- शिवानंद द्विवेदी सहर
अभी कुछ ही महीने पहले वीवीआईपी सुरक्षा मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने सड़कों पर बेलगाम दौड़ रहीं लालबत्ती वाली गाडिय़ों पर सख्त होते हुए केन्द्र एवं राज्य की सरकारों से इस संबंध में ब्यौरा मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछते हुए साफ तौर पर कहा था कि इन बत्तीधारी गाडिय़ों को लेकर सरकारें क्या नियामक तय कर रही हैं और कुल कितनी बत्तीधारी गाडिय़ां सड़कों पर दौड़ रहीं हैं इसका लेखा-जोखा कौन रख रहा है। दरअसल ,सन् 2002 में सड़क एवं राज्य परिवहन मंत्रालय द्वारा लालबत्ती धारकों की पात्रता की सूची जारी की गयी थी एवं यह भी तय किया गया था समय-समय पर राज्य सरकारें भी लालबत्ती पात्रता के संबंध में अपना नोटिफिकेशन जारी कर सकती हैं। लेकिन लालबत्ती किसे दी जाये और किसे नहीं,इसको लेकर कोई ठोस प्रावधान नहीं बनाया गया। लिहाजा नियमों में ढिलाई की वजह से लालबत्ती कल्चर नेताओं के रसूख और स्टेटस का सिम्बल बनती गयी। कोई ठोस नियामक न होने की वजह से बड़ी संख्या में सायरन होर्न वाली लालबत्ती गाडिय़ां सड़कों पर दौड़ती नजर आने लगी। चूंकि, लालबत्ती का मसला अप्रत्यक्ष तौर पर अति विशेष दर्जे की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है अत: इस पर नीति-नियामक तय करने का दायित्व कार्यपालिका पर है। मगर सरकारों द्वारा हीला-हवाली बरतने एवं कुछ पुख्ता उपाय न कर पाने के कारण सर्वोच्च न्यायलय को स्वत: इस मामले को संज्ञान में लेना पड़ रहा है। हालांकि इस संबंध में न्यायमित्र हरीश साल्वे ने पहले ही लालबत्ती के कारण बढ़ते अपराधों का हवाला देते हुए कहा था कि लालबत्ती और सायरन लगाने की अनुमति सिर्फ राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री, राज्यपाल ,मुख्यमंत्री, संसद के स्पीकर एवं मुख्य न्यायाधीशों सहित कुछ संवैधानिक पदों को ही दी जानी चाहिए। साल्वे ने यह भी कहा था कि लालबत्ती के मामले में एम्बुलेंस, पुलिस की गाडिय़ों आदि को छोड़कर किसी भी पदासीन को इस सुविधा की छूट नहीं दी जानी चाहिए। साल्वे की दलीलों को संज्ञान में लेते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने जब दिल्ली में लालबत्ती लगी कुल गाडिय़ों की संख्या जाननी चाही तो इसका जवाब सरकारों की तरफ से पेश सालिसिटर जनरल तक नहीं दे पाए। अब इस बात से यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब देश की राजधानी दिल्ली में लालबत्ती को लेकर कोई पुख्ता नियामक नहीं हैं तो बा$की राज्यों में तो स्थिति और भी खराब होगी। इस मामले में सबसे अधिक सांसदों और विधायकों वाले राज्य उत्तरप्रदेश में लालबत्ती गाडिय़ों की संख्या कितनी होगी,अंदाजा लगाना मुश्किल है । अगर एक नजर उत्तर प्रदेश पर डालें तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में ऐसी गाडिय़ां सड़कों पर दौड़ती नजर आ सकती हैं जिनको लालबत्ती लगाने की इजाजत नहीं है। उत्तर प्रदेश आरटीओ विभाग के मुताबिक राज्य में सांसद तक को गाड़ी के हेड पर फ्लैशर वाली लालबत्ती लगाने का प्रावधान नियामकों के अनुसार नहीं है। लेकिन स्थिति इसके ठीक उलट देखी जा सकती है। उत्तर प्रदेश के ही अकेले गोरखपुर, देवरिया सहित मऊ आदि जिलों में सांसदों और विधायकों सहित कई पार्टी पदाधिकारियों एवं उनके सगे-संबंधियों तक की गाडिय़ों पर लालबत्ती चमचमाती नजर आ सकती है। हालाकि यह स्थिति केवल उत्तरप्रदेश की ही नहीं है बल्कि हर राज्य के कमोबेश ऐसे ही हालात हैं।कोर्ट द्वारा मामले को संज्ञान में लेने एवं इस मसले पर केन्द्र एवं राज्य सरकारों की हीला-हवाली के बीच कई सवाल ऐसे हैं जो आज भी अनुत्तरित कायम हैं, जिनका जवाब न तो सरकार के पास है और न किसी अन्य के पास। सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर हमारी सरकारें सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर गंभीर क्यों नहीं हो रही और इस बत्ती कल्चर के दुरुपयोग पर लगाम कसने के लिए पुख्ता नियामक क्यों नहीं तय कर रही हैं? हालांकि ये कोई नई बात नहीं है कि अपनी सुविधाओं की कटौती के मसले पर न सिर्फ सत्तापक्ष बल्कि सभी राजनीतिक दल एकजुट होकर चुप्पी साध लेते हैं। इस मामले में भी काफी हद तक यही होता दिख रहा है। लालबत्ती के नाम पर बिना किसी नियम-कानून के अपनी धौंस दिखा रहे सांसद,विधायक यहां तक कि उनके सगे संबंधी भी सड़कों पर सरेआम कानून की धज्जियां उड़ाते नजर आ रहे हैं जबकि बत्ती का रसूख होने के नाते छोटे स्तर के सिपाही अथवा अधिकारी उनके खिलाफ कार्यवाही से कतराते हैं। समाज में रसूख और धौंस के नाम पर न जाने कितने गैर-कानूनी कामों को अंजाम इसी बत्ती कल्चर के कारण दिया जाना संभव हो पा रहा है। लालबत्ती आवंटन में स्पष्ट और कठोर नियामक न होने के कारण इस बात का सही आकलन तक करना संभव नहीं हो पा रहा कि कहां कितनी गाडिय़ां लालबत्ती वाली हैं अथवा हो सकती हैं। लालबत्ती को लेकर कानूनी असमंजस की आड़ में इसका धड़ल्ले से दुरुपयोग किया जा रहा है। लालबत्ती की तेज़ी से बढ़ रही अपसंस्कृति ने अपराधों को बढ़ावा दिया है। इस संबंध में वर्तमान कानून की लचरता का सबब ये है कि अगर कोई व्यक्ति अवैध तरीके से लालबत्ती का प्रयोग अपनी गाड़ी के हेड पर करता हुआ पकड़ा जाता है तो उसे महज तीन हजार के चालान पर बत्ती उतारकर छोड़ दिया जाता है। वर्तमान कानून का एक पहलू यह भी कहता है कि बत्ती का प्रयोग केवल ड्यूटी के दौरान ही मान्य है। मगर लालबत्ती का प्रयोग केवल ड्यूटी के दौरान हो रहा है कि नहीं इसके निर्धारण का कोई इंतजाम लालबत्ती आवंटन कानून में नहीं है। कानूनी खामियों से जुड़े तमाम सवालों पर नजर रखते हुए लालबती के दुरुपयोग पर लगाम के लिए अदालत की इस पहल को इस नजरिये से भी अनिवार्य माना जा सकता है कि जब कार्यपालिका अपने दायित्वों का निर्वहन ढंग से न करे तो न्यायपालिका द्वारा हस्तक्षेप किया जाना आवश्यक हो जाता है।
आज जरूरत है कि लालबत्ती की अपसंस्कृति पर लगाम कसने की दिशा में त्वरित कार्यवाही की जाये। सख्त कानून एवं नियामक लागू कर लालबत्ती आवंटन की सुनिश्चित एवं स्पष्ट नीति समान रूप से केन्द्र व राज्यों द्वारा लागू की जाये। लालबती के दायरे को सीमित करते हुए एवं हरीश साल्वे की सिफारिशों पर अमल करते हुए ऐसे प्रावधान बनाये जायें जिससे कि लालबत्ती का दायरा अति विशिष्ट लोगों तक ही सीमित हो सके। सांसद,विधायक सहित पंचायती स्तर पर भी इसके उपयोग की न तो कोई आवश्यकता है और न ही इसे होना चाहिए। निचले स्तर पर लालबत्ती का उपयोग रसूख और धाक ज़माने से ज्यादा कुछ भी नहीं होता है,अत: उस स्तर पर इसे सख्ती के साथ प्रतिबंधित किया जाना जरूरी है।
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