परीक्षा में प्राप्त अंक बनाम विद्द्यार्थी की योग्यता की बहस जब-जब चली है हमेशा इसी निष्कर्ष पर पहुंचा गया है कि अंकों का योग्यता से कोई विशेष लेना-देना नहीं होता ! सबसे अव्वल दर्जे के अंक के आधार पर इस बात की कतई गारंटी नहीं दी जा सकती कि इन अंकों के साथ उतीर्ण बच्चा व्यावहारिकता में उतना ही योग्य भी होगा ! आज जब देश के दो महत्वपूर्ण माध्यमिक शिक्षा परिषदों के दसवीं एवं बारहवीं के परीक्षा परिणाम घोषित हो चुके हैं तो इन परिणामों को देखते हुए हमारी माध्यमिक शिक्षा एवं परीक्षा प्रणाली से जुड़े कई सवाल भी खड़े होते हैं,जिनपर गहनता से विचार किया जाना जरूरी है ! सबसे पहले अगर केंद्रीय बोर्ड द्वारा घोषित परीक्षा परिणामों को नजीर के तौर पर देखें तो ग्रेडिंग सिस्टम के कारण इस बार सीबीएसई द्वारा घोषित दसवी के परीक्षा परिणामों में लगभग सभी बच्चे पास हुए हैं जबकि सिर्फ वही बच्चा उतीर्ण नहीं हो पाया है जो किसी कारण वश परीक्षा में नहीं बैठ पाया हो !केंद्रीय बोर्ड द्वारा घोषित बारहवीं के परीक्षा परिणाम भी कमोबेश ऐसे ही रहें हैं जिसमे 82% से ज्यादा बच्चे उतीर्ण हुए हैं ! वहीँ दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश बोर्ड द्वारा घोषित परीक्षा परिणामों पर नजर डालें तो स्थिति दो कदम आगे ही नजर आती है ! उत्तर प्रदेश बोर्ड द्वारा घोषित परिणामों में दसवीं एवं बारहवीं में सफलता का ग्राफ क्रमश: 86.63% एवं 92.68% तक पहुचता नजर आ रहा है ! इन परीक्षा परिणामों को देखकर यहाँ बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या वाकई सेकेंडरी एजुकेशन के ये केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय बोर्ड इस स्तर की शिक्षा दे पा रहे हैं कि सभी लगभग सौ प्रतिशत बच्चे इतने अव्वल दर्जे के अंकों के साथ उतीर्ण हों सके, या इन सबके पीछे का मकसद महज परीक्षा की औपचारिकताएं करा कर बच्चों के हाथों में सफलता का प्रमाण-पत्र थमा देना है ! लड़कियां रहीं अव्वल,फलां विद्द्यालय का अमुक बच्चा रहा अव्वल जैसे हेडलाइन वाली खबरों के साथ परिणामों के दूसरे दिन अखबारों में प्रकाशित होने वाली तस्वीरें कुछ समय के लिए सुकुन तो देती हैं ! मगर साथ ही यह सवाल भी छोड़ जाती हैं कि अखबारों में हँसते-मुस्कराते इन मासूम चेहरों के साथ कहीं हमारा शिक्षा तंत्र कोई छलावा तो नहीं कर रहा ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे शिक्षा तंत्र द्वारा अपने नौनिहालों को समुचित शिक्षा नहीं दे पाने और उन्हें एक योग्य एवं जवाबदेह नागरिक नहीं बना पाने की अपनी नाकामयाबी को छुपाने के लिए अंकों को मानक बनाकर सफल बच्चों की भीड़ पैदा की जा रही हो ? हालाकि इस मामले में उत्तर-प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद जैसे राज्यों के शिक्षा बोर्ड के हालात कुछ साल पहले तक बेहतर थे मगर अंकों की मारामारी की ऐसी होड़ चली कि वो भी अब इसी ढर्रे पर चलते नजर आ रहे हैं ! आज के छ:-सात साल पहले उत्तर-प्रदेश बोर्ड का परीक्षा परिणाम मात्र 25% से 40% के बीच रहता था, लेकिन केंद्रीय बोर्ड को टक्कर देने की होड़ में यूपी बोर्ड में भी अचानक से पिछले कुछ सालों में परीक्षा परिणामों में एक अनोखा त्वरित सुधार देखने को मिला है परिणामत: अब परीक्षा परिणाम 90% के पार तक पहुचने लगा है ! परीक्षा परिणामों में आये चौकाने वाले इन सुधारों का कतई यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि हमने शिक्षा व्यवस्था में कोई सुधार किया है बल्कि इसे शिक्षा के स्तर की बजाय परीक्षा के मूल्यांकन प्रणाली में हुए बदलावों के नजरिये से देखने की जरुरत है !
इस बात को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता कि हाल ही में आये परीक्षा परिणामों का अगर सख्त तरीके से पुनर्मूल्यांकन कराया जाय तो भारी संख्या में चौकाने वाले परिणाम आयेंगे ! क्योंकि परीक्षा परिणामों से जुडा यह पूरा मामला उत्तर-पुस्तिकाओं के जांच एवं मूल्यांकन प्रणाली से जुडा हुआ है ! केंद्रीय बोर्ड की मूल्यांकन प्रणाली के पीछे का खेल पूरी तरह से शिक्षा के बाजारीकरण की उपज है ! अगर गौर किया जाय तो केंद्रीय बोर्ड की मान्यता के तहत संचालित बहुसंख्यक संस्थान निजी एवं गैर-सरकारी हैं ! केंद्रीय बोर्ड के तहत संचालित निजी संस्थानों द्वारा अपने विद्द्यालय के परीक्षा परिणामों को शिक्षा के इस बाजार में अपनी साख साबित करने के अचूक हथियार के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है ! अभिभावकों को लुभाने एवं अपने संस्थान को शिक्षा का सर्वश्रेष्ठ मानक बताने के लिए तमाम निजी संस्थानों द्वारा नए दाखिले के लिए दिये गए विज्ञापनों में अपने पिछले वर्ष के परीक्षा परिणामों का आंकड़ा दिया जाना इस बात का द्दोतक है कि इन परिणामों का इस्तेमाल बाजार तैयार करने के लिए किया जाता है ! विज्ञापन और बाजार की बुनियाद पर टिकी शिक्षा में इन परिणामों के मायने शिक्षा के स्तर से जुड़े ना होकर शिक्षा के बाजारवादी ताकतों द्वारा इस्तेमाल मुनाफे की एक सोची-समझी तरकीब से जुड़े हैं ! परीक्षा प्रणाली को सहज कर अधिक से अधिक अंक बांटने की यह अंदरूनी साजिश केंद्रीय बोर्ड में आज से नहीं बल्कि कई साल पहले से चली आ रही है क्योंकि केंद्रीय बोर्ड की बुनियाद ही निजी संस्थानों पर टिकी है ! वहीँ दूसरी तरफ अगर उत्तर प्रदेश बोर्ड में पिछले कुछ सालों में हुए परीक्षा परिणामों में आश्चर्यजनक सुधारों पर नजर डालें तो वहाँ राजनीतिक रूप से शिक्षा के साथ खिलवाड़ किये जाने की गंध आती नजर आएगी ! नब्बे के दशक में जब कल्याण सिंह उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे उस दौर में परीक्षा के दौरान सख्ती एवं सख्त मूल्यांकन नीति लागू होने के कारण उत्तरप्रदेश बोर्ड के दसवी एवं बारहवीं का परीक्षा परिणाम 10% से भी कम रहा था ! लेकिन परीक्षा एवं मूल्यांकन को लेकर अन्य सरकारों खासकर मुलायम सरकार की नीतियां बेहद लचर और शिक्षा व्यवस्था के लिए घातक रही हैं ! सच्चाई यही है कि उत्तर प्रदेश में शिक्षा और परीक्षा दोनों ही काली कमाई का जरिया बन चुके है ! बोर्ड से मान्यता लेकर नक़ल का जो ढाँचा उत्तर प्रदेश बोर्ड में खड़ा हुआ है वो शायद ही कहीं और देखने को मिले ! यकीन करना मुश्किल होगा मगर इस सच्चाई को नाकारा नहीं जा सकता कि पैसे के बूते बोर्ड से मान्यता लेकर चल रहे तमाम संस्थानों द्वारा अंकों की गारंटी देकर ऊँची कीमतों पर छात्रों का दाखिला लिया जाता है और परीक्षा के समय जमकर नक़ल और धांधलेबाजी की जाती है ! उत्तरप्रदेश बोर्ड द्वारा दसवीं में प्रयोगात्मक परीक्षा के नाम पर 30 अंकों की जिम्मेदारी विद्द्यालय प्रशासन के हाथों दिया जाना भी शिक्षकों की कमाई में इजाफा ही करता नजर आ रहा है ! कुल मिलाकर यही कहा जाना उचित होगा कि यूपी बोर्ड में अंक बेचे जा रहे हैं, जितनी कीमत उतने अंक !
अपने-अपने फायदे के कारणों से अंको की तिजोरी खोलकर बैठे इन बोर्डस अथवा शिक्षण संस्थानों से भला किसका नुकसान हो रहा ये बताने की जरुरत नहीं है ! क्या परीक्षा की औपचारिकता करके बड़े-बड़े अंक बांटने मात्र से शिक्षा का स्तर सुधार सकता है या ये अंक हमारे नौनिहालों की योग्यता में वृद्धि कर सकते हैं ? वर्तमान की मूल्यांकन एवं परीक्षा प्रणाली की नीतियों को देखकर तो सिर्फ यही प्रतीत होता है कि अंको की चकाचौध में शिक्षा की चोरबाजारी खूब फल-फुल रही है मगर उसपर ध्यान किसी का नहीं जा रहा ! अभिभावक से लेकर विद्द्यार्थी तक सभी अंकों के गुमान में बाजार की भेंट चढ़ते नजर आ रहे हैं ! अगर जल्द ही परीक्षा नीति,मूल्यांकन प्रणाली, मान्यता आवंटन की शर्तों आदि में व्यापक एवं सख्त सुधार नहीं किये गए तो भारतीय शिक्षा व्ययवस्था की स्थिति भगवान भरोसे ही कही जायेगी !
ट्रिब्यून
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