शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

हवाओं में घुलता जहर : दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख



प्राकृतिक संसाधनों के असंतुलित दोहन एवं भौतिक संसाधनों के प्रति मानव के अनावश्यक रूप से बढ़ रहे अत्यधिक आकर्षण ने लगभग पुरे विश्व को पर्यावरणीय संकट के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया है ! एक स्वस्थ समाज निर्माण में स्वास्थ्यपरक एवं शुद्ध वातावरण की अहम भूमिका होती है,लेकिन पिछले कुछ सालों में हमारा विश्व समाज विकसित हो रहे अत्याधुनिक संसाधनों को पा लेने की होड़ में पर्यावरण के महत्व एवं जीवन में इसकी अनिवार्यता को भूल सा गया है !इसमे कोई दो राय नही कि आज आधुनिकता के  अन्धुत्साह में सब कुछ पलक झपकते पा लेने की महत्वाकांक्षा ने हमारे  पर्यावरण के लिए संकट की स्थिति उत्पन्न कर दी है ! एक तरफ जहाँ जल-प्रदुषण से मरने वालों की संख्या में लागातार इजाफा होता जा रहा है तो वहीं वायु प्रदुषण की विशुद्धता में हो  रही कमी भी पर्यावरण के लिए किसी संकट से कम नही है ! आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ आगामी २०५० तक वायु प्रदुषण से मरने वालों की संख्या जल प्रदुषण से मरने वालों से ज्यादा हो जाएगी जो अभी कम है ! अनुमानित आंकड़े में इस बात का जिक्र किया गया है कि २०५० तक हमारे वातावरण की हवाओं में जहर इतना फ़ैल चुका होगा जिससे प्रत्येक साल ३६ लाख से ज्यादा लोग काल के  ग्रास में समाते जायेंगे ! इन आंकड़ो  में इस बात का भीजिक्र किया गया है कि वायु प्रदुषण का सबसे ज्यादा प्रभाव भारत एवं चीन  जैसे देशों में ही देखने को मिलेगा ! निश्चित रूप से स्वच्छ वायु मानव जीवन की सबसे बड़ी जरुरत  है  और इसके अभाव में जीवन का संकट उत्त्पन्न जाता है ! ऐसे में अगर हम पर्यावरण संरक्षण एवं वायु विशुद्धीकरण के प्रति समय रहते   सजग एवं सचेष्ट नही हुए तो आगामी वर्षों में हमारा जीवन संकट में होना तय है ! वैश्विक पर्यावरणीय परिदृश्य-२०५० नामक रिपोर्ट में जलवायु में अस्थिरिता एवं वायु प्रदुषण से मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों पर सर्वाधिक चिंता जताई गयी है ! आज तकनीक एवं संसाधनों के प्रति मानवीय महत्वाकांक्षाओं में हो रही गुणोत्तर वृद्धि ने उत्पादन की प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है ! मांग और आपूर्ति के इसी होड़ ने बड़ी कंपनियों से लेकर आम आदमी तक को पर्यावरण के प्रति लापरवाह एवं निष्फिक्र बना दिया है ! आज सब कुछ एक क्षण में पा लेने की होड़ और सब कुछ सबसे पहले उपलब्ध करा देने की जल्दीबाजी के बीच शायद किसी को इससे उत्पन्न  भावी संकट का आभास  तक नही हो पा रह ! बढ़ते कल-कारखानों एवं तमाम अन्य उद्दोगों में इस्तेमाल ऊर्जा संसाधनों से हमारे वातारवरण की हवाओं में ग्रीन हाउस गैस की मात्रा में तेज़ी से बढ़ोत्तरी होती जा रही है एवं आगामी वर्षों में इसमे और बढ़ोत्तरी की संभावना




जताई जा रही है जो कि पर्यावरणीय सुरक्षा के  दृष्टिकोण से चिंतापूर्ण विषय है ! हवाओं में फ़ैल रहे ग्रीन हाउस  गैस की मात्रा में वृद्धि का सीधा प्रभाव ओजोन परत पर पडता   है और ओजोन परतपतली   होती जा  रही है एवं इसके दिन-प्रतिदिन और पतले होने की संभावना बनती जा रही है ! ग्रीन हाउस नामक ज़हर की चपेट में आते जा रहे ओजोन लेयर के पतले होने के कारण सूरज से आने वाली पराबैगनी किरणे केंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण बनेगी और परिणामत: इससे मरने वालों की संख्या में इजाफा होता जायेगा ,जिसे रोकना शायद तब संभव न हो सके ! ग्रीन हॉउस गैस रूपी जहर का असर सिर्फ केंसर से मरने वालों तक सिमित न होकर अन्य तमाम समस्याओं को जन्म देने वाले कारक के रूप में भी देखा जा सकता है ! इस बात की पूरी संभावना है कि वायुप्रदूषण के कारण कई नयी तरह की बीमारियों का भी जन्म हो सकता है और समाज को चिकित्सा के दोहरे संकट का सामना करना पड़ सकता है जो कि अपने आप में बहुत विकत समस्या की तरह है ! इतना तो लगभग तय के बराबर है कि हमारे प्राकृतिक हवाओं में फ़ैल रहा यह ज़हर समाज के लिए किसी भावी आपदा से कम नही प्रतीत हो रहा है !अत: ग्रीन हाउस गैस रूपी ज़हर के हवाओं में घुलने एवं ओजोन के परत का स्तर बारीक होने के परिणाम समाज के लिए बहुत भयावह एवं समाज को संकट ग्रस्त करने वाले लगते हैं ! जैसा कि अनुमान जताया जा रहा है  कि २०५० तक दुनिया की ७०% आबादी शहरों में निवास कर रही होगी और तब केवल वायु प्रदुषण से मरने वालों का ग्राफ १० लाख से चार गुना ज्यादा बढ़कर चालीस लाख के आंकड़े को छू रहा होगा !संभावना इस बात की भी बलवती है कि अगर समय रहते इस समस्या पर नियंत्रण नहीं किया जा सका तो २०५० तक दुनिया के एक अरब चार करोड लोगों को स्वच्छ एवं स्वास्थ्यपरक आक्सीजन तक मयस्सर नही होगा !
                  आगामी तीन दशकों में पडने वाले प्रदूषित वायु के इन दुष्प्रभावों से बेखबर दिख रहे मानव समाज ना तो इसके नियंत्रण के प्रति सजग हो रहा और ना ही पर्यवारण एवं वायु शुद्धता के प्रति सचेष्ट दिख रहा है ! आधुनिकता के भागमभाग में आज का मानव अपने ही साँसों के साथ आँख मिचौनी का खेल खेलता नजर आ रहा है ! आम आदमी तो दूर की बात यहाँ तो हमारी सरकार सहित विश्व के तमाम सराकारों के माथे पर पर्यावरण के इस भावी खतरे को लेकर कोई सिकन तक नही दिखता !चुकी वायु प्रदुषण एवं ग्रीन हाउस गैस का सबसे ज्यादा प्रभाव भारत में पडने का खतरा जताया



जा रहा है अत: निश्चित रूप से भारत सरकार को इस समस्या को बढ़ने से रोकने एवं इस पर नियंत्रण करने के लिए गंभीर होना पड़ेगा एवं इसके निराकरण में  कुछ ठोस एवं दूरगामी उपायों को अमल में लाना पडेगा ! आगामी पर्यावरणीय संकट को सन्दर्भ में रखते हुए सरकार द्वारा पर्यावरन के अनुकूल ऊर्जा संसाधनों को वैकल्पिक रूप से लाने पर योजना बनाने एवं उसे लागू कराने पर बल देने की जरुरत है ! पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा स्रोतों का प्रयोग होने से काफी हद तक इस समस्या से निजात पाने में मदद मिलेगी !इस क्रम में सरकार द्वारा इस बात पर बल देने की जरुँरत है कि उन ऊर्जा स्रोतों जिनसे पर्यावरण को संकट है ,के ऊपर किसी तरह की टैक्स छूट आदि जैसी रियायत नही दी जाय एवं उनके उपभोग का दायरा भी तय किया जाय ! कल-कारखानों और आम आदमी के बीच मांग और आपूर्ति का दायरा भी सुनिश्चित किये जाने की जरुरत है ! सड़क पर पेट्रोल डीजल आदि की गाड़ियों पर सरकार द्वारा पर्यावरण के दृष्टिकोण से तमाम प्रयास भी किये जा रहे हैं ,ठीक उसी ताराह के के प्रयास अन्य दिशाओं में भी किया जाना चाहिए !
उपरोक्त उपायों पर सख्त निति  निर्माण किये बिना मानव के साँसों के संकट से जुडी इन समस्याओं से निजात पाना नामुमकिन है ! हमें हर संभव प्रयास कर हवाओं में तैर रहे इन जहारीले कणों का रास्ता रोकना ही होगा वरना आगामी सालों में समूची दुनिया जीवन के संकट से जूझ रही होगी और तब हमारे पास करने के लिये ना तो कोई उपाय होगा ना ही वक्त !!

शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें