- शिवानन्द द्विवेदी सहर
एक संभावित आंकड़े के अनुसार भारत के 90% लोगों को जीवन में कभी ना कभी दवाओं का सेवन करना पड़ता है एवं 45 वर्ष से अधिक उम्र के अधिकाँश लोग नियमित दवाओं के सेवन को मजबूर हैं ! इन आंकड़ों के आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि दवाइयों के बाजार का सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग भारत में ही निवास कर रहा है ! भारत में ना तो बीमारों की कमी है और ना ही बीमारियों का ही अभाव है ! स्वास्थ्य के बदहाली से जूझ रहे देश को अगर स्वस्थ रहने के लिए सबसे ज्यादा किसी चीज की दरकार है तो वो हैं दवाइयां ! किसी भी व्यक्ति द्वारा स्वास्थ्य पर किये गए खर्च के मामले में चिकित्सालय एवं चिकत्सक दूसरी वरीयता पर आ चुके हैं, क्योंकि एक सरकारी आंकड़े के अनुसार मरीज द्वारा इलाज पर किये गए कुल खर्च का 72% हिस्सा केवल दवाइयों पर जाता है ! ऐसे में दवाइयों के कारोबार को एक बड़े स्तर का उद्द्योग कहना गलत नहीं होगा ! वैसे तो स्वास्थ्य जैसे विषय से जुड़ी जरुरतों को व्यापार के तराजू पर तौल कर देखना ही बड़ा आश्चर्यजनक लगता है लेकिन जिस तरह से दवाओं का बाजार भारत में खड़ा हुआ है, निश्चित तौर चौकाने वाला है ! भारत में दवाओं का वर्तमान बाजार लगभग सत्तर हजार करोंड़ के आस-पास का है जिसमे मात्र चार सौ करोंड़ के बाजार पर सरकारी कंपनियों का हिस्सा है ! इस हिसाब से अगर देखें तो भारतीय दवा बाजार के कुल कारोबार में सरकार द्वारा संचालित दवा कंपनियों की हिस्सेदारी 0.7% से भी कम है ! सरकारी दवा कंपनियों की इस खानापूर्ति मात्र की हिस्सेदारी निश्चित तौर पर हतप्रभ करने वाली हैं ! ये आंकड़े इस बात की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त हैं कि भारतीय दवा बाजार पूरी तरह से निजी कंपनियों के अधीन हो चुका है और दवा बनाने से लेकर मूल्य निर्धारण तक में उन निजी कंपनियों का वर्चस्व कायम है ! हालाकि दवाओं के मूल्य निर्धारण को लेकर पिछले साल लागू की गयी नई दवा नीति 2012 के तहत 348 दवाओं के मूल्य निर्धारण में सरकारी नियंत्रण की बात बेशक की गयी है ! लेकिन इस नीति के तहत मूल्य निर्धारण किये जाने का बारीकी से अध्ययन करने पर अर्थगणित की सुई कुछ और ही दिखाती नजर आती है ! नई दवा नीति के तहत तय मूल्य निर्धारण के प्रावधान के मुताबिक़ किसी भी दवा उत्पाद में 1% से ज्यादा शेयर रखने वाली ब्रांडेड दवा कंपनियों द्वारा अलग-अलग निर्धारित किये गए मूल्यों के कुल औसत को ही सरकार द्वारा दवा की अधिकतम कीमत मान लिया जायेगा ! सरकार द्वारा तय किये गए इस नीति के मसौदे में ऐसा कुछ भी नहीं दिखता जिससे कि यह मान लिया जाय कि इससे दवाओं के कीमतों में नियंत्रण होगा या दवाएं सस्ते दरों पर उपलब्ध हो सकेगी ! हालाकि दवा नियामक नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी द्वारा पहले से चलते आ रहे तय फार्मूले के अनुसार लागत के आधार पर दवाओं के मूल्य निर्धारण प्रक्रिया को ना अपनाकर बाजारवादी मुनाफे के अनुकूल तैयार की गयी नई दवा मूल्य निर्धारण नीति को एक दिखावे मात्र का खोखला क़ानून ही कहा जा सकता है ! इस पुरे नीति में यहाँ सवाल ये उठता है कि जिस देश में दवाओं का बाजार सत्तर हजार करोंड़ का है वहाँ सरकार अपना हाथ दवाओं के बाजार से खींचती क्यों नजर आ रही है ? जबकि सरकार को यह बखूबी पता है कि निजी दवा कंपनियों द्वारा दवाओं में भारी मुनाफा कमाया जा रहा है ! नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी के मानकों को ख़ारिज कर मनमाने ढंग से दवाओं की कीमतों का निर्धारण कर रहीं दवा कम्पनियाँ अपनी कुल लागत से लगभग पाँच सौ प्रतिशत से भी ज्यादा का मुनाफा कमा रहीं हैं !कारपोरेट मंत्रालय की लागत लेख शाखा ने अपने अध्यन में यह खुलासा किया कि ग्लेक्सोस्मिथलाइन की कालपोल एवं फाईजर की कोरेक्स कफ सीरप सहित अन्य तमाम दवाओं को उनके लागत मूल्य से 1100% ज्यादा के मुनाफे पर बाजार में बेचा जा रहा है ! कंपनियों द्वारा तय किये गए इन कीमतों को मुनाफा कहने की बजाय खुली लूट कहा जाना ज्यादा यथार्थ के करीब नजर आता है ! इन आंकड़ों से पता चलता है कि नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी के नियामकों को लागू करने का विरोध हमेशा से निजी कंपनियों द्वारा क्यों किया जाता रहा है ! इस बावत ये आंकड़े भी कम चौकाने वाले नहीं हैं कि अभी तक निजी दवा कंपनियों के खिलाफ दवाओं में तय सीमाओं से ज्यादा ओवार्चार्जिंग करने के लगभग 900 मामले दर्ज किये गएँ हैं जिनमे हजारों करोंड का जुर्माना कंपनियों के ऊपर अदालतों द्वारा लगाया गया है ! प्राप्त आंकड़ों के अनुसार अभी तक मात्र 250 करोंड़ के आस-पास जुर्माने की वसूली हो पाई है जबकि कम्पनियां अभी भी बाजार में जमी हुईं हैं ! अपने मुनाफे के हिसाब से नियामक तैयार किये जाने की वकालत कर रहीं दवा कम्पनियाँ पूर्णतया बाजारवादी मानसिकता से ग्रसित हैं एवं स्वास्थ्य जैसे विषय को भी बाजार के चौराहों पर खुलेआम बेचने से इनको कोई परहेज नहीं है !
दवाओं के बाजारीकरण और आम जनता के स्वास्थ्य का सौदा कर रहीं इन कंपनियों का हौसला बुलंद होता जा रहा है और सरकार भी अंदरूनी तौर पर इन कंपनियों के साथ खड़ी नजर आ रही है ! दवा जैसी बुनियादी जरुरत को सरकारी नियंत्रण से इस कदर मुक्त कर बाजारों के हवाले छोड़ दिया जाना बेहद चिंताजनक है ! मनमाने ढंग से मुनाफे का खेल खेल रहीं इन कंपनियों के प्रकोप से बीमार होता जा रहा देश भला स्वस्थ कैसे बन सकता ! व्यक्ति के जीवन से जुड़ी दवाओं को बाजार के नजरिये से देखने की बजाय जनता के सुविधा और सेवा के नजरिये से देखा जाना चाहिए ! वर्तमान हालातों में तो सिर्फ यही लगता है कि समाज के स्वस्थ्यीकरण के नाम पर अर्थशास्त्र का ऐसा जाल बिछाया जा चुका है कि उसमे फंसा हर व्यक्ति सिर्फ बीमार ही रह सकता है !
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