शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

गन्ना किसानों की बदहाली : दैनिक जागरण नेशनल में लेख





  • शिवानन्द द्विवेदी सहर

चीनी उत्पादन और गन्ने की खेती के नजरिये से अग्रणी स्थान पर शुमार किये जाने वाले उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती अबतक के सबसे बदहाली वाले दौर से गुजर रही है ! पिछले कुछ सालों में लागातार कम हुआ चीनी उत्पादन इस बात का सुबूत है कि उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानी के हालात बहुत बेहतर नहीं हैं !  इसमें कोई दो राय नहीं कि एक दौर में भारत के कुल चीनी उत्पादन का बड़ा हिस्सा उत्तरप्रदेश से आता था जिसमे अब साल दर साल कमी होती जा रही है  ! पिछले कई सालों से  यह देखने को मिल रहा है कि चीनी उत्पादन के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश अपने तय लक्ष्यों को छु पाने में लगातार असफल साबित  हुआ है ! वर्तमान में गन्ना खेती के नजरिये से अगर देखा जाय तो तब हालात बहुत बदल चुके हैं ! आज यहाँ ना तो गन्ने के लहलहाते खेत ही दिखाई पड़ते हैं ना ही गन्ना पेराई के लघु उद्द्योग के रूप में क्रेशर मशीन ही खालिहानो में नजर आती है ! अगर देखा जाय तो ज्यादातर चीनी मिले बंद हो चुकी हैं और जर्जर अवस्था में हैं जबकि जो मिलें चल रही हैं उनके भी हालात फटेहाल ही हैं ! गन्ने की खेती का वो भी एक दौर था जब केवल पूर्वांचल के गोरखपुर मंडल में दो दर्जन से ज्यादा चीनी मिलें चलती थीं और भारी मात्रा में चीनी उत्पादन होता था ! नजीर के तौर पर अगर उत्तरप्रदेश के ही गन्ना उत्पादन में अग्रणी एक जिले का सर्वे देखा जाय तो तो बिहार सीमा से सटे देवरिया जिले की पाँच में से चार सरकारी चीनी मिलें सालों से ठप पड़ी हैं जबकि एक मात्र चीनी मिल किसी निजी के कंपनी के नियंत्रण में चल रही है ! हालाकि अब उन चीनी मिलों को अब सरकारी भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि लगभग सभी चीनी मिलों को लगभग एक दशक पहले की तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा निजी कंपनियों के हाथों बिना किसी उचित करार और बिना वाजिब कीमत के बेचा जा चुका है ! पिछले डेढ़ दशकों में तेजी से बंद हुईं चीनी मिलों के साथ-साथ  गन्ने की खेती के प्रति हुए किसानो के मोहभंग के कारणों को समझने का प्रयास किया जाय तो तमाम सवाल सवाल खड़े होते हैं ! बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर किन वजहों के चलते पिछले कुछ सालों में बड़ी संख्या में चीनी मिलें तेजी से बंद हुई हैं ? सवाल यह भी है कि कहीं गन्ने की खेती से हो रहे किसानों के मोहभंग के पीछे की वजह चीनी मिलों का बंद होना ही तो नहीं है ? इन तमाम सवालों पर गौर करने के बाद यहाँ मामला केवल गन्ना-किसानी की बदहाली से जुड़ा ना होकर सरकारी हीला-हवाली एवं भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ भी नजर आता है !  इस बात को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता कि अगर निष्पक्ष जांच हो तो गन्ना मिलों के बंद होने एवं औने-पौने कीमतों पर सरकार द्वारा उन्हें बेचे जाने के पीछे बड़े स्तर का भ्रष्टाचार खुलकर सामने आएगा ! दरअसल, इस पुरे मामले की सच्चाई ये है कि पिछली सरकारों द्वारा गन्ना मिलों के नुक्सान में चलने का हवाला देकर निजी कंपनियों के हाथों बेहद कम कीमतों एवं बिना किसी पुख्ता करार किये बेच दिया गया ! इस पुरे मामले में सरकार और निजी कंपनियों के बीच सांठ-गाँठ की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता ! उदाहरण के तौर पर देवारियां जिला स्थित भटनी चीनी मिल जिसकी वाजिब कीमत अरबों में आंकी गयी है,को मात्र कुछ करोंड़ में एक कंपनी हनी वेल के हाथों बेच दिया गया है ! यह मामला अभी अदालत के अधीन है !
     इस मसले पर अगर गन्ना किसानों का नजरिया देखें तो गन्ने की खेती को लेकर आज का किसान बेहद नाकारात्मक हो चुका है ! चुकि गन्ने की फसल कामर्शियल फसल के श्रेणी में आती है अत: इस फसल की बुवाई किसानों द्वारा मुनाफे के लिए हमेशा से की जाती रही है ! मगर पिछले कुछ सालों में सही समय पर उनके उत्पादों का वाजिब भुगतान मिलों द्वारा ना होना कहीं ना कहीं किसानों के मोहभंग के प्रमुख कारणों में से एक है ! गन्ना किसानों का साफ़ तौर पर कहना है कि अगर उनके उत्पादों का उचित मूल्य सही समय पर नहीं मिलेगा तो वो आखिर क्यों इस दिशा में निवेश करेंगे ! इसमें कोई दो राय नहीं गन्ना किसानों के भुगतान के मामले में हमेशा से ही सहकारी चीनी मिलों का रवैया बहुत ही लेट-लतीफ़ वाला रहा है ! महीनों इंतज़ार के बाद चीनी मिलों द्वारा मनमाने ढंग से किसानों को उनके गन्ना उत्पादन का भुगतान किये जाने से किसानों का रुझान गन्ने की खेती से लागातार टूटता गया है ! उत्तर प्रदेश के बहुसंख्यक गन्ना किसान गन्ने की खेती को घाटे का निवेश  मानकर इससे दूरी बना चुके हैं ! अभी पिछले साल ही प्रदेश की सभी चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का संयुक्त बकाया लगभग 900 करोंड़ के आस-पास था जिसका भुगतान अभी तक पूरी तरह से नहीं किया जा सका है ! निश्चित तौर पर गन्ने की खेती के गिरते ग्राफ को लेकर सरकार कि संवेदनहीन भूमिका को खारिज नहीं किया जा सकता ! उत्तरप्रदेश की सरकारों का रुख भी गन्ने की किसानी को लेकर अभी तक बहुत साकारात्मक नहीं नजर आया है ! इस मसले पर गौर करने वाली बात ये है कि घाटे के नाम पर बंद हुई दर्जनों से ज्यादा सहकारी चीनी मिलों को सरकारों द्वारा पुन: संचालित करने की दिशा में प्रयास करने की बजाय उन्हें निजी कंपनियों को औने-पौने दामों पर बेच दिया गया ! अरबों की सम्पति को महज कुछ करोड़ में बेचने वाली सरकारों के नीयत पर सवाल इसलिए उठते लाजिमी हैं ! गन्ना मिलों के इस पुरे खरीद-फरोख्त में बड़े स्तर के भ्रष्टाचार का अंदेशा भी जताया जा रहा है जिसे सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है !
     सरकारी असंवेदनशीलता एवं भ्रष्टाचार के कारण गन्ने की खेती में हो रही कमी का सीधा असर चीनी के उत्पादन  पर पड़ने लगा  है ! गन्ने की खेती के प्रति कृषकों के मोहभंग के कारण ही गन्ना उत्पादन में भारी कमी देखी जा रही है परिणामत: चीनी की कीमतें भी हमारे नियंत्रण से बाहर होती जा रही है ! कम हो रही चीनी की मिठास को एक चिंता के तौर पर समझते हुए अधिक से अधिक मात्रा में गन्ना उत्पादन की दिशा में सरकारी स्तर पर बल दिये बगैर चीनी उत्पादन के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता है ! इस दिशा में एक पहल ये जरुर होनी चाहिए कि गन्ना मिलों को सरकारी नियंत्रण में किस तरह से चलाया जाय ! साथ ही गन्ना मिलों को निजी हाथों में बेचने के नियामक भी तय होने चाहिए ! अगर यूपी जैसे राज्य में में गन्ना उत्पादन की बदहाली पर जल्द गंभीर नहीं हुआ गया तो भविष्य में चीनी का संकट और अधिक बढ़ जाएगा और मामला नियंत्रण में नहीं रहेगा ! पूर्वांचल में चीनी मिलों और गन्ने की खेती की दुर्दशा को अपने शब्दों में बयान करते पूर्वांचल के प्रख्यात भोजपुरी कवि एन.डी देहाती लिखते है “अब ना उंख लऊकी ना ही उखियार बबुआ, नाही लऊकी कवनो गाँवे कोल्हार बबुआ”..! 

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