डीज़ल एवं एल.पी.जी के दामो बढोत्तरी सहित एफ.डी.आई मामले में एक बड़ा फैसला लेकर ज्यादातर चुप रहने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब कहते हैं कि “जायेंगे तो लड़ते हुए”,तो इस बयान का कतई यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि सरकार को किसी खतरे का अंदेशा है ! एफ.डी.आई और महंगाई के मसले पर शुरुआत से कड़े तेवर दिखाते रहने वाली ममता बनर्जी के तेवर इस बार बेशक कुछ और सख्त हों लेकिन बावजूद इसके सरकार गिर जायेगी ऐसा मानना किसी मील के पत्थर से कम नही प्रतीत होता ! इसमें कोई दो राय नहीं कि यह बात मनमोहन सरकार को बखूबी पता होगी कि अरसे से लटके इन फैसलों को इन हालातों में लाना किसी टेड़ी खीर से कम नहीं है,बावजूद इन सबके सरकार द्वारा रातो-रात बिना किसी विशेष बात-चीत के इन मसलों को अमली जामा पहना देने को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए ! किसी भी दृष्टिकोण से यह बात गले नहीं उतरती कि ममता के विरोध से बखूबी वाकिफ यु.पी.ए आलाकमान ऐसे फैसले बिना बहुमत का गणित बिठाये कैसे ले सकता है ? निश्चित तौर पर इन कठिन फैसलों को लेने से पहले सरकार द्वारा हर परिस्थिति से निपटने और सरकार को बचाए रखने का अंदरूनी सियासी प्रबंधन कर लिया गया होगा तत्पश्चात ही ऐसे फैसलों को अमली जामा पहनाने का निर्णय मनमोहन सरकार द्वारा लिया गया होगा ! अगर इस पुरे मसले को समाजवादी पार्टी और डी.एम्.के के विरोध के मद्देनजर देख कर सरकार गिरने का अंदेशा लगाया जा रहा है तो यह महज हवा हवाई कल्पना से ज्यादा कुछ भी नहीं है ! अगर बयानों पर बारीकी से गौर करें तो अभी खुद ममता बनर्जी भी सरकार के लिए सारे रास्ते बंद करके नहीं चल रहीं है तो वहीँ समाजवादी पार्टी राष्ट्रपति चुनाव की तरह इस बार भी ममता का अंतिम रुख भांपने में लगी हुई है ! अगर आप थोड़ा पीछे की राजनीति देखें तो राष्ट्रपति चुनाव में ममता और मुलायम एकजुट होकर कांग्रेस के खिलाफ ताल ठोक रहे थे लेकिन जैसे ही ममता ने अपने तेवर सख्त किये मुलायम कांग्रेस के लिए मुलायम होते गए और प्रणब बाबु के समर्थन में खुल कर आ गए और पुरे यु.पी.ए कार्यकाल में पहली बार अलग-थलग दिखीं ममता बनर्जी को भी अंत में सरकार की शरण लेनी पडी जिससे मुलायम को तो ज्यादा फायदा हुआ मगर ममता की बड़ी किरकिरी भी हुई थी ! इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कुछ उसी तरह के घटना क्रम की ताक में इस बार भी समाजवादी पार्टी नजर गडाये बैठी है ! एक तरफ जहाँ दबाव की राजनीति में खास अनुभव रखने वाले मुलायम अपना कद और वजन भांपने में लगे हैं वही दूसरी तरफ ममता के लिए भी सरकार से अलग होकर रह पाना उनके राष्ट्रीय राजनीति के लिए बेहतर संकेत नहीं हैं ! अगर ममता सरकार से अलग होती हैं तो राष्ट्रीय राजनीति में उनके पास एन.डी.ए के अलावा कोई और चारा नहीं बचता है मगर एन.डी.ए में जाने से कहीं ना कहीं क्षेत्रीय राजनीति में तृणमूल के मुस्लिम वोटर्स के प्रभावित होने की चिंता ममता को जरुर होगी ! अगर थर्ड फ्रंट की बात की जाय तो मुलायम के यु.पी.ए में जाने से थर्ड फ्रंट की गुंजाइशें शेष नहीं बचती ! अत: यु.पी.ए से बाहर ममता बनर्जी को अपना राष्ट्रीय वजूद तलाशना राजनीतिक दृष्टिकोण से आसान नहीं प्रतीत होता !
अगर बात दुसरी तरफ मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी की राजनीतिक महत्वाकाक्षाओं की करें तो कहीं ना कहीं ज्यादा संभावना इस बात की है कि विषम परिस्थितियों में मुलायम सिंह यादव ममता के अंतिम निर्णय के बाद सरकार को गोद लेलें ! सरकार को बचाने के एवज में मुलायम को तमाम पॅकेज बेशक मिल जाय इसके अलावा सी.बी.आई फैक्टर में राहत भी किसी महत्वपूर्ण पैकेज से कम नहीं है ! हालांकि सी.बी,आई फैक्टर में सपा,बसपा और डी.एम्.के तीनो ही सरकार के सहयोगी बने रहना चाहेंगे जबकि ममता बनर्जी के मसले में सरकार का सी,बी.आई फैक्टर कारगर नहीं है ! बेशक आज समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सरकार के फैसलों का विरोध कर रहे हों लेकिन अभी भी समर्थन वापस लेने की बात ममता के अलावा किसी ने खुलकर नहीं किया और यु.पी की दोनों धुर विरोधी पार्टियों का समर्थन पत्र राष्ट्रपति के पास ही है ! गौर करने वाली बात यह भी है कि जैसे ही ममता बनर्जी ने अपना रुख स्पष्ट किया समाजवादी पार्टी के बयानों में सरकार के प्रति नरमी आ गयी और अब तक सरकार के विरोध में खड़ी सपा यह कहने लगी की हम आगे अपनी रणनीति तय करेंगे ! सपा नेता रामगोपाल यादव के इस बयान को अंतिम परिस्थिति के इंतजार तक जाने के तौर पर समझा जा सकता है ! वहीँ दूसरी तरफ मायावती आगामी पाँच साल तक यु.पी की सत्ता से बाहर होने के कारण केन्द्रीय राजनीति में सक्रिय रहना चाहती होंगी ! इस दृष्टिकोण से मायावती का समर्थन रहना ज्यादा आसान प्रतीत होता है ! हालाकि सरकार के अहम सहयोगी डी.एम्.के के तेवर बेशक सख्त हों लेकिन डी.एम्.के समर्थन लेगी ऐसा बिलकुल नहीं प्रतीत होता क्योंकि स्वयं डी.एम्.के प्रमुख की बेटी सहित तमाम नेताओ को सी.बी.आई संकट का खतरा है ऐसे में डी.एम्.के का विरोध छणिक उत्तेजना या दिखावा के सिवा कुछ नहीं है !
इस पुरे मसले में महंगाई और एफ.डी.आई जैसे मसले से विपक्ष को मुद्दा लाभ जरुर मिला है जिससे वो सदन की राजनीति को सड़क तक ले जाकर बंद,धरना आदि को हवा दे सके और सरकार को घेर सके ! भ्रष्टाचार के श्रृंखलाबद्ध मामलों में लागातार विपक्ष एवं आम जनता का विरोध झेल रही है सरकार, अब विरोधों को लेकर ज्यादा गंभीर ना होकर सरकार के पाँच साल पुरे करने के प्रबंधनन पर ज्यादा जोर देने में लगी है !सरकार का पूरा ध्यान इस समय संख्या बल के प्रबंधन पर है ना कि विरोधों पर क्योंकि सदन का सत्र खत्म हो चुका है और सड़क के विरोध की आदत सी हो चुकी है ! वर्तमान लोकतांत्रिक परिवेश में जनादेश की स्थिति गौण हो चुकी है और जन प्रबंधन की कवायदें तेज,जिसमे लोक अभिव्यक्ति से ज्यादा संख्याबल को बहुमत के आंकड़े तक पहुचाने की कवायदें अंदरूनी तौर पर चल रही हैं ! इन परिस्थितियों में ये मानना कि सरकार किसी खतरे में है या मध्यवधि चुनाव हो सकते हैं कहीं से भी एक पुष्ट परिकल्पना भी नहीं है क्योंकि जनादेश की सरकारें गिरनी आसान हैं जबकि जनप्रबंधन की सरकारे इतनी आसानी से नहीं गिरतीं !
शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

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