शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

आरक्षण की अंदरूनी सियासत : दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख



प्रमोशन में आरक्षण की अंदरूनी सियासत
सियासत के सन्दर्भ में अगर यह बात कहें तो गलत नहीं होगा कि कई बार मुद्दा गढ़ने के लिए सियासत की जाती है तो अक्सर सियासत करने के लिए मुद्दे गढे जाते रहे हैं ! आज जब कोल आवंटन घोटाले के मसले पर सदन से सड़क तक विरोध ही विरोध झेल रही यु.पी.ए सरकार को चौतरफा हमला झेलना पड़ रहा है तो कहीं ना कहीं यु.पी.ए रणनीतिकारो को इस बात का आभास जरुर होगा कि जल्द से जल्द इस मसले को ठंढे बस्ते तक कैसे ले जाया जाय जिससे कि मामले को शांत किया जा सके ! वैसे इस बात को भी नाकारा नही जा सकता कि पारंपरिक तौर पर औरों से ज्यादा परपक्व कांग्रेस हमेशा मुद्दों के विकल्प रूपी तीर अपने तरकश में रख कर चलती रही है ! महिला आरक्षण विधेयक भी उसी तरकश का एक हथियार मात्र है जो समय समय पर जरुरत के हिसाब से प्रयोग भी किया जाता रहा है ! आज जब कोल आवंटन घोटाले पर सदन की कार्यवाही ना के बराबर है तो सत्ताधारी होने के नाते घोटाले से लेकर सदन ना चला पाने तक का ठीकरा सरकार के ऊपर फूटना स्वाभाविक है क्योंकि विपक्ष तो सिर्फ अपनी विपक्ष की अवसरवादिता का धर्म ही निभाएगा और उसकी जवाबदेही भी उतनी नहीं है जितनी सरकार की ! अपने आचरण के अनुकूल कांग्रेस खेवनहारो ने “प्रोन्नति में एस.सी./एस.टी को आरक्षण देने सम्बन्धी संशोधन प्रस्ताव को केबिनेट की मंजूरी दिलाकर एक नया सियासी पैंतरा चल दिया जिसका लक्ष्य ना सिर्फ कोल आवंटन मसले के बोझ को हल्का करना है बल्कि इसके तमाम दूरगामी उद्देश्य भी निहित हैं ! अगर गौर किया जाय तो एक तथ्य अधिकतम स्थितयों में देखने को मिलेगा कि कोई भी महत्वपूर्ण अथवा मुद्दागत विधेयक सरकार द्वारा संसदीय सत्र के अंतिम दिनों में ही प्रस्तावित किया जाता है जहाँ उस विधेयक की साँसे त्रिशंकु की तरह अधर में लटकी नजर आती है और मामला सनसनीखेज भी बना रहता है ! इस सन्दर्भ में शीतकालीन सत्र का लोकपाल विधेयक एक बड़ा उदाहरण माना जा सकता है ! वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में अगर सरकार द्वारा प्रमोशन में एस.सी/एस.टी आरक्षण संशोधन विधेयक लाया जा रहा है तो एक सवाल यह भी उठता है कि पहले से ही तमाम विधेयकों को पास कराने में असफल रही सरकार आखिर यह महत्वपूर्ण विधेयक उस स्थिति में क्यों ला रही है जब सदन की कार्यवाही ही ठप के बराबर है और विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री तक से इस्तीफा देने की मांग की जा चुकी है ? किस आधार पर सरकार को ऐसा लगता है कि वो प्रमोशन में आरक्षण विधेयक इन परिस्थितयों में पास करा पायेगी जबकि वो अभी तक सदन को स्थायित्व दे पाने में सफल नही रही है ? सवाल यह भी उठता है कि क्या वाकई एस.सी/एस.टी को प्रमोशन में आरक्षण देने की नीयत से यह प्रस्ताव लाया गया है या ये महज स्थिति और मुद्दा प्रबंधन का हथियार मात्र है ?
            प्रमोशन में आरक्षण मसले पर अगर अंदरूनी सियासी मंसूबों का अगर आकलन करें इस बात से कतई नकारा नही जा सकता कि प्रमोशन में आरक्षण को जिस समय पब्लिक डोमेन में  बहस पटल पर रखा गया है वो कहीं ना कहीं ना कहीं कोल आवंटन मसले के उठ रहे तापमान को ठंढा करने की कवायदों का एक पैंतरा है और इसी पैंतरे से कहीं ना कहीं बी.जे.पी को सदन तक लाने की कोशिश भी की जा रही है ! गौर करने वाली बात है कोल मसले पर विपक्ष को संसद तक ला पाने में असफल सरकार की कोशिशे हैं कि सत्र के अंतिम दिनों में प्रमोशन में आरक्षण को मुद्दा बनाकर कोल आवंटन से लोगो का ध्यान हटाया जाय एवं इस नए मुद्दे को हवा दी जाय ! सत्र के अंतिम दिनों में अगर यह विधेयक नहीं पास होता तो सरकार इसका ठीकरा बड़ी आसानी से विपक्ष के सर फोड सकती है ! यह तो तय है कि व्यवहारिक रूप से केन्द्र सरकार द्वारा प्रस्तावित प्रमोशन में आरक्षण इतनी आसानी से पास होता नहीं दिख रहा लेकिन सियासी उठापटक की प्रबल संभावनाओ को भी नकारा नहीं जा सकता ! जैसे ही केन्द्र सरकार द्वारा प्रमोशन में आरक्षण की बात की गयी और केबिनेट द्वारा इसकी मंजूरी दी गयी मायावती का यह बयान गौर करने वाला हो जात है कि बी.जे.पी को सदन आकर सदन की कार्यवाही चलने देनी चाहिए ताकी यह विधेयक पास हो सके ! दलित प्रतिनिधियों के माध्यम से यह पासा फेककर कांग्रेस यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि वो दलितों की प्रबल हितैषी है मगर यह संभव नही हो पायेगा क्योंकि विपक्ष प्रमोशन में आरक्षण नही चाहता ! मुद्दों को स्थानान्तरण और नियोजन का कुछ ऐसा प्रबंध भी किया गया कि कोल आवंटन घोटाले को लेकर सदन का बायकाट कर रहे विपक्ष के बारे में सदन में यह सन्देश जाए कि विपक्ष ने आरक्षण के मसले पर सरकार का साथ नहीं दिया और सदन ना चलाकर अप्रत्यक्ष रूप से प्रमोशन में आरक्षण का विरोध किया ! हालांकि इस मुद्दे पर सरकार के अपने ही कुनबे के महत्वपूर्ण सहयोगी मुलायम सिंह यादव के विरोध का सामना सरकार को करना पडेगा लेकिन उसकी भरपाई में यु.पी के दलित नेता मायावती को लेकर करने को सरकार आश्वस्त दिख रही है ! मुद्दे से जनता का ध्यानान्तरण कर विपक्ष को घेरने या विपक्ष के घेरे से मुक्त होने के लिए चले गए इस मोहरे का तमाम दूरगामी मायने भी है क्योंकि इसका भावी संघर्ष ब.स.पा और कांग्रेस के बीच यु.पी में देखने को मिल सकता है लोकसभा चुनाव में ! लोकसभा चुनाव के दृष्टिकोण से ही बोलते हुए मायावती ने यह भी कहा कि यह हमारी मेहनत का फल है और इसके लिए हमने सदन से सड़क तक बहुत संघर्ष किया है ! निश्चित तौर पर अगर मायावती के इस बयान के मायने निकाले तो मायावती इस बात को बखूबी जानती हैं कि प्रमोशन में आरक्षण मुद्दे को कांग्रेस द्वारा आगामी लोकसभा चुनाव में भी इस्तेमाल कर दलित वोट बैंक में सेंध डालने की कोशिश के तौर पर इस्तेमाल किया जायेगा ! अगर आगामी लोकसभा चुनाव तक प्रमोशन में आरक्षण मुद्दा कायम रहता है तो निश्चित रूप से कांग्रेस इसका इस्तेमाल करेगी ! अगर यह विधेयक पास हो जाता है तो इस उपलब्धि में श्रेय का संघर्ष मचना भी तय है जोकि उन्ही लोगो के बीच मचेगा जो आज इस मसले पर एकजुट दिख रहे हैं ! प्रमोशन में आरक्षण से कोल आवंटन को साइड लगाने और गेंद विपक्ष में डालने के इस चाल से कांग्रेस का मंसूबा कई शिकार करने का होगा ! अगर वाकई इस मुद्दे पर बहस होती है तो सबसे पहले तो विपक्ष ही अपने घटकों के अन्तर्विरोधो से जूझेगा जिसमे राजग के प्रमुख घटक जदयू के विचार इस मसले पर बी.जे.पी से अलग दिखने लगे हैं !
प्रमोशन में आरक्षण से किसको क्या मिलेगा यह तो बहुत दूर की बहस हैं ! तत्कालीन बहस तो यही है कि आरक्षण के इस नए पैंतरे का मकसद  कहीं ना कहीं मुद्दों को जन्म देकर सियासत का चेहरा बदलने की कोशिश है जिसका नफा नुक्सान समय के साथ उठाया जायेगा और फिर राजनीति मुद्दांतरण के इस आगामी दौर से गुजरेगी !!

शिवानन्द द्विवेदी “सहर”


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