शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

भारतीय विमानन का कल और आज : अप्रकाशित लेख





                                                                      

                                    वह दौर भी क्या होगा जब मानव किसी चिड़िया के उड़ानों से प्रेरणा लेकर कल्पना कि उड़ने भरता होगा! आज हमारा मानव समाज उड़ान कि परिकल्पना को लेकर जितना सहज महसूस करता है शायद आज के सौ साल पहले का माने उड़ान कि परिकल्पना में उतना ही असहज एवं आश्चर्यचकित महसूस करता होगा! मानव उड़ानों का इतिहास जहाँ से शुरू होता है, विमान के अविष्कार की बुनियाद वहीँ से रखी जाती है! सन २००३ में जब दुनिया के तमाम देश उड़ानों के इस चमत्कारी अविष्कार का शतवर्षीय उत्सव मना रहे थे तब भारत के पास ये उपलब्धि नहीं थी! विमानन का शतवर्षीय उत्सव मानाने के लिए भारत को लगभग ८ साल का और इंतज़ार करना पड़ा ! विमानन के क्षेत्र में भारत के इस ८ वर्षीय इंतज़ार के बाद की इस उपलब्धि के पीछे पूरे सौ साल के उतार-चढ़ाव भरे चमत्कारी इतिहास का वजूद भी है! आज से ठीक सौ साल पहले 18 फरवरी 1911 को इलाहाबाद की जमीन से जब फ्रेंच पायलट मि. हेनरी पिक्वेट ने नैनी तक की पहली उड़ान भरी होगी, तब शायद भारतीय आशाओं की कल्पनामय उड़ान में दो पंख और लग गए होंगे! इलाहाबाद का यमुना का किनारा 18 फरवरी, 1911 को भारतीय जमीन से उड़ने वाले पहले उड़ान का गवाह बना! भारतीय नगरों के बीच की इस पहली उड़ान ने भले ही महज १० किलो मीटर की दूरी तय की हो, लेकिन इस 10 किलो मीटर की उड़ान ने भारतीय आशाओं को ऐसा बल दिया कि आज हजारों मील भी छोटे नज़र आते हैं! १८ फरवरी, २०११ की इस उपलब्धि के सबसे ऐतिहासिक तथ्य यह हैं कि भारतीय धरा से आशामान छूने कि ख्वाहिश में उडी इस पहली ने, 6000 पत्र जो ब्रिटेन के तत्कालीन सम्राट जार्ज वी के नाम लिखे गए थे, को लेकर अपना सफ़र शुरू की ! पत्रों के इस हवाई उड़न ने इसी 18 फरवरी, 1911 को एयार्मेल सर्विस की बुनियाद रखी जो इस चमत्कारी एवं ऐतिहासिक दिवस के महत्व चारचांद और लगाती! यह कम आश्चर्य एवं सुखद अनुभूति की बात नहीं है भारतीय इतिहास की दो महँ परिभाषाएँ एक ही तिथि को लिखी गयी! अपने इन्ही ऐतिहासिकताओं के कारण 18 फरवरी 1911 आज भारतीय नागर विमानन के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है! उड़ान की इस पहली सफलता ने तो मानो समस्त आशाओं में ऊर्जा का संचार कर दिया! 18 फरवरी, 1911 से लगभग डेढ़ साल बाद दिसंबर 1912 में पहली नागर विमानन सेवा मार्ग की शुरुआत भारत की नई नवेली राजधानी दिल्ली और कराची के बीच शुरू की गयी! दिल्ली और कराची के बीच शुरू इस प्रथम नागर विमानन सेवा की शुरुआत भारतीय स्टेट एयर सर्विसेज एवं इम्पेरियल एयरवेज यु.के के परस्पर सहयोग से संपन्न हुई! दिसंबर १९१२ में शुरू की गयी यह हवाई नागर विमानन सेवा ही वो नीव की ईंट है जहाँ से वर्तमान भारतीय विमानन की गगनचुम्बी अट्टालिकाओं की बुनियाद जुडी! इम्पेरियल एयरवेज यु.के के सहयोग से भारतीय विमानन ने बुलंदी की जो आधारशिला दिसंबर 1912 के प्रथम हवाई मार्ग के रूप में रखी उसे भारतीय नागर विमानन की की दूसरी ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में देखना अतिश्योक्ति नहीं होगी!भारतीय नागर विमानन के क्षेत्र में विमानन के नए अध्याय की शुरुआत प्रथम भारतीय हवाई सेवा इन्डियन एयर लाइन सेवा टाटा संस लिमिटेड के रूप में की गयी! टाटा संस लिमिटेड द्वारा मद्रास(चेन्नई) और कराची के बीच शुरू की गयी रेगुलर हवाई डाक सेवा तत्कालीन सरकार के संरक्षण एवं सहयोग से पूर्णतया मुक्त थी! टाटा के निजी निवेश द्वारा संचालित इस नई शुरुआत ने भारतीय नागर विमानन में निजी निवेश की परंपरा की नीव रखी एवं इस शुरुआत विमानन को एक पुख्ता आयाम प्रदान करने का काम किया! नियमित हवाई डाक सेवा की इस शुरुआत ने कहीं ना कहीं भारतीय पूंजीपति वर्ग में विमानन के प्रति एक आस्था एवं विश्वाश को जन्म दिया! जिससे की विमानन सेवा में निजी निवेश की संभावनाओ  को बल मिला! वर्तमान विमानन में निजी निवेशकों की भागीदारी एवं तमाम विकल्पों की बुनियाद शायद १९१५ में टाटा संस लिमिटेड द्वारा ही रखी गयी थी! जिसके परिणाम स्वरुप विमानन सेवा फलीभूत हो रही है! गौर करने वाली बात यह भी है कि भारतीय विमानन में निजी निवेश को आने में महज तीन साल से चार साल का समय लगा जो भारतीय विमानन के त्वरित विकास का प्रत्यक्ष प्रमाण है! जैसा कि सर्व विदित है कि आधुनिक विश्व समाज के विकास में तमाम संभावनाएं निजी पूँजी निवेश के माध्यम से जुडी हुई है एवं दुनिया के तमाम देश खुद को स्वदेशी एवं विदेशी निवेशकों कि आकांक्षाओं के अनुरूप परिपक्व करने में जुटे हुए हैं! ऐसी स्थिति में किसी भी क्षेत्र में त्वरित एवं सर्वांगीं विकास के लिए बड़े एवं छोटे स्तर के तमाम निवेशकों का निवेश आवश्यक एवं अनिवार्य होता जा रहा है! भारतीय नागर विमानन अगर आज किसी प्रतिष्ठित  मुकाम पर तक पहुँच सका  है तो इसमे कहीं ना कहीं निजी पूँजी निवेश का योगदान स्पष्ट तौर  पर परिलक्षित होता है ! भारतीय विमानन में निजी निवेश की परम्परा की बुनियाद शुरुआत आज के लगभग 97 साल पहले 1915 में टाटा एंड संस द्वारा रखी गयी एवं उसके परिणाम स्वरुप ही आज हमारे पास विमानन की बहुविकल्पीय सेवाएं उपलब्ध हैं !!जब भारत  में टाटा द्वारा उड़ानों का इतिहास लिखा जा रहा था तभी लगभग पुरी दुनिया प्रथम विश्व युद्ध की विभिषका को झेल रही थी ! हालाकि प्रथम विश्व युद्ध में भारत  की सीधे तौर पर कोई भागीदारे नही थी लेकिन ब्रिटेन के शासन के अंतर्गत होने के कारण उसका प्रभाव भारतीय व्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक था ! प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के तुरंत बाद ही भारतीय नागर विमानन ने अपने पांव फैलाने शुरू कर दिए   !इसी क्रम में 24 जनवरी 1920 को रोयल एयरफोर्स द्वारा करांची और बोम्बे के बीच रेगुलर एयरमेल सर्विस की शुरुआत कर दी गयी ! १९२० के इस सफल प्रयास के ठीक चार साल बाद नागर विमानन के क्षेत्र में एक नई योजना की शुरुआत की गयी ! इस योजना के तहत  भारतीय नागर विमानन के स्थायित्व हेतु तीन हवाई अड्डे बनाने का अभूतपूर्व काम शुरू किया गया ! नागर विमानन हवाई अड्डे के निर्माण के लिए इलाहाबाद के बमरौली,कलकता के डम-डम और मुम्बई के गिल्वर्ट हिल  लोकेशन को चुना गया !१९२४ की यह योजना भारतीय नागर विमानन की झोली में एक अनमोल  उपहार की तरह थी जिसे आज भी साजो कर रखा  गया है !भारतीय आज़ादी के उपरांत एक दौर ऐसा भी आया जब भारतीय नागर विमानन को राष्ट्र बंटवारे के दंश को झेलना पड़ा! राष्ट्रीय बंटवारे के प्रभाव से भारतीय नागर विमानन क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा और फलस्वरूप उपरोक्त कंपनियों में से एक कंपनी 'ओवरेंट एयरवेज' पाकिस्तान के हिस्से में चली गयी! स्वतन्त्र भारत में अंतरिम सरकार की स्थापना के बाद पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में देश ने एक तरफ लोकतंत्र की सुबह दखी तो दूसरी तरफ भारतीय विमानन विभाग ने प्रसार की बहुआयामी संभावनाओं को तलाशना भी शुरू किया! भारतीय विमानन को अंतर्राष्ट्रीय मंच तक लाने एवं इसके अंतर्राष्ट्रीय विस्तारीकरण में भी अधिक समय नहीं लगा! 8 जून 1948 को एयर इण्डिया ने प्रथम अंतर्राष्ट्रीय विमानन सेवा का आगाज बाम्बे से लन्दन के बीच हवाई मार्ग की शुरुआत करके किया! ८ जून का यह कदम भारतीय विमानन के अंतर्राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक बना!  भारत में नागर विमानन का महत्व एवं इसकी प्रासंगिकता इतनी व्यापक हो गयी कि सिर्फ नागर विमानन के हेतु सन १९८६ में नेशनल एयरपोर्ट अथोरिटी कि स्थापना करनी पड़ी! राष्ट्रीय हवाई अड्डा प्राधिकरण की स्थापना प्रमाण है कि भारतीय नागर विमानन अपनी क्षमता से गुणोत्तर वृद्धि करती रही!  भारतीय नागर विमानन ने समय के साथ अपनी क्षमता एवं कार्यशैली में व्यापक प्रसार एवं सुधर किए और खुद को आगे की तरफ प्रशस्त किया! विमानन की दिशा में भारत सरकार द्वारा आपेक्षित रूप से निजी निवेश की समय-समय पर अनुमति दी गयी, जिसकी संभावना विमानन के शुरुआती दिनों में ही प्रबल हो चुकी थी! निजी निवेश के क्रम में एक कदम और बढ़ाते हुए सन २००४ में भारत सरकार द्वारा हैदराबाद एवं बैंगलोर में निजी हवाई अड्डों के प्रस्ताव को स्वीकृति देकर विमानन के क्षेत्र में निजी निवेशकों को आशा की एक और किरण दिखाई गयी! इसी के परिणाम स्वरुप भारतीय विमानन के क्षेत्र में सन 2005 में किन्गाफिसर  ने प्रवेश किया! हलाकि उसके ठीक बाद २००७-०८ की वैश्विक महामंदी के दौर से विमानन सेवा भी प्रभावित हुआ! विमानन के क्षेत्र में बहुत हद तक रोजगार छीने गए, लोगों की नौकरियां तक गयी, लेकिन परस्पर सहयोग एवं प्रबंधन से भारतीय विमानन को मंदी के संकट से उबार लिया गया! बावजूद तमाम प्रयासों के सन 2011 में किन्गफिसर का आर्थिक ढांचा हिलने लगा  और उसे खुले बाज़ार मदद की  गुहार तक लगनी पड़ी! किंगफिशर की मदद में सरकार के साथ-साथ तमाम निजी निवेशक भी आए और किंगफिशर को आर्थिक संकट से उबरने का प्रयास  अभी तक किया जा रहा है और हर स्तर पर कोशिशे जारी हैं !! खैर यह तो बाज़ार की नियति है, वहां दुकाने लगती हैं, उठती हैं, पर बाज़ार ज्यों का त्यों बना रहता है!
                                                तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद आज जब हम भारतीय नागर विमानन का शतवर्षीय उत्सव मानाने की तरफ कदम बढ़ाते हैं तो हमारे विमानन के वर्तमान को इतिहास द्वारा दी गयी तमाम उपलब्धियां देखने को मिलती हैं, जो हमारे अंतर्मन में उत्साह का संचार करने हेतु काफी हैं! हमने क्या नहीं प्राप्त किया, ये किसी बहंस का मुद्दा नहीं, मुद्दा ये है की हमने क्या पाया? आज हम दुनिया के नौवे सबसे बड़े विमानन बाज़ार के जन्मदाता हैं! आज हम लगभग 82 ओपरेशनल हवाई अड्डों के संरक्षक हैं! आज हम ७३५ एयरक्राफ्ट के एकक्षत्र मालिक हैं! 12 ओपरेशनल एयरलाइन्स के सचालक हैं एवं १२१ नान शेड्यूल्ड ओपरेशनल एयरलाइन्स के प्रबंधक हैं! आज हम इस योग्य है कि एक साल में ५० मिलियन से ज्यादा यात्रियों को विमानन की स्वर्ग्नुमा सुविधा उपलब्ध कर सकते हैं! आज हम समूची दुनिया के विमानन के लिए एक चुनौती हैं! इससे ज्यादा और क्या चाहिए कि हममे बढ़ते रहने का जज्बा है! अंत में  यही कहा जा सकता है कि सन १९११ की उस पहली एयर सर्विस ने अगर भारतीय नागर विमानन के पंखों में जान दी तो हमारे हौसलों में उड़ान भी! आज पूरे सौ साल बाद हमारे पास वो सबकुछ है जो शतवर्षीय उत्सव को मनाने का उन्माद भरता है! आज हमारा नागर विमान जो है वो इतना है कि जितना होना चाहिए!   


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