यू.पी.ए-२ का पूरा कार्यकाल भ्रष्टाचार और घोटालों की भेंट चढ़ा है, ऐसा कहना कहीं से भी गलत नहीं प्रतीत होता ! एक के बाद एक मामले आते गए और सरकार खुद को पाक साफ़ बताने की बयानबाजी करती गयी !अगर भ्रष्टाचार के किसी मामले में कोई बर्खास्तगी या इस्तीफा आदि हुआ भी तो वह सरकार की पहल से नहीं बल्कि समाज के लोगों के दबाव और न्यायपालिका के हस्तक्षेप के कारण हो पाया ! २-जी घोटाला,कामनवेल्थ घोटाला,कोयला घोटाला सहित तमाम छोटे बड़े घोटाले आते गए और सरकार उसे अपने बेबुनियादी बयानों से टालती गयी परिणामत: भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की नीयत जनता के सामने खुलकर आ चुकी है !हाल ही में सामाजिक कार्यकर्ता से राजनीति का दामन थामने वाले अन्ना के पूर्व सहयोगी अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम ने कुछ ऐसे खुलासे किये जो कि सीधे तौर पर देश के प्रथम परिवार कहे जाने वाले सोनिया गाँधी के दामाद रावर्ट वाड्रा को सवालों के घेरे में खड़ा करते हैं ! एक प्रेस कांफ्रेंस करके टीम केजरीवाल द्वारा साक्ष्यों के आधार पर वाडरा से जो सवाल उनकी सम्पति में बहुत कम समय में हुए गुणोत्तर इजाफे के बारे में पूछा गया या इनके खिलाफ जांच की मांग की गयी वो निश्चित तौर पर कांग्रेस के गले की हड्डी बना हुआ है ! यह प्रथम मामला है कि कोई भ्रष्टाचार का सीधा आरोप गांधी परिवार पर लगाया गया हो !यू.पी.ए आलाकमान के दामाद का मामला होने के कारण जिस तरह से कांग्रेस में आरोपों को खारिज करके अपनी वफादारी साबित करने होड़ देखी जा रही है उससे तो यही लगता है कि केजरीवाल द्वारा उठाये गए सवाल कहीं ना कहीं पुरे कांग्रेस की रातों की नींद उड़ा रखे हैं ! हालाकि जिस आनन् फानन में बड़े मंत्रियों से लेकर शीर्ष नेताओं द्वारा वाड्रा को बचाने की कवायदें और बयान बाजियां की गयी उससे सीधा फायदा केजरीवाल को ही मिलता दिख रहा है !बेशक आज केजरीवाल का कोई राजनीतिक वजूद नहीं दिख रहा लेकिन बयानों और पलटवारों के इस दौर में केजरीवाल की छवि जनता के बीच भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सरकार के मंत्रियों की अपेक्षा कहीं अधिक विश्वस्त है ! अपने प्रेस कांफ्रेंस में केजरीवाल ने जो सवाल रावर्ट वाड्रा पर उठाये हैं ऐसा कतई नहीं है कि वो सवाल पूरी तरह से तर्कहीन है या उनकी कोई प्रासंगिकता नहीं ? कांग्रेस के मंत्री बेशक इन सवालों को बेबुनियाद बता रहे हों लेकिन एक आम समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति को इतना समझने में कोई परेशानी नहीं कि अगर सब कुछ ठीक है फिर जांच से परहेज क्यों ? कांग्रेस के नेताओं द्वारा जिस तरह से इन आरोपों को खारिज किया गया और केजरीवाल के तरीके पर सवाल उठाये गए तो एक सवाल और उठता है कि रावर्ट वाड्रा अब तक केजरीवाल पर मानहानी का मुकदमा क्यों नहीं दायर करते ? जो सरकार वाड्रा का बचाने के लिए केजरीवाल को क़ानून पद्धति और कोर्ट का रास्ता दिखा रही है वो खुद उस रास्ते पर क्यों नहीं बढती और केजरीवाल पर मानहानि का दावा करती है ? सवाल बहुत सारे हैं जो सरकार को संदेह के घेरे खड़ा करते हैं जिसका जवाब वाड्रा, डी.एल.एफ और सरकार तीनो के देना पड़ सकता है ! यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर केजरीवाल ने ऐसा क्या गलत कह दिया या पूछ दिया कि पुरे केबिनेट को सामने आकर बचाव करना पड़ा ? एक तरफ तो सरकार के मंत्री इस मामले को वाड्रा और डी.एल.एफ के बीच की हुई निजी डील बता रहे वहीँ तरफ पूरा केबिनेट इस मामले के डैमेज कंट्रोल में पूरी तन्मयता से लगा हुआ है ! अगर वाकई यह पूरा वाकया एक बिजनेस मैन और एक निजी कंपनी के बीच का है तो फिर इसमे सरकार के मंत्रियों को इस तरह आकर बयानबाजी करने की कोई जरुरत नहीं है ! मंत्रियों की बयानबाजी इस बात की पुष्टि करती है कि यहाँ पूरा मामला एक बिजिनेस मैन का नहीं बल्कि गाँधी परिवार से जुड़ा हुआ है ! वरना एन.जी.ओ में फर्जी हस्ताक्षर मामले में आरोप झेल रही क़ानून मंत्री सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस खुर्शीद के बचाव में भला कोई नेता क्यों नहीं सामने नहीं आता है ? केजरीवाल के आरोपों के कुछ तकनीकी पहलुओं को मोटे तौर पर देखें तो पहला प्रश्न यही उठता है कि मंदी के दौर में एक कंपनी एक बिजिनेस मैन को किस आधार पर करोंडो का अन्सेक्योर्ड कर्ज देती है और फिर उसी कर्ज के पैसे से उसी बिजिनेस मैन को अपनी ही प्रोपर्टी औने पौने दामो पर बेचती देती है ? एक तथ्य और गौर करने वाला है कि रावर्ट वाड्रा की जिस कंपनी को डी.एल.एफ द्वारा यह अन्सेक्योर्ड कर्ज दिया गया उस कंपनी ने नातो बाजार में कोई स्थायित्व कायम किया था और ना ही इसका कोई और ही वजूद दिखा था ! जिस समय वाड्रा और डी.एल.एफ के बीच यह लेंन-देन चल रहा था उसी समय हरियाणा में डी.एल.एफ को तीन सौ एकड़ जमीन हरियाणा सरकार द्वारा दिया जाना,मामले को पेंचीदा बनाता है और इस संदेह को पुख्ता करता है कि वाड्रा और डी.एल.एफ के बीच के इस लेंन-देन का फायदा डी.एल.एफ को तो नहीं दिया गया? ऐसे में देश के सबसे रसूखदार परिवार के दामाद पर किसी कंपनी की इस कदर मेहरबानी पर सवाल ना उठाकर किस आधार पर उनकी पारदर्शिता को स्वीकार कर लिया जाय ? इन आरोपों के बाद कांग्रेसी नेताओं द्वारा आये अब तक के सभी प्रतिक्रियाओं में कहीं भी ना तो जांच का आश्वासन दिखता है और नाही कोई अध्यनपरक तर्क,सिवाय वाड्रा को हर कीमत पर पाक साफ़ बताने और केजरीवाल के आरोपों को सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का हथकंडा बताने के ! अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम चलाकर केजरीवाल को लोकप्रियता मिल रही तो इसमे गलत क्या है ? अगर भ्रष्टाचार गरीबी जैसे मसलों को उठाकर कोई अपनी राजनीति को पुख्ता कर रहा है तो भी इसमे गलत क्या है,यह काम तो राजनीति के चरित्र के अनुकूल है ! हाँ यहाँ पर कांग्रेस को केजरीवाल के राजनीतिक तौर तरीके से आपत्ति इस वजह से हो सकती है क्योंकि यहाँ सत्ता और विपक्ष के बीच मौके के अनुकूल सांठ-गाँठ बनाने की संभावना नहीं दिख रही ! राजनीतिक प्रचार पाने का यह आधुनिक फार्मूला बेशक कांग्रेस को नहीं भा रहा हो लेकिन जनता को शायद इससे कोई परहेज नहीं होगा ! अगर केजरीवाल के आरोपों पर एक बार भी सरकार या किसी नेता या खुद वाड्रा का बयान आता और खुद उनके द्वारा जांच की मांग की जाती तो शायद केजरीवाल को उतनी लोकप्रियता नहीं मिलती और सरकार के प्रति जनता में भी विश्वास बने रहने की संभावना बनी रहती ! लेकिन जिस तरह से केजरीवाल के आरोपों को सरकार द्वारा लागातार सिरे से खारिज किया जाता रहा है और तमाम मंत्रियों द्वारा वाड्रा का बचाव किया जाता रहा है यह बात गले नहीं उतरती की सब कुछ वैसा ही है जैसा हमारे नेता कह रहे हैं ! आम जनता के मन में इतनी बात तो जरुर होगी कि आखिर सरकार जांच कराने की बात तो दूर जांच के आश्वासन तक देने से क्यों कतरा रही है ?
राजनीति में प्रवेश कर चुके केजरीवाल अगर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर ही ये सवाल उठा रहे हैं तो इसमे गलत कुछ भी नहीं है क्योंकि प्रचार-प्रसार के लिए अकूत धन का इस्तेमाल ना होकर सशक्त मुद्दे उठाना अगर है तो यह भारतीय चुनाव प्रक्रिया के लिए अच्छे संकेत हैं! इस मामले में इसमे सरकार को चाहिए कि वो अरविन्द से दो कदम आगे चल कर खुद जांच के आदेश दे दे जिससे सारा प्रचार केजरीवाल का ही ना हो बल्कि सरकार के प्रति भी जनता में विश्वास की भावना आये !वरना सवालों और आरोपों के आधार पर अगर देखे तो केजरीवाल ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है जिससे जनता को आपत्ति हो !
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