शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

कराहते बेघरों का दर्द कौन सुनेगा : दैनिक जागरण एवं दैनिक जन दखल में प्रकाशित





रोटी कपड़ा और मकान,ये तीनो चीजें एक आम आदमी के जीवन की बुनियादी जरूरतों के रूप में हमेशा से शुमार होती  आ रही   है ! एक आम आदमी की प्राथमिक जरूरतों को इसी फलसफा से परिभाषित करने की प्राचीन परंपरा लगभग हर समाज और वर्ग में रही है ! आज आजादी के सात दशक और ग्यारह पंचवर्षीय योजनाओ के पड़ाव को पार करने के बावजूद यह यक्ष प्रश्न अनुत्तरित सा लगता है कि क्या वाकई हमारा तंत्र  आज हर भारतवासी की इन मूल जरूरतों को पूरा कर पाने में सक्षम हो पाया है ? सवालों की आवाज तब और बुलंद हो जाती है जब हमें  देश की राजधानी दिल्ली के सडकों के किनारे सिसकते फुटपाथों की आवाज सुनाई देती है ! आज इस सच को कतई नकारा नही जा सकता कि लाख सरकारी योजनाओ और दावों के बावजूद हम फुटपाथ पर जीवन बसर कर रहे लोगों को सर छुपाने भर का आशियाना दे पाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं ! जनगणना २००१ में आई रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में बेघरों की जनसँख्या 1.94 मिलियन बताई गयी जिसमे लागातार इजाफा होने का भी अंदेशा तत्कालीन दौर में ही जताया गया था ! कुल बेघरो में लगभग 1.16 मिलियन लोग ग्रामीण इलाको में जीवन बसर कर रहे थे जबकि लगभग .77 मिलियन लोग शहरी क्षेत्रो में बदहाल जीवन बसर करने को मजबूर थे ! हालाकि जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में बेघरो की संख्या में भी तबसे लेकर आज तक समानांतर वृद्धि को नकारा नहीं जा सकता ! ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्त्तमान में लगभग ३ मिलियन से ज्यादा लोग यत्र-तत्र बदहाली का जीवन जीने को मजबूर हो रहे हैं ! बेघरी का दंश झेल रहे बदहाल लोगो से तमाम तरह की सामाजिक असुरक्षा की संभावना एवं उनके कुपोषण आदि पर गौर करते हुए उनके सामाजिक आवासीय एवं सामाजिक जरूरतों के सन्दर्भ में दाखिल रिट याचिका पर चिंता व्यक्त करते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने तत्कालीन राज्य सरकारों को इस सन्दर्भ में कदम उठाने के तमाम निर्देश दिए ! सन २००२ में दाखिल याचिका पर निर्देश देते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने कहा कि बेघरी एक गंभीर समस्या है और इसके तमाम सामाजिक दुष्परिणाम है ! सर्वोच्च न्यायलय ने अपने निर्देश में कहा कि सभी राज्यों का यह दायित्व है कि वे बेघर और लाचार एवं बदहाली का जीवन जी रहे लोगों के रहने, खाने एवं शौचालय आदि की व्यवस्था स्थायी तौर पर करें ! हाल ही में अपने पुराने निर्देश को लगभग एक दशक बाद दोहराते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने पुन: 9 जनवरी 2012 को यह निर्देश दिया कि हर व्यक्ति को उचित जीवन जीने का अधिकार है एवं राज्य का दायित्व है कि वो हर व्यक्ति को अनुच्छेद 21 के तहत व्यवस्थित जीवन उपलब्ध कराये ! अपने निर्देशों की लंबी फेहरिश्त जारी करते हुए सर्वोच्च न्यायलय द्वारा बेघरी की समस्या से निजात दिलाने के लिए तमाम तथ्यों का उल्लेख किया गया,जो शायद आज भी कागजो और आंकड़ों के दायरे में सीमित होकर सरकारी फाईलों में दम तोड़ रहे हैं ! बुनियादी तौर पर इस बात का जिक्र सर्वोच्च न्यायलय द्वारा जारी उस निर्देश में किया गया है कि एक लाख तक की आबादी वाले इलाके में सौ लोगो को आश्रय देने योग्य एक और पचास लोगो को आश्रय देने योग्य दो सुविधा संपन्न आश्रय उपलब्ध करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है ! हालाकि बारहवी पंचवर्षीय योजना में इसमे तमाम अन्य सुधारों को जोडने की बात की गयी है ,जिनका दायरा अभी आंकड़ों से ज्यादा कुछ नही है ! बेघर लोगो की सामाजिक समानता की भावना को देखते हुए इस बात का भी जिक्र किया गया कि बेघरो को सरकार द्वारा तमाम आवासीय योजनाओ से लाभान्वित करने एवं उनके सामाजिक जरूरतों को एक सामान्य एवं व्यवस्थित नागरिक की तरह पूरा करने का प्रयास किया जाना चाहिए !
          सर्वोच्च न्यायलय के निर्देशों से अलग अगर सरकार द्वारा संचालित तमाम आवासीय योजनाओ की बात करें तो वर्त्तमान में इंदिरा आवास योजना,राजीव गांधी आवास योजना,सामाजिक आवास योजना सहित राज्य सरकारों की अपनी-अपनी आवासीय योजनाओ की कोई कमी नही है ! कागजो के ग्राफ में आवासीय योजनाओ का अम्बार आज इस बात को सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर आंकडो के ग्राफ में रोज नई नई उचाईयां छूती इन योजनाओ का बेघरो के गगनचुम्बी ग्राफ पर असर क्यों नही पड़ रहा ? आखिर वो कौन से कारण हैं कि तमाम योजनाओ और सर्वोच्च न्यायलय के निर्देशों के बावजूद हम बेघरी के इस समस्या को ध्वस्त कर पाने में पिछले सात दशकों से नाकाम साबित हो रहे है ?देश की राजधानी दिल्ली जहाँ से हर योजना को मूर्त रूप दिया जाता है,वही के फुटपाथ बेघरो की दुर्दशा का मातम मनाते क्यों नजर आते हैं ? आज सच्चाई यही है कि  दिल्ली सहित भारत के सभी महानगरों में बेघर लोगो कि बढती संख्या कहीं न कहीं देश की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है !
          बेलगाम हो रही बेघरो की जनसँख्या और लागातार नाकाम हो रही तंत्र की योजनाओ के बीच आज इस बात पर गंभीर होने कि जरुरत है कि आखिर वो चूक कहा हो रही है कि तमाम प्रयास और खर्चीली योजनाओ के बावजूद फुटपाथ पर कराह रहे बदहाल  जीवन को महफूज ठिकाना मयस्सर नही हो पा रहा ? निश्चित तौर पर अगर हम इस नाकामी के कारणों की तह को खंगालने का प्रयास करेंगे तो कहीं न कहीं हमें योजनाओ के क्रियानवयन नीतियों एवं हमारे कार्यपालको की लापरवाही देखने को मिलेगी ! इसमे कोई दो राय नहीं कि सर्वोच्च न्यायलय के निर्देशों को कागजी जामा पहने के अलावा सतही स्तर पर रहनुमाओं द्वारा कुछ विशेष नहीं किया गया और ना ही इसे एक गंभीर समस्या के रूप में देखा गया,जबकि बेघरी की समस्या को राष्ट्रीय समस्याओं की मुख्य धारा में शामिल कर इसके निदान  में कदम उठाने की जरुरत थी ! कागजी पुलिंदो और लालफीताशाही के मकडजाल में कराह रहे इन फुटपाथों के प्रति अभी भी ना तो कोई ठोस पहल किसी सरकार द्वारा दिख रही है और ना ही इसे समस्या के तौर पर देखा जा रहा है,जबकि बेघरी किसी भी राष्ट्र के प्रतिष्ठा से समबन्धित एक आम नागरिक की समस्या है ! आज जरुरत इस बात पर बल देने की है कि हम इस दिशा में गंभीर और ठोस कदम उठाए और उसे लागू करने की त्वरित नीतिया तैयार करें ! अगर समय रहते बेघरी की इस विकराल रूप धरती इस समस्या से निजात नही पाया गया तो इसके भावी परिणाम राष्ट्र के सामाजिक.आर्थिक एवं अन्तराष्ट्रीय किसी भी पर्प्रेक्ष्य में ठीक नहीं होंगे ! संवैधानिक दृष्टिकोण से भी यह नागरिक अधिकारों से जुडा  विषय है और संविधान की गरिमा को महत्त्व देते हुए आज इसके समाधान के प्रति सजग होना ही पडेगा ! हमें इस बात का ख्याल रखना ही होग कि फुटपाथ सिर्फ फुटपाथ बने रहे हैं न कि किसी बदकिस्मत का आशियाना बने !


           

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