सोमवार, 19 अगस्त 2013

ख्याति का खजाना :बिंदिया मैगज़ीन में प्रकशित व्यंग्य


बचपन में स्कुल के मास्टर जी द्वारा पूछा हुआ एक सवाल गाँव के ही रमई काका से पूछ बैठा था ! काका रस कितने तरह का होता है ? मैंने तो यूँ ही तफरी में पूछा था, मगर काका सवाल को सीरियस ले लिए और बोल बैठे ‘दुई तरह का, एक चीनी का और दूसरा गुड़ का” ! अब मसि कागद छुयो नहीं कलम गह्यो नहीं हाथ वाले रमई काका को भला क्या पता था कि हिन्दी के मास्टर जी के लिए रस नौ तरह के होते है ! रमई काका के दो और हिन्दी वाले मास्टर जी के नौ मिलाकर कुल ग्यारह रस पढ़ने के बाद लगा कि चलो अब यह अध्याय बंद हुआ और इस रस-कुचन से निजात मिल गयी ! ग्यारह रसों का ज्ञान लेने के बाद अगर आप कविता भी लिखना चाहते हों तो प्रथम शर्त ये है कि आप खुद को लेखक या लेखिका होने जैसा महसुस भी करें तभी आप पहली कविता लिख सकते हैं ! साहित्य में महसुस करने का अनोखा चलन है ! लिखने से ज्यादा महसुस करना जरूरी है, अब ये महसुस करना भी ना जाने क्या बला है ! हालाकि इस बारे में मैंने किसी ख्यातिप्राप्त महोदय से पूछने का कोई जोखिम नहीं लिया, क्या पता वो कह दे कि यही तो  साहित्य का महसुस-रस है ! खामोखा एक रस का और झंझट लेना पड़ जाता  ! चुकि ख्यातिप्राप्त महोदयों से कुछ पूछने का बड़ा रिस्क ये है कि वो जो बताते हैं वही मनवाते भी है, यह सोचकर मै ख्यातिप्राप्तों से कुछ नहीं पूछता !  बात आ ही गयी है तो जरा इस “ख्यातिप्राप्त” के रहस्यों को भी टटोलता ही चलूँ ! सच कह रहा हूँ यह शब्द जितना साहित्यजगत में उछल-कूद करता नजर आता है शायद ही कहीं और दिखता हो ! पता नहीं साहित्य में इस ख्याति का खजाना कहाँ छुपा हुआ है जिसका कोई ओह-टोह ही नहीं मिलता ! यह ख्याति आती कहाँ से है और कई लोग इसे प्राप्त कैसे कर लेते हैं,ये आज भी अबूझ पहेली है ! बात इतनी ही होती तो अपन इस ख्यातिप्राप्त के पचड़े में नहीं पड़ते लेकिन आश्चर्य तो ये होता है कि इस ख्याति को प्राप्त करने के बाद ख्यातिप्राप्त लोग इसे आगे भी अपने नाम का रसघोल बनाकर बांटने का धंधा बढ़ा देते हैं ! कभी-कभी मन करता है कि कह दूँ कि आपको ख्याति प्राप्त हो गयी ना, अब आप संतोष धरिये और मुझे उस ख्याति के खजाने का पता बता दीजिए जहाँ से मै भी थोड़ी ख्याति ला सकूँ ! सारी ख्याति का खजाना खुद लूट लेंगे क्या ? वो भी बिना टैक्स दिये ? साहित्य में इतना कालाधन क्यों बना रहे हैं आप ? खैर, ये ख्याति तो आज भी मेरे लिए रहस्य है, कभी और इसपर रिसर्च करूँगा ! फिलहाल बात रस की हो रही थी और ख्यातिप्राप्त पर आ गयी ! हालाकि ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो मेरे जैसे नौ और दो ग्यारह रस पढकर साहित्य में उतरने के बाद ख्यातिप्राप्त लोगों के पचडों में पड़ने की बजाय गद्य विधा का नौ दो ग्यारह रस पढ़ते हुए बाहर निकल लेते हैं ! रस साहित्य में घुसे तो ठीक लेकिन गलती से भी साहित्यकार के अंदर घुस गया तो मामला उमर का लिहाज भी नहीं रखने देता है ! साहित्यकारों को रस से दूरी बनानी चाहिए, खासकरके उन साहित्यकारों को जो श्रृंगार रस के स्थायी भाव पर काम करते  हैं ! हाल ही की बात है एक युवा लेखिका ने अपने द्वारा शोध-ग्रंथ पर किये गए पाठ पर किसी ख्यातिप्राप्त साहित्यकार से टिप्पणी लिखने को कहा तो उन्होंने उस लेखिका के सौंदर्य का वर्णन ही लिख दिया था ! लेखिका नाराज होकर इसे अपने ब्लॉग पर चेंप दीं, हालाकि इसमें नाराज भी क्या होना ? यही तो श्रृंगार का साहित्यकार रस है जो साहित्य की बजाय साहित्यकार में ही घुस कर बैठ गया है ! अगर मै वहाँ होता तो उक्त साहित्यकार महोदय से उनकी आत्मकथा लिखने का निवेदन किया होता ! क्या पता हिन्दी साहित्य को भी एक अभिज्ञान शाकुंतलम मिल जाता ! वो ठहरी नई लेखिका, नहीं समझ पाई ! वैसे कोई भी नई लेखिका इस बात को कहाँ समझ पाती है कि ख्यातिप्राप्त लोग चौसठ   कलाओं के माहिर हैं ! अगर आप अभीतक गद्य विधा वाले नौ दो ग्यारह रस का महत्व नहीं समझ पाए हैं और अभी भी काव्य विधा वाले रस की लाइन में लगे हैं तो देर किस बात की, शोर्टकट देखिये और मार दीजिए एक छलांग रस के इस विशाल बाजार में जहाँ एक से बढ़कर एक रस बेचने वाले ख्यातिप्राप्त दुकानदार अपनी ख्यातिलब्ध दूकान लगाये बैठे हैं ! उसी में से कोई एक दूकान पकड़ लीजिए और लगा लीजिए मोल-भाव,दाम-काम फिर मिला लिजिये उनके रस का घोल अपनी रचना की बोतल में और गटक जाइए बिना रुके एक घूंट में, फिर क्या ....लो जी बन गए आप भी साहित्यकार ! 
 

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