शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

मुद्दों से भटकाने की साजिश है एफ डी आइ : अमर उजाला में 2 दिसंबर 2011 को प्रकाशित



प्रकाशित  अमर उजाला

"राजनीति में कभी मुद्दे राजनीति को प्रभावित करते हैं तो कभी राजनीति खुद मुद्दों का निर्माण करती है " ! उक्त पंक्तियाँ भारतीय राजनीति के वर्तमान परिवेश में तो कम से कम प्रासंगिक प्रतीत हो ही रहीं हैं !अभी चंद दिनों पहले जब संसद के  शीतकालीन सत्र की की शुरुआत नही हुई थी तब राजनीति के खाते में राजनीतिक हंगामा करने के लिए तमाम राष्ट्र व्यापी मुद्दे थे जिनमे महंगाई,भ्रष्टाचार,यु.पी बंटवारा और अन्ना का लोकपाल जैसे मुद्दे  सरकार के सर पे  सवार होकर बोल रहे थे ! संसद के शीतकालीन सत्र के शुरू होने से पहले राजनीतिक पंडितों द्वारा भी इन्ही मुद्दों पर संसद में हंगामे और बहस कि भविष्यवाणिया की जा रही थीं और तत्कालीन राजनीतिक परिवेश के परिप्रेक्ष्य में ये भविष्यवाणिया स्वाभाविक थीं ! ऐसा कयास भी लगाया जा रहा था कि उपरोक्त सभी मुद्दों पर संसद से सड़क तक सरकार के पास अपना बचाव करने के अलावा कोई ख़ास  उपाय नहीं होगा और सरकार बैकफुट पर नज़र आयेगी   ! भ्रष्टाचार,महंगाई आदि पर जनता का गुस्सा झेल रही सरकार को यु.पी की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा यु.पी बंटवारे का विधानसभा प्रस्तावित प्रस्ताव भेजना आगामी यु.पी चुनाव के मद्देनज़र एक बड़ी मुसीबत लेकर आया जिस पर सरकार को ना तो निगलते  बन रहा था नाही उगलते ! सरकार के सामने यह मजबूरी थी कि वो छोटे राज्यों का विरोध भी नही कर सकती और बंटवारे का श्रेय मायावती को देना भी नही चाहती थी वो भी तब जब चुनाव सर पर हों ! उपरोक्त सभी मुद्दों में यु.पी बंटवारे के मुद्दे को छोड़कर लगभग सभी मुद्दे जनता के मानस पटल से सीधा सरोकार रखने वाले थे और उन सभी मुद्दों पर आम जनता का एक स्पष्ट रुख था !
                                                बावजूद इन सबके राजनीति को तो कुछ और ही मंजूर था ! शीतकालीन सत्र शुरू होने से ठीक पहले सरकार के चाणक्यों ने ऍफ़.डी.आई नामक ऐसा सियासी पासा फेंका कि शीतकालीन सत्र के लिए प्रायोजित एवं पूर्वानुमानित सारे राष्ट्रव्यापी मुद्दे चारो खाने चित्त नज़र आ रहे हैं ! हर ज्वलंत मुद्दा सुस्त पडा किसी कोने में धुल फांक रहा है ! लोकतंत्र का चौथा खम्भा भी तत्कालीन ज्वालामुखियों को किसी सुसुप्त बस्ते में डाल कर अपना सारा ध्यान संसद में चल रही ऍफ़.डी.आई कि हलचलों पर देने व्यस्त दिख रहा है !  केबिनेट द्वारा प्रस्तावित ऍफ़.डी.आई को लेकर हलचले इतनी तेज़ हैं कि मीडिया से लेकर विपक्ष तक सब कुछ भूल कर उसी के पीछे पडा है ! हालांकि इस ऍफ़.डी.आई को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं उन पर अगर गौर करें तो सबसे बड़ा सवाल सियासी पहलू से ये है कि आखिर यही टाईमिंग क्यों? ऍफ़.डी.आई को लेकर इसके टाइमिंग पर ज्यादा सवाल उठ रहे हैं ! आखिर केंद्र सरकार को ऍफ़.डी.आई को लेकर इतनी जल्दीबाजी क्यों हुई कि उसने विपक्ष तो दूर अपने सहयोगियों तक से विमर्श करना उचित नही समझा ?
                                    हालांकि विदेशी खुदरा निवेश के लिए कोई भी इस तरह कि निति तैयार करने एवं उस पर फैसला लेने का संवैधानिक अधिकार कार्यपालिका के पास है बावजूद इसके बिना किसी बहस एवं आम सहमति के सरकार द्वारा जल्दीबाजी में उठाया गया यह कदम लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से अव्यवहारिक प्रतीत होता है ! यही कारण है कि कांग्रेस के अपने ही कुनबे में इस फैसले में की गयी जल्दीबाजी को लेकर विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं !विपक्ष के विरोध को पहले से झेल रही सरकार को ऍफ़.डी.आई  मसले पर खुद अपने सहयोगियों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है !रजनितिक चपलता के धनी कांग्रेस के खेवनहारों ने जिस तरह से ऍफ़.डी.आई के तहत वाल मार्ट को भारतीय खुदरा बाजार में निवेश करने का न्योता दिया है एवं जिस तरह से बाजार में उनकी हिस्सेदारी तय की है ,कहीं ना कहीं सरकार के इस फैसले से भारतीय निवेशक नाखुश हो सकते हैं !हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस फैसले को एक सही कदम बताते हुए यह आश्वासन दिया कि वाल मार्ट के आने से रोजगार के अवसर एवं अर्थव्यवस्था में सुधार कि पुरी संभावना होगी ! मगर भारतीय बाजार को यह बात अब भी गले नही उतर रही आखिर जिन सुधारों कि प्रधानमंत्री सहित सरकार द्वारा गारंटी दी जा रही उन सुधारों कि बुनियाद एवं आधार क्या है ? भारतीय खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेशकों के लिए ५१% हिस्सेदारी का जो दरवाजा सरकार द्वारा खोला गया है,इस पर एक बात गौर करने वाली है कि विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाज़ार में बेचे जाने वाले उत्पादों के आयात को लेकर निवेशको को पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त है कि वो जहां से चाहें सस्ता माल खरीद कर भारतीय बाज़ार में बेचे !
                                                            सन २००४ में ऍफ़.डी.आई में २६% हिस्सेदारी कि हिमायती रही भा.जा.पा के सुर अब बदले बदले से नज़र आ रहे हैं और वो भी इस फैसले को वापस लेने कि मांग पर अडिग है ! भा.जा.पा का यह यु.टर्न कहीं ना कहीं उसके सियासी अवसर के लोभ को दर्शाता है जिसे वो भुनाए बिना नहीं रह सकती है ! लेकिन सरकार के सहयोगी ममता बनारेज़ी ने तो यहाँ तक कह डाला कि अगर वाल मार्ट बंगाल आता है तो उसे जला देंगे तो वहीँ दूसरी तरफ डी.एम्.के सहित केरल कांग्रेस ने भी इसका विरोध किया है!सरकार का यह फैसला आगामी विधानसभा चुनावों में क्या असर डालेगा यह तो अभी दूर कि बात है लेकिन सियासी योद्धाओं द्वारा इस फैसले को व्यक्तिगत सतही सियासी समीकरण के हिसाब से खुद परिभाषित किया जा रहा है !ऍफ़.डी.आई को लेकर संसद  की कार्यवाही ठप के बराबर है और इस मुद्दे के बहाने सरकार को संसद ना चलने देने का ठीकरा विपक्ष के सर फोड़ने का पूरा अवसर भी मिल रहा है लेकिन इस बात को यथार्थ से परे नही रखा जा सकता कि ऍफ़.डी.आई को ढाल  बनाकर बाकी ज्वलंत मुद्दों कि हवा निकालने में सरकार कामयाब नज़र आ रही है ! भले उसके खुद के सहयोगी अभी दूसरी कतार में खड़े नज़र आ रहे हों लेकिन भविष्य में सरकार को उन्हें एक पंक्ति में खडा करने में ज्यादा दिक्कत नही होगी ! ये बात सरकार को बेहतर पता है कि ऍफ़.डी.आई का शगूफा जनता के मानष पटल उस तरह नही छाया है जैसे महंगाई,भ्रष्टाचार एवं अन्ना का लोकपाल आदि हैं ! अत: ऍफ़.डी.आई को सरकार द्वारा प्रयोग किये गए उस हथियार के रूप में भी देखा जा सकता है कि जिसने मीडिया एवं विपक्ष कि शीतकालीन सत्र के लिए की गयी समस्त तैयारियों को किनारे लगा दिया है ! संसद में पूर्व निर्धारित हंगामे को तो सरकार टाल नही सकती थी लेकिन बड़ी चतुराई से उसने हंगामे कि वज़ह को बदल दिया ! वाल मार्ट आये या ना आये ,सरकार फैसला वापस ले या ना ले,लेकिन दाद देनी होगी सरकार के रणनीतिकारों की कि उन्होंने छ: दिन के संसद सत्र में विपक्ष के किसी भी पूर्व नियोजित हथियार का इस्तेमाल तक नही होने दिया ! एक बात तो पहले से तय थी कि संसद के शुरूआती सत्र से ही विपक्ष के तेवर हमलावर होंगे लेकिन ऍफ़.डी.आई के पैंतरे ने विपक्ष के मूल हथियारों जिनमे महंगाई,भ्रष्टाचार,आदि थे ,को निष्क्रिय साबित कर दिया ! सरकार ने हंगाम भी खडा कराया तो अपने ही मुद्दे पर वरना ऍफ़.डी.आई पर आम जनता क्या सोचती है क्या जानती है और कितना जानती है ये जगजाहिर है ? कहीं ना कहीं इस बात को नकारा नही जा  सकता कि सरकार राजनीति की खातिर अर्थनीति को ढाल बनाकर एक अमोघ अस्त्र कि तरह इस्तेमाल कर रही है ! 

शिवानन्द द्विवेदी "सहर"


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