बजट सत्र ख़त्म होने के तुरंत बाद सरकार ने अपनी पिछली शासकीय नीतियों के अनुरूप चलते हुए पेट्रोल की कीमतों में लगभग साढ़े सात रुपये की अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी कर, महंगाई और भ्रष्टाचार से पहले से त्रस्त जनता के ऊपर मानो वज्रपात सा कर दिया है ! ईधन उत्पादों सहित आम आदमी के दैनिक जीवन से जुडी तमाम वस्तुओं की कीमतें जिस तरह से दिन-प्रतिदिन गगनचुम्बी अट्टालिकाओं का रूप लेती जा रही हैं,राष्ट्र की बहुसंख्यक आबादी के लिए चिंता का सबब बना हुआ है ! बहुसंख्यक आम जन मानस के जेब के दायरे से बेपरवाह सरकार द्वारा अन्तराष्ट्रीय बाजार एवं आर्थिक मजबूरियों का हवाला देकर समय-समय पर ईंधन की कीमतों में लागातार वृद्धि की जाती रही है ! बात बहुत ताज़ी है तो जिक्र करना जरुरी होगा कि, अभी 22 मई को यु.पी.ए-2 के तीन साल पुरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह द्वारा दिए गए एक भोज में यु.पी.ए शासन के पिछले तीन साल के कार्यों पर आधारित एक रिपोर्ट कार्ड जारी किया गया ! अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियों की लम्बी फेहरिश्त को सजाकर तैयार किये गए नब्बे पेज के रिपोर्ट कार्ड में महंगाई,भ्रष्टाचार और जनसरोकार से जुडी समस्याओं पर चिंता के दो शब्दों के अलावा कुछ ख़ास नही दिखा ! नब्बे पेज के उस रिपोर्ट कार्ड में भ्रष्टाचार जैसे ज्वलंत मसले को महज़ आधे पेज में निपटा देना इस बात को प्रमाणित करता है कि सरकार अभी भी अपनी नीतियों के प्रति सजग होने को तैयार नही दिख रही ! इंधन उत्पादों की दिन-प्रतिदिन बेलगाम होती कीमतों एवं इस पर सरकार द्वारा बतायी जा रही वही रटी रटायी मजबूरियां सरकार की आर्थिक नीतियों एवं नीयत पर ही सवाल खड़े होते हैं ! सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वाकई सरकार की नीतिया जनहित को ध्यान में रख कर ही तैयार हो रही हैं या इन नीतियों में पूंजीवादी हस्तक्षेप का प्रभाव कायम होता जा रहा है ? क्या वाकई हमारी अर्थव्यवस्था इतनी लचर हो चुकी है कि हम बेलगाम हो रही महंगाई पर सिर्फ मूक बनकर खड़े रहने के अलावा कुछ और करने की हालत में नही हैं ?सवाल इस बात पर भी उठ रहे हैं कि सत्ता में पूंजीवादी हस्तक्षेप का वर्चस्व इस कदर तो नहीं बढ़ गया है कि नीति निर्माण में भी उनका प्रभाव काम कर रह है ? पुरी दुनिया के आर्थिक हालात लचर होने का हवाला देकर जनता के ऊपर कमर तोड़ महंगाई का बोझ डालने वाली यु.पी.ए सरकार के नीयत पर सवाल यूँ ही नही उठ रहे,इसकी वजह भी है ! अगर वाकई दुनिया की अर्थव्यवस्था अस्थिरिता के दौर से गुजर रही है तो आखिर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव भारत पर ही क्यों पड़ रह है ? क्योंकि अगर आंकड़ो पर गौर करें तो हमारे पड़ोसी देश जिनके आर्थिक अथवा आतंरिक हालात हमसे बेहतर नही हैं , में पेट्रोल की कीमतें हमसे ज्यादा बेहतर एवं स्थायी हैं ! एक आंकड़े के अनुसार पेट्रोल की कीमत बांगलादेश में ५२ रुपये,नेपाल में ६५ रुपये, बीजिंग में ४८ रुपये तो वहीं पाकिस्तान में ४८ रुपये ही है ! ये आंकड़े इस सवाल को पुरोजोर तरीके से उठाते हैं कि आर्थिक अस्थिरता से जूझ रही दुनिया में आखिर इस अस्थिरता का सबसे ज्यादा प्रभाव भारत पर ही क्यों पड़ रह है जबकि नेपाल जैसे देशों की आतंरिक एवं आर्थिक हालात हमसे किसी भी दृष्टिकोण से बेहतर नहीं हैं ? आखिर यह कैसा आर्थिक संकट है जिसके समाधान में हर दुसरे महीने डीजल पेट्रोल की कीमतों को बढ़ा दिया जाता है ?
उपरोक्त सवालों के आधार पर सरकार के कार्यों एवं क्रियान्वयन नीतियों का अगर विश्लेषण किया जाय तो एक बात स्पष्ट तौर पर सामने आती है कि इस सरकार में जनता के प्रति अपनी नीतिगत दायित्वों के निर्वहन का अभाव है और कहीं ना कहीं यह सरकार बहानेबाजी के रास्ते अपने जवाबदेही से मुकर रही है ! अपनी वैदेशिक आयात-निर्यात की नीतियों में अमेरिकी दबाव एवं आतंरिक आर्थिक नीतियों में अल्पसंख्यक पूंजीवादी दबाव को झेल रही सरकार या तो बहुसंख्यक आम जनमानस के जरुरत और मजबूरियों को समझने का प्रयास नही करती या इसको समझने की जरुरत नही समझती ! आम जनता के हितों के प्रति राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव इस सरकार एवं इसके घटकों में प्रमुख तौर पर परिलक्षित होता है ! हाल ही में पिछले दिनों अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के रायटर्स बिल्डिंग जाने का प्रभाव ही तो कहेंगे कि पेट्रोल में हुई वृद्धि पर ममता बनर्जी के तेवर काफी नरम से दिख रहें हैं ! अगर आप भूले नहीं हों तो ये वहीँ ममता बनर्जी हैं जो दस साल बाद हो रहे रेल किरायों में सामान्य एवं अनिवार्य वृद्धि पर सरकार के साथ नूरा कुश्ती का ऐसा खेल खेलीं कि तत्कालीन रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को पड़ छोड़ना पड़ गया ! आज वही ममता बनर्जी तेल के दामो में हो रही गुणोत्तर वृद्धि पर महज विरोध के नाम पर इतना ही कहती हैं कि हम इससे सहमत नही ! ममता बनर्जी के नरम तेवर यही दिखाते हैं कि क्या सरकार और क्या उसके घटक दल सभी कहीं ना कहीं वाह्य दबावों में बंधे जनता के साथ छलावा कर पूंजीवादी हितों में काम कर रहे हैं !इस पुरे मामले में सरकार की नीतियाँ कहीं से जनहित को ध्यान में रख कर तैयार की गयीं नही प्रतीत होती हैं ! तमाम महत्वाकांक्षी योजनाओं के नाम पर अरबों-करोंड़ो कि खर्चीली योजनाए लाकर जनता की सहानुभूति पाने की दोहरी नीति पर काम करने वाली इस सरकार ने मूलभूत बुनियादी चीजों को लेकर जनहित को सदा से ही हाशिये पर रखने का काम किया है ! इस सन्दर्भ में इस तथ्य को भी नकारा नही जा सकता कि अब शासकीय कार्यों में पूंजीवादी हस्तक्षेप बढ़ता जा रह है और परिणामत: हमारे दोनों सदनों में पूंजीवादी वर्ग कि पैठ दिन -प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है और उनकी संख्या में भी इजाफा ही होता जा रह हैं ! इसमे कोई दो राय नही कि संसद के अन्दर पूंजीवादी वर्चस्व जितना बढ़ता जाएगा हमारी शासकीय नीतियाँ भी उसी अनुरूप जन सरोकारों से दूर कहीं पूंजीवादी ताकतों के हितों में काम करने को मजबूर होती जायेंगी ! आज पूंजीवादी वर्चस्व का ही परिणाम है कि इंधन उत्पादों के कीमतों में सरकार का नियंत्रण घटता जा रहा है और निजी निवेशक अपनी मनमानी का दबाव सरकार पर बना रहे हैं ! सरकार और पूंजीवादी वर्ग के बीच के सांठ-गाँठ की ही देन है कि जनता महंगाई से त्रस्त है और हम बाजार को बचाने का हवाला दे रहे हैं ! इसे राष्ट्र की राजनीतिक चपलता ही कहेंगे कि इंधन उत्पादों की कीमतों में बढ़ोत्तरी होने पर सरकार द्वारा इसके सरकारी नियंत्रण में नही होने का हवाला देकर अपना पल्ला झाड लिया जाता है जबकि अगर कभी इसके कीमतों में कमी लायी जाती है तो वही सरकार सारा श्रेय खुद लेकर अपनी पीठ थप-थपाने से नहीं चुकती ! कहीं ना कहीं इस अर्थ के अनर्थ शास्त्र से जूझ रहे आम लोगों के के अन्दर यह धारणा बन चुकी है कि महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर सरकार की नीयत ही ठीक नही है ! बाजारवाद और अंतर्राष्ट्रीय शाख को पुख्ता करने में जुटे हमारे रहनुमाओं अपनी नीतियों में बदलाव लाने की जरुँरत है ! रिपोर्ट कार्ड के जरिये अपनी उपलब्धियों को गिनाकर आगामी लोकसभा चुनाव की जमीन तैयार करने की कवायदों में जुटी यु.पी.ए को अपनी नीतियों में पूनाराविलोकन कर उन्हें जनसरोकारी बनाने की जरुरत है !जनता के प्रति अपनी सही जवाबदेही की बजाय बहानेबाजी के बयान कहीं ना कहीं आगामी चुनाव में घातक साबित हो सकते हैं ! दुनिया के बेहतर अर्थशास्त्रियों में से एक भारतीय प्रधानमंत्री को दलगत नीतियों से ऊपर उठकर इस यक्ष प्रश्न का हल निकालने की जरुरत है एवं जनहित से जुडी नीतियों पर काम करने की जरुँरत है ! क्योंकि , आज महंगाई से त्रस्त जनता को ना तो अंतर्राष्ट्रीय मजबूरियां स्वीकार्य हैं ना ही आर्थिक अस्थिरता ही मंजूर है ! आज आम जनता को सिर्फ यही चाहिए कि " जनता द्वारा जनता के लिए चुनी गयी सरकार सिर्फ जानत के लिए काम करे !
शिवानन्द द्विवेदी "सहर"
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