रविवार, 30 दिसंबर 2012

सेहत से खिलवाड़ :जनसत्ता में प्रकाशित लेख



(30 दिसंबर)
सुखी और समृद्ध जीवन यापन में स्वास्थ्य के महत्व को किसी भी प्रस्तावना या परिचय की दरकार नही होती ! स्वस्थ व्यक्तियों का समूह ही स्वस्थ समाज के निर्माण में प्रमुख कारक होता है और स्वस्थ समाज से ही समृद्ध राष्ट्र का निर्माण संभव है ! आज भारत में स्वास्थ्य एक ऐसा  विषय है जिस पर कहने और दिखाने को तो सरकारी आंकड़ों में बहुत कुछ मिल जायेगा लेकिन वास्तविकता के धरातल पर जाकर देखा जाय तो मामला ढाक के तीन पात से ज्यादा कहीं नहीं ठहरता ! जीवन का अधिकार बेशक हमारे मूल अधिकारों का सबसे मजबूत पहलू है लेकिन आज तक हम यह नहीं निर्धारित कर पाए कि इस अधिकार के तहत जीवन जीने वाले नागरिकों का जीवन हो तो कैसा हो ? बुनियादी सवाल ये है कि क्या राईट टू लाइफ के दायरे में उन बहुसंख्यक बीमार,अस्वस्थ जीवन जी रहे व्यक्तियों को भी रखा जा सकता है जो किसी ना किसी कारण से स्वस्थ जीवन जीने से महरूम है ? स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अगर किसी की मौत होती हो तो क्या इससे राईट टू लाइफ की प्रासंगिकता पर सवाल नहीं उठते ? सवाल ये भी है कि क्या किसी व्यक्ति का किसी भी हालात में  जिन्दा रहना मात्र ही उसे राईट टू लाइफ के दायरे में लाने के लिए पर्याप्त मानक है ; या जीवन के इस अधिकार के तहत जीने वाले समाज के व्यक्तियों के जीवन यापन के और भी मानक होने  चाहिए ? स्वास्थ्य को लेकर भारत में हालात विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा तुलनात्मक रूप से बेहतर नहीं रहे हैं ! गौर करना होगा कि स्वास्थ्य के प्रति संजीदा होने के मामले में हम अपने निकटतम पड़ोसी मुल्क चीन से काफी पीछे नजर आते हैं ! चीन में स्वास्थ्य पर उसके कुल सकल घरेलु उत्पाद का पाँच प्रतिशत खर्च किया जाता है जबकि भारत सरकार कुल जी डी पी का मात्र एक प्रतिशत ही स्वास्थ्य के नाम पर खर्च करती  है, जो कि भारत में  स्वास्थ्य की वर्तमान जरुरतों  के हिसाब से नाकाफी साबित हो रहा है ! अगर बीमारियों एवं बीमारों के नजरिये से भारत की तुलना अन्य देशों से करें तो भी हमारी स्थिति खस्ता हाल ही नजर आती है और हम सर्वाधिक बीमारों वाले देशों की फेहरिश्त में उपरी पायदान पर खड़े नजर आते हैं ! चाहे एनीमिया रोग से मरने वाली महिलाओं की संख्या को देखा जाय या निमोनिया और डायरिया से मरने वाले बच्चो की संख्या पर नजर डाली जाय ,हम पुरे विश्व को मात देते अग्रिम कतार में खड़े आसानी से दिख जाते हैं !यूनिसेफ द्वारा दिये एक आंकड़े के अनुसार दुनिया में निमोनिया एवं डायरिया से हुई एक साल में कुल २१ लाख बच्चों की मौतों में से सर्वाधिक ६ लाख बच्चों की मौतों के साथ भारत ७३ देशों की सूची में शीर्ष पर रहा !पिछले साल आये एक दूसरे सर्वे के मुताबिक़ भारत में खसरा से मरने वालों की संख्या पुरे विश्व में खसरा से हुई कुल मौतों की  ४७% है जो कि भारतीय स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अत्यंत ही चिंताजनक है ! स्वास्थ्य के मामले में हमारे देश की आंतरिक बदहाली की फेहरिश्त यहीं खतम नहीं होती बल्कि तमाम और भी आंकड़े हैं जो स्वास्थ्य के प्रति हमारे सरकार के बीमार रवैये को दिखाते हैं ! आज एक तरफ जहाँ  हम प्रति एक हजार की जनसँख्या पर एक चिकित्सक तक उपलब्ध करा पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं  तो वहीँ दूसरी तरफ  रोगियों की संख्या के अनुपात में चिकित्सकीय संसाधनो भारी का अभाव देखने को मिलता है ! औसत उम्र के मामले में  हमारी स्थिति बांग्लादेश से भी गयी गुज़री है !
स्वास्थ्य के क्षेत्र में बदहाली को दिखा रहे इन आंकडो के आधार पर अगर हम इनकी खामियों पर नजर डाले तो बुनियादी तौर पर कुछ ऐसे तथ्य सामने आते है जो भारत की स्वास्थ्य नीति को ही सवालों के घेरे में खड़ा करते हैं !स्वास्थ्य के परिप्रेक्ष्य में सबसे पहले इस तथ्य को देखना जरूरी है कि स्वास्थ्य को लेकर हमारे तंत्र का दृष्टिकोण किस तरह का है ? क्योंकि,पिछले कुछ सालों में बेशक हमारा तंत्र स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोई ठोस कामयाबी हासिल नहीं कर पाया हो सिवाय पोलियो ड्रॉप पिलाने के, लेकिन चिकित्सा का निजीकरण धड़ल्ले से हुआ है ! सरकारी अस्पतालों की तुलना में जिस तरह से आधुनिक चिकित्सकीय संसाधनों से संपन्न निजी अस्पतालों का विकास तेजी से हो रहा है इसे भारतीय स्वास्थ्य के नजरिये से विकास का मानक  समझना हमारी भूल के सिवा कुछ भी नही है ! शायद हमारा तंत्र इस बात को भुल रहा है कि स्वास्थ्य हमारे  मुख्यधारा के जीवन से जुड़े राईट टू लाइफ से सीधा सरोकार रखने वाला विषय है एवं इस देश के हर नागरिक के जीवन को स्वस्थ रखने का दायित्व हमारे सरकार के कन्धों पर है ! राईट टू लाइफ से सीधे तौर पर जुड़े स्वस्थ जीवन के मसले को चिकित्सा के क्षेत्र में खड़े हो रहे महंगे बाजारों के भरोसे छोड़ दिया जाना, कहीं ना कहीं जीवन जीने के मूल अधिकार पर सवालिया निशान खड़ा करता है ! आज चिकित्सा में बढते निजीकरण का ही प्रभाव है कि चिकित्सा जन सरोकारी विषय ना रह कर बाजार का विषय बनती जा रही है ! आज गिने-चुने सरकारी अस्पतालों के हालात इस बात की गवाही देते हैं कि निजी अस्पतालों के बढते बाजार ने व्यक्ति के मूल अधिकार से जुड़े इस विषय को हाशिए पर ला दिया है ! दवाइयों जैसी मूल जरुरत की चिकित्सकीय सामग्रियों पर मुनाफे का ऐसा बड़ा बाजार खड़ा किया गया है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को स्वस्थ रहने की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है ! आज मजह ७४ दवाओं के मूल्य निर्धारण पर सरकार का नियंत्रण है जबकि बाक़ी दवाओं पर कंपनियों द्वारा मनमानी तरीके से मूल्य थोपे जाते हैं और मरीजों को इन दवाओं के लिए भारी कीमत चुकानी पडती है ! दवाओं में मुनाफा कमाने का आलम यह है कि कंपनी से स्टाकिस्ट और रीटेलर तक जाते जाते दवाओं के दाम अपनी कंपनी कॉस्ट से बहुत ज्यादा हो जाते हैं ! सरकारी नियंत्रण से मुक्त एवं बेपरवाह ये दवा कम्पनियाँ अपनी मनमर्जी की कीमते रख कर भारी मुनाफा कमा रही हैं जबकि गरीब जनता स्वास्थ्य की बदहाली का जोहमत झेलने को मजबूर हो रही है ! हालाकि नई दवा नीति की मंजूरी के बाद कुल ३४८ दवाओं के कीमतों को सरकारी नियंत्रण में होने की बात की गयी है जिनका मूल्य निर्धारण सरकार कर सकेगी ! लेकिन यह फैसला इन बाजार के तानाशाहो के आगे कितना व्यवहारिक होगा ये तो वक्त ही बताएगा ! सरकारी अस्पताल, सरकारी मेडिकल कॉलेज ,सरकारी चिकित्सक का प्रबंध तो सरकार द्वारा किया जाता है लेकिन सरकारी मेडिकल स्टोर कहीं भी देखने नहीं मिल सकते जहाँ से आम मरीज सस्ते और सरकारी दरों पर दवाइयां खरीद सके !स्वास्थ्य के संकट से जूझ रहे इस गरीबों के देश में दवाओं के सरकारी स्टोर के ना होने और सरकार द्वारा निजी कंपनियों को दवाएं  बेचने की खुली छूट देने को अगर चिकित्सा का बाजारीकरण कहना कहीं से भी अप्रासंगिक नहीं प्रतीत होता ?
      स्वास्थ्य जैसी बुनियादी और व्यक्ति के जीवन से जुड़ी समस्या को लेकर अगर हमारी सरकार इस तरह से बेपरवाह काम कर रही है तो निश्चित तौर पर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब स्वास्थ्य को जीवन के अधिकार से जोड़कर देखने की बजाय इसे स्वतंत्र रूप से एक मूल अधिकार का स्वरूप दिये जाने की जरुरत है ? क्या स्वास्थ्य को हर नागरिक के अधिकार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए ? क्या ऐसा नहीं लगता कि जीवन जीने के अधिकार के साथ साथ हर व्यक्ति को स्वस्थ रहने का भी अधिकार है और सरकार का यह दायित्व है कि वह सीधे तौर पर अपने नागरिकों के स्वास्थ्य हितों पर काम करे बजाय कि निजी कंपनियों का सहारा लेकर ? आज जरुरत इस बात पर बल देने की है कि अन्य मूल अधिकारों की तरह जनता को स्वस्थ रहने का अधिकार भी संवैधानिक रूप से दिया जाना चाहिए  बेशक इसके लिए सरकार को चिकित्सा में सब्सिडी बढानी पड़े ! क्योंकि स्वस्थ समाज में ही विकास की संभावनाए पलती हैं जबकि बीमार समाज राष्ट्र को लाचार और कमजोर बनाता है !!

शिवानन्द द्विवेदी “सहर”


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