प्रकाशित अमर उजाला
किसी भी राज्य अथवा देश के अनिवार्य तत्वों में जनसंख्या का महत्वपूर्ण योगदान होता है ! राष्ट्र के बौद्धिक एवं सुरक्षा स्तंभों की मजबूती में वहां की जनसंख्या की अहम् भूमिका होती है,मगर वही जनसंख्या अगर असंतुलित रूप से बढ़ने लगे तो राष्ट्र के लिए घातक साबित हो सकती हैं !राष्ट्र के भूभाग और जनसंख्या के बीच समानांतर संतुलन का होना बहुत जरुरी होता है ! आज अगर जनसंख्या के सापेक्ष भारत का विश्लेषण करें तो स्थिति बहुत भयावह नजर आती है ! क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से जिस राष्ट्र का दुनिया में सातवाँ स्थान है जनसंख्या कि दृष्टिकोण से उसी राष्ट्र का द्वितीय पायदान पर होना कहीं ना कहीं भूभाग और जनसँख्या के बीच के असंतुलन को ही दर्शाता है ! गौर करने वाली बात यह भी है कि आजतक हम परिवार नियोजन जैसी तमाम नीतियों के बावजूद बेलगाम होती इस जनसंख्या पर काबू नही पा रहे ! तमाम जनसमस्याओं जैसे कुपोषण,भुखमरी,गरीबी,बेरोजगारी,अशिक्षा,से जूझ रहे भारतीय समाज अगर इन बुनियादीसमास्याओं के कारणों की तह में जाए तो कहीं ना कहीं इस सभी के पीछे बढ़ रही बेतरतीब जनसँख्या एक प्रमुख कारण के रूप नजर आयेगी ! एक अनुमानित आंकड़े के अनुसार हमारी जनसंख्या एक अरब बाईस करोंड़ के पार पहुच चुकी है एवं इसमे सतत रूप से गुणोत्तर वृद्धि हो रही है ! १९९१-२००१ जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या एक अरब दो करोंड़ के आस-पास बतायी गयी थी ! जबकि आज ठीक दस साल बाद हमारी जनसंख्या का एक अरब बाईस करोंड़ के आंकड़ो को छूना कहीं ना कहीं जनसंख्या में असंतुलित बढोत्तरी को ही दर्शाता है !भूभाग के सापेक्ष जनसंख्या को अगर आनाक्दों के ग्राफ पर देखें तो दुनिया के २.४ % भूभाग पर बसे भारत पर दुनिया की १७.५% आबादी निवास करती है ! भूभाग और जनसंख्या के बीच का यह असंतुलन तमाम समस्याओं को जन्म दे रह है !
आजअसंतुलित रूपसे बढ़रही इसजनसंख्या काही परिणामहै किआम आदमीकि जरुरतसे जुड़ेतमाम संसाधनजनसंख्या कीअनुपात मेंउपलब्ध नहीहो पारहे हैं! शिक्षा केलिए विद्द्यार्थियोंकि अनुपातमें नातो विद्द्यालयउपलब्ध होपा रहेंहै नाही चिकित्साके क्षेत्रमें मरीजोंकी अनुपातमें अस्पताल!आज आपअगर बैंकजाते हैंतो लम्बीकतार मिलेगीतो बसोंमें भारीभींड, ट्रेनयात्रा केलिए टिकेटखिड़की सेलेकर ट्रेनयात्रा तकभारी भींडही देखनेको मिलातीहै ! सीटआरक्षित करनेके लिएभी वहीभींड मिलेगी!बेलगाम होतीइस इससमस्या केचलते जनसंख्याकी जरुँर्तोंके अनुपातमें हमसंसाधन नहीउपलब्ध करपा रहेऔर तमामयोजनाओं कानियोजन ठीकप्रकार सेनही होपा रहाहै !देशको अपनेआगोश मेंले रहेइस जनसंख्याके चलतेराष्ट्र मेंआतंरिक तौरपर विषमपरिस्थितियाँउत्पन्न होनेका खतराबना हुआहै !जनसंख्याके इसबढ़ते प्रकोपसे राष्ट्र आनात्रिकरूप सेएक भींडकि स्थितिउत्पन्न होनेलगी हैपरिणामत: भ्रष्टाचारऔर हिंसाआदि कोबढ़ावा मिलताजा रहाहै !
जनसंख्याऔर भूभागके बीचके इसअसंतुलन कोध्यान मेंरखते हुएदुनिया केकई देशोंने जनसंख्यानियंत्रण परगंभीरता सेविचार कियाएवं इसेरोकने कीत्वरित नीतियाँतैयार की! अगर जनसंख्याके दृष्टिकोणसे दुनियाके सर्वाधिकजनसंख्या वालेराष्ट्र चीनका जनसंख्यानियंत्रण परपिछला दृष्टिकोणदेखें तोस्पष्ट होताहै किचीन नेजनसंख्या नियंत्रणपर गंभीरकदम उठाएंहैं औरइसमे सफलताभी प्राप्तकर रहेहैं ! आंकड़ोंके अनुसारचीन नेअपने जनसंख्याबढ़ोत्तरी डरमें काफीहद तककमी कीहै जबकिभारत मेंजनसंख्या बढ़ोत्तरीका ग्राफलागातार अट्टालिकाएंखडा करतानज़र आरहा है! १९९१ तकभारत किजनसंख्या ८५करोंड़ बताईगयी थीजो २००१तक एकसौ दोकरोंड़ तकपहुच गयी! यानी १९९१से २००१तक इनदस सालोंमें जनसंख्यामें १७करोंड़ कीवृद्धि हुई! वहीँ अगर२०११ केआंकड़ो केअनुसार पिछलेदस सालोंमें जनसंख्यामें लगभग२१ करोंड़कि वृद्धिको देखाजा रहाहै ! येआनाकड़े इसबात कोप्रमाणित करतेहैं किजनगणना दरजनगणना हमजनसंख्या वृद्धिके दरमें लागातारबढ़ोत्तरी कररहें हैंजो चिंताजनक हैं! बढ़रही जनसंख्याके कारणोंमें जन्मदरएवं मृत्युदर मेंअसंतुलन कोएक कारणमाना जासकता हैलेकिन ऐसाकतई नहीकि यहीएक मात्रकारण है!
सहीमायने मेंअगर देखाजाय तोयह बातस्पष्ट तौरपर सामनेआती हैकि अभीतक जनसंख्या केबढ़ते प्रसारको राष्ट्रीयचिंता केरूप मेंना तोसमाज द्वाराऔर नाही हमारेसियासी रहनुमाओंद्वारा हीप्रस्तुत कियागया है!जनसँख्या की विभीषिका एवं इसके दुष्परिणामों से बेपरवाह हमारा राष्ट्र आज भी इस बुनियादी समस्या पर मौन व्रत धारण किये hue है !हालांकि नाम मात्र के लिए जनसंख्या नियंत्रण की बातें हमारे हमारे तंत्र द्वारा जरुर की जाती रहीं हैं और परिवार नियोजन जैसे अभियान भी चलाए जाते रहें हैं ,लेकिन बुनियादी सच तो आज भी यही है कि जनसँख्या के मसाले पर अभी तक हम कोई दूरगामी एवं सख्त निति तैयार करने में पुरी तरह से असफल रहे हैं !जनसँख्या की विभीषिका को देखते हुए इसे महज़ अभियान चलाकर दुरुस्त करने की सोच घातक हो सकती है ! शायद अब समय अपनी सीमा को पार कर रह है कि जनसंख्या को लेकर तंत्र द्वारा कुछ सख्त क़ानून बनाया जाय ! जरुरत इस बात पर बल देने की है कि परिवार नियोजन जैसे अभियाओं को महज़ अभियान तक सिमित ना रखकर इसके प्रति प्रत्येक व्यक्ति कि जवाबदेही भी तय की जाय !संसाधनों के वितरण आदि में परिवार के सदस्यों कि संख्या आदि के प्रावधान को वरीयता दी जाय एवं इसका गंभीरता से विश्लेषण किया जाय ! निश्चित तौर पर अगर समय रहते जनसँख्या के प्रति हमारा समाज और तंत्र जागरुक एवं सख्त नही हुआ तो बढ़ती जनसंख्या के भावी परिणाम सामाजिक रूप से और भयावह होंगे ! फिलहाल अभी तक तो हमारा देश जनसँख्या को लेकर लापरवाह एवं मौन ही नज़र आ रह है !
शिवानन्द द्विवेदी "सहर"

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