शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

सियासी नूराकुश्ती में पटरी से उतरती रेल : अप्रकाशित लेख



                                                            लागातार बढ़ रही रेल दुर्घटनाओ एवं अनियंत्रित होती जा रही रेल की रफ़्तार ने भारतीय रेलवे को सवालों के घेरे में खडा कर दिया है ! जिस तरह से पिछले कुछ महीनो में देश को एक के बाद एक रेल दुर्घटनाओ से रूबरू होना पडा है तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारतीय रेलवे में सब कुछ पटरी पर  नही चल रहा है और आखिर क्यों रेलवे प्रबंधन तंत्र रेलगाड़ियों को पटरी पर लाने में कामयाब नही हो पा रहा है ? सवाल यह भी उठता है कि आये दिन हो रही इन रेल दुर्घटनाओ पर नियंत्रण के क्या इंतजाम किये जा रहे हैं ? दुनिया की चौथी बड़ी रेल सेवा आज भी इस यक्ष प्रश्न का सटीक समाधान ढूढने में कामयाब नही हो पा रही कि बेलगाम होती रेल दुर्घटनाओं पर लगाम कैसे कसा जाय ? हालाकि रेल दुर्घटनाओ को रोकने एवं यात्री सुरक्षा को पुख्ता करने के उद्देश्य से बजट दर बजट कुछ ना कुछ प्रावधान जरुर लाया जाता रहा है लेकिन बजट के योजनाओ का सही नियोजन नही होने और सियासी नूराकुश्ती के बीच सारी योजनाए यथावत धरी की धरी रह जाती हैं !  रेल यात्री सुरक्षा के साथ-साथ दुर्घटना नियंत्रण के सन्दर्भ में अगर पिछले बजट को उदाहरण के तौर पर देखें तो पुरे बजट में राजनीतिक अहं का हस्तक्षेप चरम पर दिखता है और पुरे बजट में सियासत का वर्चस्व देखने को मिलता है ! हालाकि इसमे कोई दो राय नही  रेल सुधारों के क्रम में बिना किसी अध्यनपरक दूरदर्शी योजना निर्माण एवं उसका  सही क्रियान्वयन किये बिना  रेलवे सुधारों को अमली जामा पहनाने  के लिए किसी के पास ना तो  कोई जादुई छडी  है और ना ही इन सुधारों के लक्ष्य को रातो-रात पाया जा सकता है ! आज अगर रेलवे दुर्घटनाये हमारे  लिए चुनौती के रूप में उभरी हैं तो इसका समाधान भी चुनौतियों को स्वीकार कर, इस दिशा में सही योजना निर्माण कर एवं उसके  सही क्रियान्वयन द्वारा ही  किया जा सकता है ! आज रेल सुधारों में सियासी हस्तक्षेप भी एक बड़ी चुनौती  ही बने हुए हैं जो सुधारों में बाधक के तौर पर कहे जा सकते हैं ! रेल बजट में सियासी हस्तक्षेप देखने के लिए  हमें ज्यादा पहले ना जाकर इसी सत्र के रेल बजट को देखने की जरुरत है !  २०१२-१३ के तत्कालीन रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी द्वारा प्रस्तुत बजट को अगर रेल सुधारों के परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास करे तो तो इसमे रेल सुरक्षा के आधुनिकीकरण पर जोर दिया गया था और इसी के अंतर्गत जीरो-टक्कर तकनीक लाने की बात की गयी थी ! जीरो टक्कर तकनीक की योजना के तहत रेल दुर्घटना के स्तर को ०.५५ से ०.१७ तक लाने का लक्ष्य हासिल करने का विश्वास भी जताया गया था, और इस दूरदर्शी रेल सुरक्षा सुधार योजना में लगभग आधुनिकीकरण  आदि के नाम पर ५.६० लाख करोंड के खर्च का बजट भी प्रस्तावित किया गया था ! उक्त योजना को तत्कालीन रेल मंत्री द्वारा रेलवे आधुनिकीकरण समिति के अध्यक्ष सैम पित्रोदा एवं रेलवे उच्च संरक्षा समिति के अध्यक्ष अनिल काकोदकर की सिफारिशों के आधार पर लागू करने की योजना बनाई गयी थी , जिसमे रेलवे सुधारों एवं रेलवे के आधुनिकीकरण की तमाम संभावनाओ को दूरदर्शिता के साथ देखा गया था ! लेकिन इसे रेलवे में सियासी हस्तक्षेप का दुश्चक्र ही तो कहेंगे कि  अनिवार्य एवं दस साल बाद हो रही मामूली रेल किरायों में वृद्धि के नाम पर तत्कालीन रेल मंत्री को जबरन पद छोड़ने को मजबूर किया गया एवं बतौर रेल मंत्री उनके द्वारा किये गए दूरदर्शी अध्यनो की कब्र पर सियासी अहं का परचम फहरा दिया गया ! पूर्व रेलमंत्री ममता बनर्जी ने इस बजट को अपनी नाफ़रमानी मानते हुए सरकार पर दबाव बनकर दिनेश त्रिवेदी से इस्तीफा दिलवा दिया और रातो-रात मुकुल राय को रेल भवन भेज दिया गया ! हमेशा से ही रेलवे को सियासत के दंश का शिकार होना पड़ा है और सियासी के अहं के बीच उसकी मूल सुधारों की बात कहीं दफ़न सी रह जाती है ! चूँकि रेल सुरक्षा देश के लिए आज किसी चुनौती से कम नही है अत: इसके भावी योजनाओ के मद्देनजर यात्री किरायों में सामान्य बढ़ोत्तरी को किसी भी दृष्टिकोण से गलत नही ठहराया जा सकता ! लेकिन आज सच्चाई सिर्फ यही है कि सियासत सिर्फ सियासत जानती है उसे सरोकारों का कोई ज्ञान भी नही होता और जरुरत भी नही होती  ! दिनेश त्रिवेदी के महीनो के अध्यनो और आगामी सालों के दूरदर्शी योजनाओ को ताक पर रखते हुए महज़ एक सियासी अहं ने मुकुल राय को बतौर रेल मंत्री देश के ऊपर थोप दिया  ! इस पुरे सियासी हडकंप का ना तो कोई विजन था ना कोई अध्यनपरक उद्देश्य, बस अपनी जिद को मनवाने की चाह ने सारी योजनाओ के क्रियान्वयन का गला घोंट दिया ! शायद जिन नीतियों के तहत दिनेश त्रिवेदी ने इन योजनाओ का रूप रेखा तैयार किया होगा वो नीतिया बतौर रेलमंत्री मुकुल राय नही अखितियार करें ! आज भी रेल दुर्घटनाए हो रही हैं तब भी होती थी ! पहले भी दुर्घटनाओ के समाधान से मूह मोड़ने का मुआवजा अस्त्र खूब कारगर था आज और धारधार होता जा रहा है ! दुर्घटना के बाद मुआवजे की सियासी मरहम इस देश के हर घाव के को ठंढक देने वाला एक महफूज मरहम बनता जा रहा है ! समस्या के समाधान की बजाय मुआवजे का मरहम लगाने का यह सियासी फार्मूला सरकारी पैसे से अपनी रोटी सेकने का अच्छा तवा साबित हो रहा है ! हाल ही में दो दिन पहले हुए दून एक्सप्रेस दुर्घटना में रेलमंत्री ने मृतकों को पांच -पांच लाख और घायलों को एक-एक लाख देकर समस्या का त्वरित समाधान वाला फार्मूला निकाल लिया !
                                                            बुनियादी तौर  पर आज हमारी रेल कई मामलों में सुधार की मोहताज है ! आज हमारे पास रेलगाड़ियों की संख्या के अनुपात में ना तो पर्याप्त चालाक हैं और ना ही अन्य कर्मचारी ! हर बजट में रेलमंत्रियों  द्वारा अपने सियासी जमीन के अनुकूल नई रेलगाड़ियों का ऐलान किया जाता रहा है लेकिन आज भी नई गाड़ियों के अनुपात में रेल भर्ती   होने के बजाय सेवानिवृति के अनुपात में रेल भर्तिया होती हैं परिणामत: रेलगाड़ियों के अनुपात में कर्मचारी अथवा चालक संख्या में भारी असंतुलन का सामना करना पड़ता है ! अगर एक चालक से हम अतिरिक्त सेवा लेते हैं तो निश्च्घित तौर पर दुर्घटनाओ की संभावनाए ज्यादा होती हैं ! आज भी हमारा रेलवे तंत्र पुरी तरह से दो तरफ़ा आवागमन के रेल पटरियां तैयार नही कर पाया है और बहुत जगहों पर रेल आवागमन एक ही रेल पटरी मार्ग पर निर्भर हैं ! सिंगल रेल मार्ग होने की वजह से ट्रेनों में विलम्ब से चलने की समस्या  भारतीय रेल के लिए अपने आप में एक बड़ी चुनौती बनी हुई है ! बिलम्ब की समस्या से जहाँ हम यात्रियों में असुविधा का भाव उत्पन्न  रहे हैं तो वही रेल सेवा को अतिरिक्त खर्च का भार भी सहन करना पड़ रहा रहा है ! कुछ क्षेत्रों में रेल सेवा में आधुनिकीकरण के नाम पर तमाम क्रांतिकारी बदलावों को जरुर देखा गया है जिसमे कंप्यूटरकृत आरक्षण प्रमुख है , परन्तु सही क्रियान्वयन नीति नही होने की वजह से इसमे भी तमाम खामिया आज भी बनी हुई हैं ! आज रेलवे में बढ़  रही दुर्घटनाए हमारे लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने है और इससे निजात पाने के लिए सबसे पहले इसे सियासी प्रभाव से मुक्त करने की जरुरत है ! सियासी नफ़ा-नुकसान के अनुरूप रेलवे को कभी मुनाफे तो कभी घाटे का सौदा बताकर अपनी सियासी पैठ को पुख्ता करने की राजनीति से हमारे नेताओं को बाज आना होगा ! सुरक्षित रेल यात्रा के लिए इसके आधुनिकीकरण पर बल देने की जरुँरत है एवं आधुनिक तकनीक के माध्यम से इसे संचालित करने वाली योजनाओ को नीतिगत तौर पर लागू करने की जरुँरत है ! दुनिया की चौथी बड़ी रेल सेवा को अपने स्तर में सुधार करने के लिए सही नीति निर्माण पर बल देने के साथ साथ विदेशी रेल तकनीको पर अध्यन करने एवं उसको भारत में लाने के उपायों पर ख़ास बल देने की जरुरत  है ! रेलवे को दुर्घटना मुक्त एवं सुरक्षित तकनीक संपन्न बनाने का सपना तभी पूरा होगा जब भारतीय रेल सियासत के पटरी से उतर कर कहीं विकास की पटरी तलाशने में सफल हो पाती है !  मुआवजे और दुर्घटना के बीच हमारी रेल सालों से हाशिये पर है और उस मुकाम को नही पा रही जिस पर उसे होना चाहिए !इसे अपना रास्ता बदलना ही होगा !

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