यूपी की सियासत का चरित्र ही कुछ ऐसा है कि वहाँ धर्म और राजनीति एक दूसरे को किसी ना किसी रूप में प्रभावित करते ही रहते हैं ! नब्बे के दशक में हुए मंदिर आंदोलन के बाद से ही अगर यूपी की राजनीति का इतिहास उठाकर देखा जाय तो यूपी में धर्म का स्वरुप बेहद राजनीतिक नजर आएगा ! अब जब लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो एकबार फिर धर्म की राजनीति की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है ! विश्व हिंदू परिषद के आह्वान पर 25 अगस्त से प्रस्तावित अयोध्या में चौरासी कोसी यात्रा पर उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा लगाईं पाबंदी का मुद्दा अब केन्द्र की राजनीति का हिस्सा बन चुका है ! चुकि पारम्परिक रूप से यह मुद्दा ही केन्द्र की राजनीति का है क्योंकि यूपी के विधानसभा चुनावों के समय इस मुद्दे को ज्यादातर जोर पकड़ते नहीं देखा जाता है ! लिहाजा, इस मुद्दे पर भाजपा एवं कांग्रेस दोनों के बयान आने लाजिमी थे और आ भी चुके हैं ! स्वाभाविक रूप से भाजपा ने एक तरफ जहाँ इस यात्रा के प्रति उदारता दिखाते हुए तय नियमों के आधार पर इसको अनुमति देने की बात की है तो वहीँ कांग्रेस की तरफ से दिग्ग्विजय सिंह ने भाजपा और उत्तरप्रदेश सरकार दोनों पर सवाल खड़े कर दिये हैं ! बेशक विश्व हिंदू परिषद भारतीय जनता पार्टी की आधिकारिक उप इकाई ना हो लेकिन संगठनात्मक एवं वैचारिक स्तर पर उसका कार्य भाजपा के अनुकुल ही होता है ! अत: विहिप द्वारा घोषित इस यात्रा को गैर-राजनितिक तो नहीं ही कहा जा सकता है ! लोकसभा चुनाव के लिहाज से उत्तरप्रदेश प्रदेश सबसे ज्यादा यानी अस्सी सीटों वाला राज्य है एवं इसी राज्य के बदौलत भाजपा एक बार सत्ता तक पहुचने में सफल भी रही है ! अत: एक बार फिर भाजपा की नजर अपने उसी किले पर है जहाँ से चलकर उसे अपनी खोई मंजिल दिखाई दे रही है ! आज नरेंद्र मोदी जैसे हिन्दुवादी चेहरे को अगर भाजपा ने सबसे पुराने गठबंधन के टूटने की शर्तों पर आगे लाया है तो इसे भाजपा की प्री-इलेक्सन चुनावी कवायद के रूप में देखा जाना चाहिए ना कि चुनाव के बाद की कवायदों के रूप में देखा जाय ! इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा में नरेंद्र मोदी सरीखा कोइ दूसरा नेता नहीं है जिसको आगे लाकर मुख्यधारा की बुनियादी राजनीति एवं धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण के बीच समन्वय स्थापित किया जा सकता हो ! नरेंद्र मोदी को लाने का एक बड़ा मकसद यही है कि नब्बे के दशक वाले उस पुराने राजनीतिक फार्मूले का उत्तर प्रदेश में दुबारा सूत्रपात किया जा सके ! आज अगर विश्व हिंदू परिषद द्वारा चौरासी कोसी यात्रा की बात की जा रही है तो यह ना सिर्फ विहिप का अभियान मात्र है बल्कि इसे भाजपा द्वारा यूपी में चुनावी एजेंडा तैयार करने की कवायदों के रूप में भी देखा जाना चाहिए ! आंकड़ों की गणित में सबको पता है कि अगर हिंदू ध्रुवीकरण के अपने पुराने सियासी फार्मूले में भाजपा सफल हो जाती है तो बेशक वो 272 का जादुई आंकड़ा ना जुटा पाए लेकिन सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभर कर तो सामने आ ही सकती है ! इस ध्रुवीकरण का डर ही है कि हाल ही में कांग्रेस आलकमान ने अपने सभी मुस्लिम नेताओं को सख्त हिदायत दी कि मोदी के खिलाफ कम से कम अथवा ना के बराबर बोला जाय ! इस बात को कोंग्रेस बेहतर जानती है कि मुस्लिम ध्रुवीकरण के नाम पर अगर समाजवादी पार्टी यूपी में बहुमत जुटा सकती है तो हिंदू ध्रुवीकरण के नाम पर मोदी केन्द्र में भी पहुच सकते हैं ! लिहाजा, कांग्रेस द्वारा इस मसले पर कुछ भी एकतरफा नहीं बोला जा रहा है ! गौर करने वाली बात ये है कि हमेशा तुष्टिकरण और धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाली कांग्रेस, विहिप द्वारा प्रस्तावित चौरासी कोसी यात्रा पर कुछ भी स्पष्ट बोलने से बचती नजर आ रही है ! कांग्रेस की उहापोह और भाजपा द्वारा विहिप के इस्तेमाल के बीच मुलायम सिंह यादव द्वारा इस यात्रा का विरोध किये जाने के पीछे का मकसद साफ़ है कि वो किसी भी हाल में अपना मुस्लिम वोटबैंक खिसकने नहीं देना चाहते हैं ! मुलायम बेशक खुद को प्रधानमंत्री के रूप में देखने की ख्वाहिश रखते हों लेकिन इतना तय है कि केन्द्र में उनकी स्थिति एक सहयोगी क रूप में ही रहेगी अत: वो केन्द्र की राजनीति के नाम पर राज्य के राजनितिक समीकरणों के साथ छेड़-छाड करने का जोखिम नहीं ले सकते ! मुलायम को इस बात का अंदाजा है कि उत्तर प्रदेश में अगर हिंदू ध्रुवीकरण हो भी जाता है जो कि बेहद मुश्किल है, तो इसका खामियाजा कांग्रेस को ही उठाना पड़ेगा ! चुकि मोदी का हिंदू ध्रुवीकरण ही मुलायम के मुस्लिम ध्रुवीकरण को और पुख्ता कर सकता है, अत: उनको इससे बहुत नुकसान होता नहीं दिख रहा ! हालाकि उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक परिवेश में हिंदू ध्रुवीकरण होना बहुत आसान नहीं लगता,क्योंकि हिंदू समुदाय के वोट अब जातिगत समीकरणों पर बट चुके हैं,जिन्हें जाति से हटाकर धर्म के नाम पर डायवर्ट करना लोहे चने चबाने से से कम नहीं है ! मंदिर और धार्मिक यात्राओं के नाम पर मोदी का चेहरा आगे कर देने से अगर वाकई यूपी में हिंदू ध्रुवीकरण की कुछ संभावनाए खुलकर सामने आती हैं और वोटर्स का रुझान इधर से उधर होता है,तो इसका सीधा लाभ भाजपा को जरुर मिलेगा ! हिंदू ध्रुवीकरण की संभावना की आह लेने और इसको पुख्ता करने के लिए मोदी के खासमखास अमित शाह को यूपी की कमान दी गयी है ! फिलहाल वर्तमान हालातों में चुनौतियाँ सबके सामने हैं और सब अपने-अपने सहूलियत की राजनीति करते नजर आ रहे हैं ! भाजपा द्वारा मोदी और अमित शाह के बहाने विहिप को ढाल बनाकर जातिगत समीकरणों में सेंध लगाने एवं धर्म के नाम पर वोट जुटाने की कवायद की जा रही है तो वहीँ सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी भी भी अपनी धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीति को और ठोस और मजबूत बनना चाहती है ! यूपी की राजनीति में धर्म के नाम पर राजनीति करने का ठीकरा सिर्फ भाजपा पर फोडना निहायत अतार्किक बात होगी ! सही बात तो ये है कि यूपी में धर्म और जाति के नाम पर ही राजनीति होती है और लगभग सभी राजनीतिक दल किसी ना किसी धर्म और जाति की राजनीति करते हैं ! बेशक भाजपा का राजनितिक धर्म कोइ और हो और सपा और कांग्रेस का कोई और हो ! फिलहाल चौरासी कोसी यात्रा को रोके जाने और इस पर भाजपा की आपत्ति एवं कांग्रेस की तटस्थता की स्थिति के बीच एक बात साफ़ तौर पर सामने आती दिख रही है कि यूपी में लोकसभा चुनाव फिर डेढ़ दशक पुराने कसौटियों पर लड़े जाने हैं और लड़े जायेंगे ! इसका परिणाम अब जो भी हो आगाज का अंदाज तो वही पुराना है !!
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