियार बनाकर चीन जैसे देश भी पाकिस्तान का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करते रहे हैं! भारत-पाक संबंधो को सुधारने की दिशा में भारत की तरफ से तमाम पहल की की गयी लेकिन उसका कोई साकारात्मक परिणाम आज तक नहीं निकला ! चाहे वो जनवरी 1966 में किया गया ताशकंद समझौता हो या जुलाई 1972 का शिमला समझौता हो, हर समझौते को सबसे पहले पाकिस्तान द्वारा ही खारिज किया गया है !सफ़ेद पट पर लिखा यह काला सत्य झुठलाया नहीं जा सकता कि संबंध सुधार की दिशा भारत की तरफ से लागातार किये समझौतों के परिणाम भी बेहद नकारात्मक निकले और पाकिस्तान की तरफ से हर समझौते को खारिज ही किया जाता रहा है ! बावजूद इसके हम यह समझ नहीं रहे या समझने की कोशिश नहीं कर रहे कि चाहे जो भी हो जाय पाकिस्तान की नीयत भारत के प्रति ना तो कभी उदार और सौहार्दपूर्ण रही है और ना ही आगे रहेगी ! भारत को लेकर पाकिस्तान की नीयत में तो हमेशा से खोट रहा है लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण इस बात को समझना है कि पाकिस्तान को लेकर भारत की आंतरिक राजनीति का चरित्र कैसा है ? क्या ऐसा नहीं लगता कि पाकिस्तान के इस मनबढ़ रवैये के लिए काफी हद तक हमारी आंतरिक राजनीति और रणनीति भी जिम्मेदार है ! इससे ज्यादा ढुलमुल नीति और क्या हो सकती है कि पाकिस्तान द्वारा भारतीय सैनिकों के कत्लेआम के बाद पाकिस्तान से सवाल पूछने एवं उसपर रणनीतिक दबाव बनाने की बजाय हमारे रक्षामंत्री पाकिस्तानी सेना के बचाव में मोर्चा सम्हाल लेते हैं ! भारत के रक्षा मंत्री का बयान सुनने पर ऐसा महसुस होता है कि मानो यह भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के रक्षामंत्री का बयान हो ! बेशक वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय हालातों के नजरिये से यह माना जा सकता है कि केवल युद्ध ही इस समस्या का पहला और अंतिम विकल्प नहीं है और युद्ध से दोनों ही मुल्कों को ही नुकसान होगा ! लेकिन इसका ये भी अर्थ नहीं कि देश द्वारा अपने लिए सख्त रक्षात्मक रणनीति भी न अपनाई जाय ! अगर देखा जाय तो सही मायनों में पाकिस्तान को लेकर अन्तराष्ट्रीय स्तर पर तो दूर की बात, आंतरिक स्तर पर भी हमारी कोई तय रणनीति नहीं है ! यही कारण है कि ऐसी घटनाओं के बाद इस तरह के गैर जिम्मेदाराना बयान सुनने को मिलते रहते है ! भारत के मामले में यह मशहूर कहावत भी गलत साबित हो रही है कि बाहरी दुश्मन जब हमला करता है तो ऐसे हालात में घरेलु दुश्मन एकजुट होकर बाहरी शत्रु का मुकाबला करते हैं ! क्योंकि इस लिहाज से भारत में स्थिति बिलकुल उलट है और भारत में जैसे ही इस तरह की कोई घटना होती है तो आपसी आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है !
पाकिस्तान मसले को लेकर राजनितिक दलों के बीच मचे इस आरोप-प्रत्यारोप और सरकार की तरफ से जारी सिरफिरे बयानों के बीच बड़ा सवाल ये है कि आखिर हम अपने पड़ोसी मुल्कों को लेकर इतने लापरवाह क्यों होते जा रहे हैं ? भारतीय सीमा सुरक्षा के मामले में भी हमारी नीतियां ढाक के तीन पात से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं ! अगर देखा जाय तो एक तरफ जहाँ चीन आये दिन सीमा पर अतिक्रमण कर रहा है तो वहीँ दूसरी तरफ पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों से सीमा सम्बन्धी समझौतों को तार-तार करता रहा है ! इन हरकतों के जवाब में भारत सरकार के पास सिवाय कड़ी निंदा के और कोई दूसरा फार्मूला अभी तक नहीं दिख सका है ! भारत के वर्तमान आंतरिक राजनितिक हालात और सरकार की निष्क्रियता को देखते हुए तो यही लगता है कि सीमा पर हो रही इन घटनाओं के लिए पाकिस्तान से कम जिम्मेदार भारतीय हुकुमत भी नहीं है, बल्कि एक कदम ज्यादा ही है ! अगर दुश्मन अपना दुश्मन चरित्र दिखा रहा है और हम जबरन उसे दोस्त समझने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह हमारी मूर्खता पूर्ण सोच के अलावा कुछ भी नहीं है ! सवाल है कि आखिर भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान के साथ दोस्ती कायम करने के लिए और कितनी कुर्बानियों को यों ही चुप रहकर स्वीकार किया जाता रहेगा ? कितने जाबांजों की जान झोंकने के बाद हमारी सरकार को यह अहसास होगा कि वाकई पाकिस्तान के साथ नरम रुख रखना राष्ट्रहित में नहीं है ! बेशक शान्तिप्रिय मुल्क होने के नाते आप खुद युद्ध की पहल नहीं कर रहे लेकिन कम से कम जवाब देना तो सीखिए ही ! आखिर इस सब्र का बाँध कितना जड़ है कि इतना कुछ होने के बावजूद टूटता नहीं ! पाकिस्तान को सख्त और मुहतोड जवाब देने का वक्त हाथ से निकल रहा है लेकिन भारत सरकार के रवैये को देखते कहना मुश्किल है कि ऐसा कब हो सकेगा ?
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