किसी भी राष्ट्र के क़ानून व्यवस्था के दृष्टिकोण से जेलों का बहुत अधिक महत्व रहा है !क़ानून व्यवस्था को बनाये रखने एवं अपराध नियंत्रण के लिए जेलों की अनिवार्यता को हर शासन व्यवस्था द्वारा स्वीकार किया गया है परन्तु जेलों को लेकर सुधार गृह की मान्यता को ज्यादा बल दिया जाता रहा है बजाय कि यातना गृह ! संवैधानिक एवं सामाजिक दोनों दृष्टिकोणों से जेलों को अपराधियों के चारित्रिक सुधार के उपयुक्त बनाने की वकालत हमेशा से की जाती रही है और इस बात पर बल दिया जाता रहा है कि दंड का उद्देश्य तभी पूरा होगा जब हमारी जेलें सुधार गृह के तौर पर सफलता से काम कर पाएंगी ! वर्तमान परिवेश में अगर कारागारों की स्थिति देखें तो यह स्पष्ट होता है कि सलाखों के भीतर सब कुछ वैसा नहीं चल रहा जैसा कि चलना चाहिए ! अगर भारत के संदर्भ में जेलों की स्थिति पर नजर डालें तो प्रथम सवाल कैदियों के अनुपात में जेलों के उपलब्ध नहीं होने पर खड़ा होता है ! सवाल ये है कि या तो हम जनसँख्या और बदलते आपराधिक परिवेश के अनुकूल जेलें बनवाने में नाकाम साबित हो रहे हैं या अपराध को नियंत्रित करने में लागातार असफल होते जा रहे ? आज अगर एक आंकड़े पर गौर करें तो भारत की कुल लगभग चौदह सौ छोटे-बड़े जेलों में लगभग तीन लाख बीस हज़ार कैंदियों के रखे जाने का इंतजाम है जबकि कुल कैंदियों की संख्या तीन लाख साठ हज़ार से भी ज्यादा है ! बढते अपराधों को कारण माने या धीमी न्याय प्रणाली का असर कि भारतीय जेलों में ज्यादातर कैंदी अंडर ट्रायल हैं जबकि सजायाफ्ता कैंदियों की संख्या अंडर ट्रॉयल कैंदियों की तुलना में काफी कम है !
जेलों के भीतर बढ़ती इस भींड में क्या हम जेलों को बनाने के वास्तविक उद्देश्यों को प्राप्त कर पायेंगे यह देश और प्रशासन के समक्ष बड़ा सवाल है ? निश्चित तौर पर जेलों के अंदर इस असंतुलन की स्थिति में सुधार गृह के अनुकूल वातावरण बना पाना संभव नहीं प्रतीत होता ! अपराध नियंत्रण के नाम पर जेलों की प्रासंगिकता पर सबसे ज्यादा प्रश्न चिन्ह तब लगता है जब आये दिन जेलों के अंदर बढ़ रहे आतंरिक अपराधों,आत्महत्यायों और तमाम तरह के साठ-गाँठ की खबरे आती रहती है ! देश के तमाम राज्यों की जेलों में बंद अपराधी प्रवृति के रसूखदार लोगों के पास से मोबाइल आदि का बरामद होना निश्चित रूप से चिंता का विषय है और जेलों के व्यवस्थापन की पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है ! अपराध नियंत्रण के उद्देश्यों से बनाई गयी जेलों के अंदर ही अगर आतंरिक अपराध फलने-फूलने लगे तो शायद अपराधियों के सुधार की संभावना कम होना स्वाभाविक है ! हालाकि ऐसा कतई नहीं है कि ये सब इतनी आसानी से संभव है,निश्चित तौर पर ऐसे मामलों में जेल के अधिकारी एवं कर्मचारियों की संलिप्तता लागातार सामने आती रही है जिसके परिणाम स्वरुप तमाम पेशेवर अपराधी जेलों के अंदर से अपनी अपराधिक गतिविधियां संचालित कर जेलों के उद्देश्यों और दंड नीतियों को मुह चिढा रहे है,जो जेल व्यवस्था के ऊपर बड़ा प्रश्न चिन्ह है ! जेलों के अंदर की समस्याएं यहीं तक सीमित नहीं हैं,इनके अलावा तमाम ऐसी बुनियादी समस्याएं हैं जो कहीं ना कहीं जेलों के वास्तविक उद्देश्यों के पुरे होने में अवरोधक की तरह हैं ! बढते कैंदियों के भींड तले दबते जेल कैंदियों की मूलभूत जरूरतों को भी पूरा कर पाने में लागातार असफल साबित हो रहे हैं ! अगर बात जेल के अंदर बंद कैंदियों के स्वास्थ्य,पोषण,सुधार परक शिक्षा,रोजगारपरक प्रशिक्षण आदि को आधारभूत मान कर की जाय तो भी कहीं ना कहीं इन सारे सुविधाओं पर कैंदियों और जेलों की संख्यानुपात का असंतुलन भारी पड़ता नजर आता है ! जेलों के अंदर कैंदियों के शारीरिक एवं मानसिक स्थिति के प्रति जेल पर्यवेक्षकों या अधिकारियों के ढुलमुल रवैये के कारण आये दिन कैंदियों के रोगग्रस्त होने,आपसी झड़प करने एवं आत्महत्या आदि करने की घटनाये सामने आती रहती हैं ! जेलों के अंदर की बड़ी विडंबना तो यह भी है कि एक तरफ जहाँ रसूखदार कैंदियों के लिए तमाम घरेलूं संसाधनों से संपन्न इंतज़ामात किये जाते हैं वहीँ आम कैंदियों की मूलभूत सुविधाओं में कटौती की जाती है, जिससे तमाम कैंदियों में अवसाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और परिणामत: उनके मन में जेलों के प्रति साकारात्मक दृष्टिकोण ना आकर यातना गृह का भाव आ जाता है ! कहीं ना कहीं बुनियादी सुविधाओं को तरसते जेलों में आम कैंदियों की हालात बहुत बेहतर नहीं है और शायद यही कारण है कि जेलें अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो पा रहीं !
अगर विश्व के तमाम प्रमुख देशों के जेल पद्धतियों एवं वहाँ के जेलों के हालात पर नजर डालें तो तमाम देशों के जेलों के हालात भी हमारे जेलों के इर्दगिर्द ही प्रतीत होते हैं !अगर अमेरिका के जेलों के हालात पर नजर डालें तो वहाँ भी जेलों की संख्या के अनुपात में कैंदियों की संख्या में लगभग पाँच प्रतिशत का सामान्य असंतुलन देखने को मिलता है ! हालाकि भारत के अनुपात वहाँ अंडर ट्रायल कैंदियों की संख्या बहुत कम है और सजायाफ्ता कैंदियों कि संख्या ज्यादा है जो कि वहाँ की तीव्र न्याय निस्तारण प्रणाली को दिखाता है !इस आधार पर अगर तथ्यात्मक रूप से देखें तो न्याय प्रणाली में धीमापन भी भारतीय जेलों की बदहाली के एक प्रमुख कारण के रूप में नजर आता है क्योंकि भारत में अंडर ट्रायल कैंदी सजायाफ्ता कैंदियों की तुलना में दोगुने की तादाद में हैं ! जेलों के व्यवस्था के मामले में हम अपने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से बहुत बेहतर हैं लेकिन दोनों देशों की आंतरिक परिस्थितियां विभिन्न हैं इसलिए इस तुलना का कोई विशेष तार्किक महत्व नहीं है!
आज जब आंकडो के आधार पर भारतीय जेलों की स्थिति पर नजर डालते हैं तो हर दृष्टिकोण से जेल अपने उद्देश्यों में असफल नजर आ रहे और सुधार गृह के नाम पर यातना गृह का रूप लेते जा रहे हैं, जहाँ कैंदियों को अलग-अलग तरीके से प्रताड़ित किया जा रहा है !इसमे कोई दो राय नहीं कि हमें समय रहते ही अपने मूल उद्देश्यों से भटकते इन जेलों के प्रति गंभीर होने की जरुरत है और उन तमाम बिंदुओं पर सजग होने की जरुरत है ताकि जेलों के अंदर एक स्वस्थ माहौल बनाया जा सके ! जेलों का उद्देश्य अपराध के खिलाफ लोगों को सचेत कर उन्हें जीवन के साकारात्मक कार्यक्षेत्रों के प्रति जागरूक करना होना चाहिए जिससे कि समाज में अपराध का बोलबाला कम हो ! अगर जेल अपने इन उद्देश्यों से भटकते जायेंगे तो इसका सबसे ज्यादा खामियाजा समाज को भुगतना पड़ेगा ! जेल प्रशासन को समय समय पर कैंदियों की मूलभूत जरूरतों के अनुरूप सुविधाएँ देने हेतु कदम उठाने की जरुरत है साथ ही न्याय प्रणाली में मामलों के निस्तारण में तीव्रता की भी जरूरत है, जिससे जेलों में भींड की स्थिति ना उत्पन्न हो ! हमें नहीं भूलना चाहिए कि सही मार्गदर्शन पाकर तमाम अपराधी जेलों से निकलने के बाद बहुत ख्याति प्राप्त किये हैं !
शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

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