बुधवार, 21 अगस्त 2013

इन हादसों की जिम्मेदारी किसकी : नई दुनिया में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर 

बिहार के समस्तीपुर-सहरसा रेलखंड के बीच हुए रेल हादसे में 37 लोगों के मारे जाने एवं सैकड़ों लोगों के हताहत होने की ख़बरों के बाद यह सवाल फिर से उठ रहा है कि अक्सर होते रहने वाले इन हादसों के लिए दोषी किसे माना जाय ? हालाकि हमेशा ऐसा देखा जाता है कि ऐसे रेल हादसों के बाद प्रतिक्रिया स्वरुप उग्र भीड़ द्वारा रेलगाड़ी में आग लगा दी जाती हैं एवं तोड़-फोड़ आदि की जाती है ! वहीँ दुसरी तरफ रेल मंत्रालय एवं राज्य सरकारों की तरफ से जांच एवं मुआवजे की घोषणा करके मामले को ठंढे बस्ते के हवाले कर दिया जाता है ! लेकिन ऐसे हादसों के मूल वजहों को तलाशने एवं उसकी सुधार की दिशा में शायद ही कोई पहल अबतक की गयी हो अथवा अगर की भी गयी हो तो किसी परिणामी निष्कर्ष तक पहुची हो ! अगर देखा जाय तो हादसों के इन मामलों में ज्यादातर गुस्सा सरकारों एवं विभागों के प्रति ही दिखाया जाता है एवं पुरे हादसे का ठीकरा प्रशासन पर ही फोड़ने की कोशिश की जाती है ! लेकिन ऐसा कतई नहीं है कि ऐसे हादसे केवल प्रशासन एवं विभाग की लापरवाही से ही होते हैं ! कई बार ऐसे हादसे जनता के गैर-जिम्मेदाराना और लापरवाह हरकत की वजह से भी होते हैं ! बिहार में हुए इस वीभत्स हादसे के पीछे भी कहीं ना कहीं वो भी कम दोषी नहीं नजर आ रहे जो इस आज इस दुर्घटना में या तो जान गवा चुके हैं अथवा हताहत हैं ! पिछले कुछ सालों में हुए हादसों पर नजर डालें तो ज्यादातर हादसे ऐसे हैं जो भीड़ के अन्धुत्साह के कारण होते रहे हैं ! चुकि, बहु समुदायों का देश होने के नाते भारत विभिन्न तरह की उत्सवधर्मिताओं का देश है,जहाँ लगभग हरदम किसी ना किसी तरह का लंबे समय तक चलने वाला उत्सव अथवा पर्व आता ही रहता है ! ऐसे उत्सवों अथवा पर्वों में शरीक होने लाखों-करोंडो की संख्या में लोग देश के कोने-कोने से पहुचते हैं ! इस लिहाज से अगर देखा जाय तो इस बार हुआ यह बिहार रेल हादसा सावन महीने के कांवड यात्रा के समय में हुआ है ! यह कोई नयी बात नहीं है कि कांवड़ यात्रा के नाम पर जहाँ एक बड़ा समुदाय अपनी आस्था के कारण मंदिरों में जल चढाने जाता है तो वहीँ इस बात को नाकारा नहीं जा सकता कि भारी संख्या में उत्पाती किस्म के लोग भी इस दर्शन के नाम पर जत्थे में शामिल होते हैं और उत्पात मचाते हैं ! देश की राजधानी दिल्ली तक  में इन कांवडियों की मनमानी सरेआम देखी जा सकती है तो अन्यत्र की बात ही क्या की जाय ! बिहार में हुआ यह हादसा भी कुछ इसी तरह की जनता की मनमानी का नतीजा है ! सवाल है कि क्या जो लोग इस हादसे में जान गवाए हैं अथवा घायल हुए हैं,उनको नहीं पता था कि रेल पटरी पर चलना खतरे को बुलावा देना है ? क्या धार्मिक यात्राओं का उत्साह किसी को भी इस बात की छूट देता है कि वो तय नियामकों को तोड़कर अपनी मनमानी करे ? प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक़ बिहार में हुए इस हादसे की सबसे बड़ी वजह यही है कि लोग रेलगाड़ी आने से लापरवाह पटरी पर चल रहे थे ! ऐसे हालात में जब ट्रेन आने से बेपरवाह लोग पटरी पर चल रहे हों तो रेल प्रशासन द्वारा हर जगह रेल हादसे टाल पाना बेहद मुश्किल है ! गौरतलब है कि उसी दिन किउल-मोकामा रेलखंड पर एक हाल्ट पर तेज रफ़्तार की गाड़ी जनशताब्दी के ड्राइवर के प्रयासों से सैकड़ों उन लापरवाह किस्म के लोगों को बचाया जा सका जो कि रेलवे ट्रेक पर बैठकर ट्रेन आने का इन्तजार कर रहे थे  ! इस पुरे मामले में जनता की लापरवाही एवं मनमानेपन को एक बड़ी वजह के रूप में देखा जाना चाहिए जो कि एक तरह से अपराध की श्रेणी में भी आता है ! आंकड़ों पर नजर डाले तो पिछले तीन साल में  लगभग 41000 से ज्यादा लोग ट्रेन पटरी पर हुए हादसों में मारे गए हैं जबकि प्रत्येक साल 15000 लोग बेपरवाह रेलवे ट्रेक पार करते हुए जान गवाएं हैं ! चुकि रेल पटरी पर चलना एक जुर्म है अत: यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि रेलवे ऐसे अपराधों पर नियंत्रण के क्या प्रयास कर रही है ! आंकड़ो के अनुसार 1,61,192 लोगों को केवल साल 2011 में इस वजह से गिरफ्तार किया गया क्योंकि वो रेल पटरी पर चल रहे थे ! अत: ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि रेलवे द्वारा इस अपराध पर नकेल कसने को लेकर बिलकुल गंभीरता नहीं बरती जा रही है ! हाँ, कई ऐसे मोर्चे हैं जहाँ रेल विभाग को भी व्यापक स्तर पर सुधार करने की जरुरत है एवं हमारी रेलवे अभी भी वहाँ पिछडी हुई है ! रेलवे की खामियों पर अगर नजर डाले तो अभी भी पन्द्रह हजार से ज्यादा रेलवे क्रासिंग ऐसे हैं जो मानवरहित हैं एवं सौ के आस-पास रेलवे प्लेटफोर्म पर लाउडस्पीकर से सुचना देने की सुविधा तक नहीं है ! इस बात को
स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए कि अभी तकनीकी स्तर पर हमारा रेलवे उतना विकसित नहीं हो पाया है जितने की जरुरत है, लेकिन रेलवे की इन खामियों को ही केवल हादसों की वजह बता देना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता ! सवाल है कि क्या हम अपने जीवन की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी तकनीकी के ऊपर ही देंगे ? क्या हम आत्मसुरक्षा एवं नागिरक जवाबदेही के प्रति कभी सजग नहीं होगें ? यहाँ पूरा का पूरा मामला नागरिक जवाबदेही का है एवं बजाय कि ऐसे हादसों का ठीकरा रेलवे एवं अन्य विभागों पर फोड़ने के,हमें अपने गिरेबान में झांक कर देखना होगा कि हम कितने सही और जावबदेह हैं ! विभागों एवं सरकारों का क्या है, वो तो आपकी मौत पर मुआवजे और जांच का ठप्पा मार कर पुरे मामले को ही रफा दफा कर देने का अनोखा फार्मूला इजाद कर चुके हैं और इसका प्रयोग वो बेहिचक करते भी रहते हैं ! ऐसे हादसों के होते ही एक दूसरे के ऊपर छींटा-कशी, आरोप-प्रत्यारोप करके अपनी राजनीति साधने के अलावा हमारे नेताओं को सूझता भी क्या है ! मगर यहाँ सवाल आपकी जान का है और अपनी जान की सुरक्षा के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील आपको ही रहना पड़ेगा ! एक लापरवाह, गैर-जिम्मेदार नागरिक जो ना तो अपनी नागरिक जवाबदेही की समझ रखता हो और ना ही अपनी सुरक्षा का ,उसको भला इस बात का हक कैसे मिल सकता है कि वो अपने मौत अथवा घायल होने का ठीकरा किसी और के सर फोड़े और सवाल पूछे ! ऐसे हादसों से बचने के लिए सबसे पहले जनता के अंदर सुधार होने की जरुरत है क्योंकि ऐसे हादसों की मूल वजह जनता की लापरवाही एवं उनका नियामकों के प्रति गैर-जिम्मेदाराना रवैया ही है ! अत: सबसे पहले हमें खुद इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी !!  


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