साइबर संसार के सामाजिक दुष्प्रभावों से निपटने की चुनौती
बदलते परिवेश में जब विकास के तमाम अत्यधुनिक तकनीक एवं उपकरण हमारे दैनिक जीवन का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं एवं मिनटों और सेकेंडो में सब कुछ पा लेने की महत्वाकांक्षा दिन-प्रतिदिन समाज में घर कर रही है,ऐसे में इस तथ्य का विश्लेषण अनिवार्य हो जाता है कि तकनीक के विकास ने हमारे पारंपरिक समाज को किस तरह से प्रभावित किया है या किस तरह से प्रभावित कर रही है ? आज जिस प्रकार से दुनिया के विशाल भूभाग के समानांतर साइबर दुनिया का निर्माण हुआ है ,को निश्चित तौर पर दुनिया के विशाल भूभाग को एक कंप्यूटर के छोटे से स्क्रीन पर समटने में काफी हद तक सफल कदम माना जा सकता है ! हमारे पारंपरिक समाज के समानांतर तेजी से विकसित हो रहे सोशल नेट्वर्किंग साइट्स ने एक साइबर अथवा अदृश्य समाज का निर्माण किया है और हमारा पारंपरिक समाज इस नवनिर्मित समाज के प्रति ख़ासा आकर्षित होता दिख रहा है ! आज फेसबुक और ट्विटर सहित तमाम ऐसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स आ चुकी हैं जिन पर एक साइबर समाज का निर्माण तेज़ी से हो रहा है ! इसी पारंपरिक समाज के बीच से पनपे इस साइबर समाज का दायरा तो बहुत बड़ा है मगर इस समाज में उत्पन्न होने वाली समस्यायों की भी कमी नही है ! हाल ही के दिनों में फेसबुक और ट्विटर जैसी साइट्स के माध्यम से हमारे पारंपरिक समाज में जिस तरह से उथल पुथल मचाने का प्रयास किया गया है , ने हमें यह सोचने पर विवश करता है कि तेज़ी से विकसित हो रहे इस साइबर समाज को नियंत्रित कैसे किया जाय ? बीते दिनों जिस तरह से फेसबुक ट्विटर आदि के माध्यम से अफवाहें फैला सामाजिक शान्ति और सौहार्द बिगाडने का जो प्रयास किया गया है वो निश्चित तौर पर वास्तविक एवं पारंपरिक समाज के लिए चिंतापूर्ण है एवं समाज के लिए एक नई चुनौती की तरह है ! अगर बंगलौर की घटना को उदाहरण के तौर पर लें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि साइबर समाज कितनी त्वरित गति से हमारे मूल समाज को प्रभावित करने लगा है ! आखिर संचार सम्प्रेषण का त्वरित सामाजिक प्रभाव ही तो है कि बंगलौर जैसे विकसित शहर में महज कुछ घंटो में पलायन का सिलसिला शुरू होने लगता है और पूर्वोत्तर भारत के लोग हज़ारो की संख्या में पलायन करने लगते हैं ! यहाँ एक तथ्य यह भी गौर करने वाला है कि हमरा मूल समाज किस हद तक साइबर संचार के प्रति विश्वस्त होने लगा है और किस हद तक मस्तिस्क शून्य होने लगा है कि उसे साइबर दुनिया में परोसी गयी हर सामग्री में सत्यता का बोध होने लगता है और उस सामग्री से वह तुरंत प्रभावित हो जाता है ! गलत संचार सम्प्रेषण के साथ-साथ कई अन्य दिशाओं में भी साइबर समाज के नकारात्मक पहलू को देखा जाने लगा है ! फेसबुक कम्युनिकेशन के माध्यम से बढ़ रहे नजदीकियों और दूरियों में तमाम सामाजिक विषन्गातियों का जन्म हो चुका है जिसके परिणामत: आत्महत्या आदि के कारणों में साइबर संचार की भूमिका भी सामने आने लगी है ! हाल ही में जालंधर की ऋचा शर्मा ने फेसबुक संचार में खुद को त्रस्त पाकर जिस तरह से ख़ुदकुशी को अंजाम दिया ,कहीं ना कहीं इस आधुनिक साइबर समाज को सवालों के घेरे में खड़ा करता है ! हालाकि ऐसा कतई नहीं है कि आत्महत्या अथवा अफवाह आदि के लिए सिर्फ यही एक कारण अथवा माध्यम है क्योंकि साइबर समाज के वजूद से पहले भी अन्य माध्यमो के द्वारा इन असामाजिक कृत्यों को अंजाम दिया जाता रहा है ! आज साइबर समाज पर सवाल उठाना इसलिए लाजिमी है क्योंकि यह अभी अपने शैशव काल से बाहर आया है और बहुत तेज़ी से विकसित हो रहा है अत: इससे पहले कि यह हमारे मूल समाज में पूरी तरह से घुसपैठ कर ले और हर सामाजिक मसले को अपने तौर तरीकों से समानांतर उलझाने या सुलझाने लगे ,हमें इसके प्रति गंभीर होने की जरूरत है !
अगर तुलनात्मक रूप से हम मूल समाज और मूल समाज के बीच से ही उपजे साइबर समाज का अध्यन करें तो तमाम ऐसे बिंदु उभर कर सामने आते हैं जिन पर हमें सजग होने की जरूरत है ! सबसे पहला तथ्य इस सन्दर्भ में यह है कि हमारे मूल समाज में व्यक्ति के विकसित होने की एक सामाजिक प्रक्रिया एवं चरण हैं जबकि साइबर समाज में व्यक्ति बिना किसी अध्यन के अथवा प्रशिक्षण के प्रवेश करता है एवं तेज़ी के साथ नक़ल की प्रक्रिया से विकसित होने का प्रयास करता है ! विकास के इस क्रम में ना तो वह किसी खास विचारधारा का निर्माण कर पाता है ना ही वह उस समाज के उद्देश्य को समझने में सफल हो पाता जिस पर वह खुद को अव्वल साबित करने की प्रतिस्पर्धा में दौड़ लगा रहा होता है ! बिना किसी खास उद्देश्य के इस माध्यम से जुडने के कारण उसे मूल समाज और साइबर समाज का फर्क नहीं महसूस हो पाता और व्यक्ति साइबर समाज को ही मूल समाज समझने की भूल कर बैठता है ! साइबर समाज एक पूर्णतया तकनीकी से विकसित समाज है यहाँ भावनाओ को लेकर कुछ ज्यादा उत्साहित होना खतरनाक हो सकता है ,इस साइबर संसार को तकनीकी के दृष्टिकोण से समझने की जरूरत है ना कि मूल सामाजिक भावनाओं के आधार पर ! आज हम साइबर स्पेस द्वारा उपलब्ध कराये जा तमाम आकर्षक सामग्रियों को तकनीक से ना जोड़कर व्यक्तिपरक भावनाओ से जोड़ कर देखने लगते है और फिर धीरे-धीरे इस साइबर सामग्री को मूल समाज में तलाशने का प्रयास करते हैं जहाँ हमें वह सामग्री या तो नहीं उपलब्ध हो पाती या किसी और प्रारूप में उपलब्ध होती है ,परिणामत: हमारे मन में कुंठा की स्थिति उत्पन्न होने का खतरा बना रहता है ! यही से साइबर समाज का मूल समाज में अनापेक्षित हस्तक्षेप की स्थिति उत्पन्न होने लगती है और व्यक्ति गलत निर्णय लेने लगता है !
आज तकनीक के माध्यम से समाज संरचना को एक बड़ी बहस के रूप में देखने कि की जरुरत है ! आज सरकार सहित तमाम गैर सरकारी संगठनो को इस दिशा में काम करने की जरुरत है कि आज के युवाओं को साइबर समाज और मूल समाज के फर्क को कैसे समझाया जाय ! आज जब साइबर संसार अपने नाकारात्मक कारणों के चलते चर्चा का विषय बन रहा है तो कई समुदायों और राजनीतिक दलों द्वारा इस आधुनिक माध्यम पर प्रतिबन्ध लगाने की बात भी की जा रही है जो की कहीं से भी इस समस्या के प्रति समाधान परक बात नही प्रतीत होती ! साइबर समाज में व्याप्त हो रही दुर्भावना पूर्ण हरकतों पर नियंत्रण की भी तकनीकी के माध्यम से ही उचित व्यवस्था करने की जरुरत है ना की इसको प्रतिबंधित करने की ! सोशल साइट्स को प्रतिबंधित करना अभ्व्यक्ति की स्वतंत्रत के हनन की तरह होगा,इसलिए बेहतर है की आधुनिक मंच के इस माध्यम को प्रतिबंधित ना करके इसके दायरे और नियंत्रण का तकनीकी समाधान निकालने का प्रयास करें और इसके महत्व और जरुरत को समझते हुए इसे ज्यादा स्वस्थ बनाने की दिशा में काम करें ! साथ ही साइबर समाज का निर्माण कर रहीं इन सोशल साइट्स को भी समय समय पर इसके प्रभावों एवं शिक्षाप्रद सूचनात्मक जानकारियों से अपने उपभोक्ता को अवगत कराने एवं उनके क्रियाकलापों पर नजर रखने की खास व्यवस्था करने की जरुरत है ! सरकार द्वारा भी इन सोशल साइट्स पर अपने एजेंसियों को सक्रिय कर अराजक तत्वों को खोजने एवं उनको दण्डित करने की खास व्यवस्था करने की प्रमुख जरुरत है ! इस दिशा में साइबर समाज को माध्यम बनाकर दुर्भावना फैलाने वालों के प्रति सरकार ,साइबर समाज एवं एवं स्वयं साइट्स को एकजुट होकर नियंत्रण की व्यवस्था करने की जरुरत है ! अगर समय रहते हम मूल समाज और साइबर समाज की बारीक होती खाई को नियंत्रित नहीं किये तो भविष्य में तमाम समस्याओं से दो चार होना पड़ेगा !
शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें