मंगलवार, 9 जुलाई 2013

मंदिर के मुद्दे से मंजिल तलाशती भाजपा : जनसंदेश टाइम्स में छपा लेख

  • शिवानन्द द्विवेदी सहर


नब्बे के दशक के शुरुआती दौर में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में मशहूर हुआ नारा रामलला हम आयेंगे,मंदिर वहीँ बनायेंगे,एक बार फिर प्रासंगिक हो गया है ! नरेंद्र मोदी के खासमखास एवं भाजपा महासचिव अमित शाह ने अयोध्या जाकर राम मंदिर का मुद्दा एक बार फिर उछाल दिया है ! राममंदिर एक ऐसा मुद्दा था जिसने नब्बे के दशक में भाजपा  को ना सिर्फ सत्ता की राह दिखाई बल्कि भाजपा की सियासत का प्रमुख चेहरा बनकर भी उभरी जिससे भाजपा चाहकर भी दूरी नहीं बना सकती है ! इस संदर्भ में अगर गौर करें तो नब्बे के दशक के  शुरुआती दिनों में हुए राममंदिर आंदोलन के बाद देश की समूची राजनीति साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता नामक दो धड़ों में बंट चुकी थी, जो कि आज भी कायम है ! आज लगभग दो दशक बाद वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में अगर भाजपा द्वारा चले गए “मंदिर कार्ड” को चुनावों के निहितार्थ देखा जाय तो कहीं ना कहीं ऐसा लगता है जैसे भाजपा अपने इतिहास को एक बार फिर आजमाना चाहती है ! राममंदिर मुद्दे के साथ लड़े गए लोकसभा चुनावों के आंकड़े भी भाजपा की राजनीति के लिए फायदेमंद ही नजर आते हैं ! संख्याबल के आंकड़े इस बात के गवाह हैं राममंदिर भाजपा के लिए रामबाण साबित हुआ है ! भाजपा का चुनावी रथ जबतक राममंदिर मुद्दे के साथ बढ़ा तबतक भाजपा ठीक स्थिति में रही जबकि अपने मुख्य एजेंडे से हटते हुए जब भाजपा लोकसभा चुनाव    2004 में शाइनिंग इंडिया और फीलगुड जैसे मुद्दों के साथ चुनावी मैदान में उतरी तो उसका जनाधार कम होता नजर आया और सीटों में भारी कमी नजर आई और भाजपा 116 सीटों पर सिमट गयी ! सभी जगहों से थकने-हारने के बाद लौट के बुद्धू घर को आये मुहावरे को चरितार्थ करती भाजपा कहीं ना कहीं अपनी पुरानी धारा में लौटते हुए एक बार फिर अन्य मुद्दों की बजाय राममंदिर को प्राथमिकता देने के मूड में दिख रही है ! आज जब सत्रह साल पुराने गठबंधन को दरकिनार कर भाजपा एवं संघ ने हिंदू ह्रदय सम्राट की छवि वाले नरेंद्र मोदी को सख्ती के साथ चुनाव की कमान दी है तो इसका यही मतलब निकाला जाना चाहिए कि भाजपा की नजर एक बार फिर हिंदू वोटर्स का ध्रुवीकरण कर लोकसभा में सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरने की है ! इतिहास के चिलमन के पार अगर देखा जाय तो नब्बे के दशक में राममंदिर के नाम पर हुए हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के बूते ही  भाजपा लोकसभा में 182 सीट जीत कर खुद को सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में स्थापित  करने में कामयाब हो पाई थी ! अपने इतिहास की राह पकड़ते हुए अमित शाह ने उसी राजनीतिक सूत्र के तहत मंदिर निर्माण को लेकर अयोध्या में अपना बयान दिया है !  दरअसल, इस पुरे मसले को अगर दूसरे तरीके से देखें तो भाजपा के साथ बड़ी मुश्किल ये है कि वो राममंदिर को लेकर खुद ही दो विचारधाराओं में बंटी हुई नजर आई है ! पार्टी का एक खेमा जहाँ आज भी राममंदिर को मुख्य एजेंडे के तौर पर रखने की हिमायत करता है तो वहीँ दूसरा खेमा इससे परहेज करने का हिमायती है ! लिहाजा, राममंदिर को लेकर सन 2000 के बाद भाजपा की अंदरूनी स्थिति ही उहापोह की रही है,जिसका खामियाजा भी उसे कहीं ना कहीं भुगतना पड़ा है ! मुस्लिम वोटर्स को लुभाने के लालच में अपने मुख्य एजेंडे से भटकी भाजपा को मुस्लिम वोटर्स को लुभाने में सफलता तो नहीं मिली बल्कि उसका हिंदू वोटर्स ही उससे खिसकता गया जिसके परिणामस्वरूप पिछले दो लोकसभा चुनावों में उसे विपक्ष में बैठना पड़ा ! आगामी लोकसभा चुनाव में अगर भाजपा द्वारा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राम मंदिर को प्रमुख एजेंडे के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है तो इस बात की संभावनाओं को खारिज नहीं किया जा सकता कि भाजपा हिंदू वोटर्स का कुछ हद तक ध्रुवीकरण करने में सफल हो जाय और लोकसभा में अपनी सीटों में इजाफा कर ले ! चुकि देश स्तर पर भाजपा के संगठनों में मोदी की बयार चल पड़ी है ऐसे में मोदी से बेहतर राममंदिर मुद्दे को हवा देने वाला कोई दूसरा नेता अभी भाजपा संगठन में तो नहीं ही नजर आ रहा है ! विकास,महंगाई एवं भ्रष्टाचार आदि को मुद्दा बनाने में असफल रही भाजपा को अब सिवाय राम मंदिर के और कुछ ऐसा नजर आ नहीं रहा कि वो आक्रामक तेवरों के साथ चुनाव मैदान में उतर सके ! फिलहाल के सियासी समीकरण तो कम से कम यही कहते हैं कि भाजपा की नजर मंदिर को मुद्दा बनाकर चुनावी मैदान फतह करने पर टिकी हुई है और अमित शाह के बयानों को इन्ही कवायदों के रूप में देखा जाना चाहिए ! चुकि तमाम मुद्दों के बीच भटकी भाजपा पर हाल के दिनों में जिस तरह से संघ का नियंत्रण कसा है वो इस बात द्द्योतक है कि भाजपा एक बार फिर हिंदुत्व के एजेंडे के बूते अपनी सियासी जमीन तलाशने का प्रयास करेगी ! अगर देखा जाय तो 182 लोकसभा सीट से 116   लोकसभा सीटों पर सिमट चुकी भाजपा को अपना जनाधार टटोलने के लिए पुराने मुद्दों की तरफ जाना महज एक प्रयोग नहीं बल्कि उसकी मजबूरी भी है ! लेकिन इस बात को भी देखना होगा कि नब्बे के  दशक वाले  हिंदुत्व के एजेंडे और आज के 2013 वाले हिंदुत्व के एजेंडे के  बीच दो नारों का फर्क है ! तत्कालीन दौर में एक नारा था, राम लला हम आयेंगे मंदिर वहीँ बनायेंगे तो वहीँ दूसरा नारा था ये तो अभी झांकी है मथुरा काशी बाक़ी है ! आज अगर देखा जाय तो भाजपा ने बड़ी सफाई से पहले नारे को अपने एजेंडे में  लिया है लेकिन दूसरे नारे पर हाथ नहीं लगाया है ! कहीं ना कहीं हिंदू ध्रुवीकरण के रास्ते अपनी खोयी हुई सियासी जमीन तलाशने में जुटी भाजपा के लिए “राममंदिर” फिर मैदान मारने का हथकंडा मात्र है ! अस्सी लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में अगर “रामलला हम आयेंगे मंदिर वहीँ बनायेंगे” का सियासी रंग चढ़ गया तो वाकई यह भाजपा के लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है क्योंकि यूपी में मुस्लिम वोटर्स को लेकर कांग्रेस और सपा पहले से नूरा-कुश्ती कर रहीं हैं ! भाजपा के लिए सियासी अनुभव तो यही कहते हैं कि उसे मुस्लिम वोटर्स से उम्मीदें रखने की बजाय हिंदू ध्रुवीकरण की राजनीति पर ज्यादा कसरत करने की जरुरत है क्योंकि भाजपा को लेकर मुस्लिम वोटर्स के बीच विश्वसनीय माहौल बन पाना फिलहाल असमभव ही नजर आ रहा है ! शाइनिंग इंडिया और फीलगुड से होते हुए इधर उधर चारों तरफ भटकने के बाद जब कहीं कुछ हाथ नहीं लगा तो भाजपा को एक बार फिर रामबाण का संधान करना पड़ा जिसके संधान से वो एकबार सत्ता सुख भोग चुकी है !

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