देश के सबसे बड़े विश्वविद्दयालय के रूप में ख्यातिलब्ध जेएनयू के प्रांगण में हाल ही में जो कुकृत्य हुआ उसमे न सिर्फ दो जाने गयीं हैं बल्कि उस घटना के बाद एक बार फिर हमारा समाज तमाम सवालों के कठघरे में खड़ा हो चुका है ! पूरी घटना पर नजर डालें तो प्रेम में लडकी की तरफ से अस्वीकृति से छुब्ध होकर लड़के द्वारा पहले तो बेरहमी के साथ लड़की के ऊपर कुल्हाड़ी से जानलेवा हमला किया गया एवं बाद में खुद भी जहर की गोलियाँ खाकर आत्महत्या कर लिया गया ! बेशक ऐसा नृशंस मामला जेएनयू के इतिहास में पहली बार हुआ हो लेकिन ऐसा कतई नहीं है की यह मामला हमारे समाज के लिए कोई अद्वितीय घटना है ! इसी वर्ष बिहार एवं उत्तप्रदेश में इस तरह की कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं जिसमे हत्या अथवा आत्महत्या को अंजाम दिया गया हो ! बेशक यहाँ मामला विश्वविद्यालय प्रांगण में हुआ है लेकिन हमें इस बात को समझना होगा कि जेएनयू अथवा कोइ भी विद्द्यालय-विश्वविद्यालय न तो समाज से बड़ा होता है और न ही समाज के आचरण और चरित्र निर्माण का मुख्य श्रोत ही होता है ! अत: इस पुरे मामले को जेएनयू के दायरे में चिन्हित कर विश्वविद्यालय पर सवाल दागने से ज्यादा जरूरी है कि समाज के गिरेबान की तहों में छुपे कुत्सित प्रवृतियों पर सवाल उठाया जाय ! यह मसला न तो विद्यालय प्रांगण की सुरक्षा से जुड़ा है और न ही ऐसे मामलों को सुरक्षा का हवाला देकर इसका ठीकरा प्रशासन आदि पर फोड़ कर चुप हो जाने की जरुरत है ! भारतीय समाज के बिगड़ते हुए इस वर्तमान चरित्र में अब ऐसी घटना का कहीं भी और कभी भी घटित होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, और यत्र-तत्र घटित होती भी रहीं है ! अगर इस तरह की घटनाओं के घटित होने के पीछे की वजहों को तलाशने का प्रयास करें तो मामला सीधा और सपाट प्रेम-प्रसंगों से शुरू होकर दुराव की कुंठा की तरफ जाता नजर आता है ! इस तरह के ज्यादातर मामलों में कारण यही साबित होता रहा है कि प्रेम में असफलता अथवा दुराव की कुंठा से ग्रसित प्रेमी द्वारा प्रेमिका पर हमला किया गया एवं उसकी हत्या कर गयी ! आत्महत्या के ज्यादातर मामलों की वजहों में भी प्रेम-प्रसंगों के खुलासे ही सामने आते रहे हैं ! लिहाजा विश्वविदद्यालय प्रांगण में हुई इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हमारा समाज कहाँ जा रहा है और किस दिशा को पकड़ रहा है ? इन सवालों से उठे इस पुरे बहस में अगर समाज पर प्रश्नचिन्ह उठेगा तो विमर्श का एक कोण प्रगतिशीलता बनाम परम्परावाद की तरफ भी घूम सकता है ! समाज का एक खेमा जो धुर परम्परावादी है वो इस पुरे मसले को प्रगतिशीलता के अतिवाद के तौर पर देख रहा है ! वहीँ दुसरी तरफ प्रगतिशीलता का झंडा उठाये दूसरा खेमा इस पुरे मामले को अपने तरीके से परिभाषित करने पर तुला है ! इन सबके बीच अब सवाल यही है कि विमर्श के दोराहे पर खड़े भारतीय समाज को ऐसी कुत्सित और अमानवीय घटनाओं से कैसे उबारा जाय ? 
दरअसल, ऐसी समस्याओं के पीछे एक बड़ी वजह हमारा अतिवादी चरित्र है ! विचारधारा को समझने और समझाने के मामले में हम इतने अतिवादी हो चुके हैं कि किसी भी संवेदनशील मामले में किसी बीच के रास्ते की गुंजाइश शेष नहीं रहने देते ! अतिवादी सोच से बाहर निकलकर यह बात समझने की जरुरत सभी को है कि जेएनयू प्रांगण में जो कुछ भी हुआ है वो प्यार के किसी भी स्वरुप का परिणाम नहीं है बल्कि अपरिपक्वता,नासमझी और सामाजिक दुराचरण का एक डरावना चेहरा है ! अगर एक तेईस साल का लड़का एक बाईस साल की लड़की के ऊपर जानलेवा हमला करता है और फिर खुद को मार लेता है तो इसमें प्रेम शब्द कहीं भी वजह के रूप में नहीं दिखता ! अगर वाकई इसमें प्रेम कहीं भी होता तो तो यह घटना ही नहीं हुई होती ! कहीं न कहीं आकर्षण के अन्धुत्साह को प्रेम समझ बैठने की नासमझी के परिणाम स्वरुप ही हमारे देश के युवाओं में ऐसा चरित्र उत्पन्न होता जा रहा है जिसके परिणाम स्वरुप वो ऐसे कुंठा से ग्रसित गलत कदम उठा रहे हैं ! हमारे समाज और तंत्र का ताना-बाना भी इतना फ़िल्मी और कल्पना की कहानियों वाला होता जा रहा है कि आज का युवा वास्तविकता के धरातल से मुह मोडकर खोखले फ़िल्मी चरित्रों में ही खुद यत्र-तत्र फिट करने लगा है ! स्वस्थ समाज के निर्माण आदि पर काम करने की बजाय समाज के साथ-साथ कई बार सरकारी स्तर पर भी कई ऐसे निर्णय देखने को मिल जाते हैं जो कि सामाजिक विद्रूपताओं की वजह बन सकते हैं ! गौर करना होगा कि एक साथ घूम लेने और सड़कों पर अपने अन्तरंग संबंधो का नंगा प्रदर्शन कर देने मात्र से ही प्रगतिशील लोकतंत्र और अभिव्यक्ति के सारे मानक मुक्कम्मल नहीं हो जाते, बल्कि लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्य कहीं इनसे ऊपर की चीज़ है ! आज जरूरी है कि हम इश्क और मुहब्बत के नाम पर बदचलनी की तरफ बहकते युवाओं के कदम को रोकने की दिशा में अभिभावक स्तर पर अपनी जवाबदेही तय करें क्योंकि बच्चों के परवरिश और संस्कार की प्रथम जिम्मेदारी अभिभावक की होती है, न कि सरकार की ! प्रेम और आकर्षण को एक समझ कर उन्हें उन्मुक्त आजादी की हिमायत अगर हमारा प्रगतिशील समाज करता रहा तो आने वाले दिनों में आधुनिक प्रेम के इस नए संसकरण के परिणाम और भी घातक होंगे ! अच्छे और बेहतर समाज के लिए जरुरी है कि हम बेहतर मानसिक क्षमता वाले युवाओं की जमात तैयार करें न कि कुंठित भेंडीयों की भीड़ खड़ी कर दें ! प्राथमिक स्तर पर स्वस्थ युवाओं वाले समाज का निर्माण करना हर अभिभावक की जिम्मेदारी है एवं द्वितीय स्तर पर यह समाज की जिम्मेदारी है, तब जाकर इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप हो सकता है !
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