जैसे-जैसे यूपी में सियासी पारा उठ रह है, वैसे-वैसे राजनीतिक दल अपने जनलुभावन हथियारों का बढ़ चढ़कर इस्तेमाल कर रहे हैं! 'वायदे क़ी राजनीति' भारतीय लोकतंत्र में परंपरागत रूप से चली आ रही है, वोटर्स को लुभाने एवं अपने जनाधार को मजबूत करने के लिए हमेशा से वायदे किये जाते रहे हैं! ऐसा बिलकुल नहीं है क़ी पं. जवाहर लाल नेहरू के समय वायदे का राजनीति से कोइ वास्ता नहीं होगा, राजनीति में वायदे तब भी सक्रिय थे और आज भी कायम हैं !तब और आज में फर्क बस इतना है कि तब वायदे और उनके क्रियान्वयन समानांतर थे और आज वायदा उसके क्रियान्वयन पर भारी पड़ रहा हैं !वर्तमान चुनावी हलचलों में कुछ वायदे तो ऐसे दिख रहे हैं जिनका कोई आर्थिक,व्यवहारिक एवं सामाजिकी सरोकार ही नज़र नही आता सिवाय वोट लुभावन राजनीति के !वायदों के सन्दर्भ में एक धारणा और है कि वायदे घोषणा पत्र के अध्यायों तक सिमित होकर रह जाते हैं ! खुद को सबसे बड़ा जन हितैषी साबित करने कि होड़ कुछ ऐसी है कि तमाम वायदे ऐसे भी किये जा रहे हैं जिनका पार्टी के घोषणा पत्र में भी कोई जिक्र नही है !एक बात तो स्पष्ट है कि ऐसे सारे वायदे सत्ता निहित हैं एवं सत्ता के उद्देश्य से अभिप्रेरित हैं !हालाकि इसमे सियासी तौर पर कुछ गलत भी नही है,ना ही सत्ता की सियासत और नाही वायदों की राजनीति ! सियासत में सता और वायदे एक दुसरे के समपूरक कहें जा सकते हैं ! वायदों के क्रियान्वयन के लिए सत्ता तक पहुचना एवं सत्ता तक पहुचने के लिए वायदे आवश्यक हैं ! बावजूद इन सबके वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में वायदे की राजनीति को लेकर कुछ ऐसे सवाल हैं जो कहीं ना कहीं वर्तमान राजनीति में चल रहे वायदे की प्रतिस्पर्धा को संदेह के घेरे में खडा करते हैं ! आखिर राजनीतिक दलों द्वारा किये जा रहे वायदे का व्यवहारिक आधार क्या है ? किन अध्यनो के बुनियाद पर इन वायदों का एवरेष्ट खडा किया जा रहा है ?इन वायदों को पूरा करने की पद्धति कैसी होगी चूँकि इनको पूरा करने कोई जादुई छडी तो नहीं आ रही ? कथित वायदों को निभाने में देश अथवा राज्य पर कैसा सामाजिकी एवं आर्थिक प्रभाव पडेगा ? इन चार सवालों को स्पष्ट किये बिना समस्त वायदे महज़ वायदे तक सिमित नज़र आते हैं इनका कोई व्यवहारिक आधार नज़र नही आता ! अगर वायदों के सन्दर्भ ने यु.पी चुनाव पर नज़र डाले तो प्रत्येक दल वायदों का खज़ाना लिए खडा नज़र आयेगा !किसी दौर में कंप्यूटर और अंग्रेजी का प्रखर विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी अब लेपटोप और टेबलेट की मुरीद हो चुकी है !वायदों कि इस प्रतिस्पर्धा में बिना किसी अध्यनपूर्ण भूमिका के आनन्-फानन में समाजवादी पार्टी द्वारा यह घोषणा करना कि,अगर हमें सत्ता का जनादेश मिला तो प्रत्येक बारहवी पास को एक लेपटोप एवं दसवी पास को एक टेबलेट मुफ्त दिया जाएगा ,बेबुनियाद प्रतीत होती है एवं इसे हास्यपद भी कहा जा सकता है !अगर नैतिक रूप से यह समाजवादी पार्टी कि विचारधार थी तो इस घोषणा से पहले एक सर्वे कराना चाहिए था कि यु.पी के सरकारी विद्द्यालयों में किंप्यूटर शिक्षा कि क्या स्थिति है ?ध्यान यह भी देना चाहिए था कि इस सत्र में कितने विद्द्यार्थियों ने कंप्यूटर विषय के साथ नामांकन लिया है और कितने विद्द्यालयों में कंप्यूटर कि शिक्षा व्यवहारिक रूप से उपलब्ध है ?अगर वाकई इन अद्ध्यनो के आधार पर समाजवादी पार्टी द्वारा घोषणा की जाती तो मुफ्त लेपटोप और टेबलेट की बजाय शायद कंप्यूटर शिक्षा उपलब्ध कराने एवं सभी विद्द्यालयों को कंप्यूटर अध्यापक देने को प्राथमिकता देने की बात की गयी होती !उत्तर प्रदेश के सरकारी विद्द्यालयों में कंप्यूटर शिक्षा कि क्या स्थिति है इसको जाने और समझे बगैर लेपटोप और टेबलेट बांटने के बाद कि स्थिति अंधे के हाथ बटेर लगने से ज्यादा कुछ भी नही है ! वायदों की हवा हवाई उड़ान भरने में सत्ताधारी ब.सा.पा भी कतार में किसी से पीछे खड़े होने को तैयार नही है !नैतिक मूल्यों के आधार पर तो ब.स.पा का जनता के प्रति यह दायित्व बनता है कि वह अपने नए घोषणा पत्र के साथ-साथ सन २००७ विधानसभा चुनाव में जारी किये गए घोषनापत्र को भी प्रस्तुत करे !अगर ब.स.पा अपने २००७ के घोषणा पत्र में कही गयी बातों को इन पांच साल के बहुमत वाली सता में निभा सकी है तो मुझे नही लगता उसे कि आगामी चुनाव के लिए घोषणा पत्र जारी करने की जरुरत है और अगर अपने पिछले वायदों को नही निभा पायी है उसे अब नए वायदों का घोषणा पोत्र जारी करने का कोई नैतिक हक़ है !क्योंकि यहाँ सवाल वायदों का नही वायदों के प्रति जनता के विश्वसनीयता का है ! यु.पी में अपने खोये जनाधार को वापस पाने में जी जान से जुटी कांग्रेस तो मानो वायदों कि अघोषित तिजोरी लेकर उतरी हो! मुस्लिम आरक्षण को लेकर जिस तरह से बडबोलापन चल रहा है ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे संघ सूची का मुस्लिम आरक्षण भी यु.पी विधानसभा से ही पास होना है !भट्टा परसौल के किसानो से लेकर बुनकरों तक अपनी राजनीतिक धरातल को पुख्ता करने में जुटी कांग्रेस के वायदे अधिक विश्वसनीय नही लगते क्योंकि केंद्र में उनके पिछले लोकसभा चुनाव में जारी घोषणा पत्र के सौ दिन के सुशासन कि कलई पहले ही खुल चुकी है ! ऐसे में कांग्रेस के वायदे भी बुनियादी तौर पर सिर्फ चुनावी पैतरें के रूप में ही देखे जा सकते हैं ! हालात भा.जा.पा के भी कुछ जुदा नही दिख रहे ! हालाकि भा.ज.पा खुद के किये वादों पर कम ध्यान देकर दूसरों के वादों की पोस्टमार्टम करने में ज्यादा सक्रिय दिख रही है ! सुशाशन का नाम लेकर भा.ज.पा द्वारा भी वादों का एक समुच्चय ही प्रस्तुत किया जा रहा है !
तमाम वायदों,घोषणा पत्रों को देखकर एक बात तो स्पष्ट ही होती है कि सियासत में वायदे कि राजनीतिक परम्परा चली तो आ रही है लेकिन अब वायदों के मायने बदल रहे हैं ! वर्तमान सियासी वायदे सियासत के दायरे तक सिमित होते जा रहे हैं !वायदों को लेकर एक प्रतिसप्र्धा जो चुनाव के समय ज्वलंत तौर पर देखी जाती है वही उसके क्रियान्वयन तक सुसुप्त सी हो जाती है !आज वायदों का ना तो कोई तार्किक आधार होता हैं,नाही कोई भविष्य निर्धारण की योजना और नाही कोई विचारधारा ! आज का हर सियासी वादा महज़ सियासत का एक पैंतरा मात्र है,एक जाल मात्र है जिसका उद्देश्य मतदाता को फ़साना है ! खैर अगर सियासत का यह भी एक रंग है तो इतना तो तय के बराबर है कि यु.पी विधानसभा में जनता को रिझाने वाले वायदे और भी देखे जायेंगे !लेकिन आज का मतदाता जो इन वायदों में अपने भविष्य कि परिकल्पना रखता है,को एक बार जरुर सोचना चाहिए कि इन वायदों का आधार क्या है ,इनके पीछे अध्यन क्या हैं ,इन वायदों का भविष्य के तमाम पहलुओं पर प्रभाव क्या पड़ता है और इनके पूरा होने की संभावना कितनी है ?
शिवानन्द द्विवेदी"सहर"
saharkavi1112gmail.com
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