4 जनवरी 2013 को प्रकाशित
भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं पर रूढि़वादी होने का आरोप यों ही नहीं लगता रहा है। इसके पीछे तमाम वजहें भी हैं! दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म की शिकार हुई लड़की की मौत के बाद भी जनाक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा। दुष्कर्म के खिलाफ कड़े कानून की मांग को लेकर एक तरफ जहां आम जनता सड़कों पर है, वहीं कई महिला संगठन एवं राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से बयानबाजी करते नजर आ रहे हैं। केंद्र सरकार में राज्यमंत्री शशि थरूर ने दुष्कर्म के खिलाफ पीडि़ता के नाम पर कानून बनाने की हिमायत कर दी, जिससे इस मसले पर सियासत में नया मोड़ आ गया है। थरूर ने ट्विटर पर लिखा कि अगर पीडि़ता के परिवार को आपत्ति न हो तो पीडि़ता के वास्तविक नाम से ही दुष्कर्म के खिलाफ कानून बनाना ज्यादा प्रभावी होगा। साथ ही उन्होंने पीडि़ता के नाम को छुपाए जाने के औचित्य पर भी सवाल खड़ा किया। शशि थरूर के इस बयान के बाद सियासत के मैदान में बयानबाजियों का दौर शुरू हो गया। किसी ने इस बयान का समर्थन कर पीडि़ता के नाम से कानून बनाने की बात की तो कई ने परंपराओं एवं सामाजिक प्रतिष्ठा का हवाला देते हुए इसका विरोध किया। इस संदर्भ में गौर करना जरूरी है कि पीडि़ता के परिवार को नाम के खुलासे से कोई आपत्ति नहीं है और उसके परिवार ने साफ कर दिया है कि अगर सरकार उनकी बेटी के नाम से कानून लाती है तो यह उनके लिए सम्मान की बात होगी। इस पूरे मसले को महज एक नाम के खुलासे के रूप में देखना उचित नहीं लगता। इन बयानबाजियों और पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक एवं सामाजिक नजरिये से समझने की जरूरत है। पीडि़ता के नाम के खुलासे पर बिल्कुल राजनीति नहीं होगी, ऐसा कतई नहीं माना जा सकता। वह इसलिए कि जब भी कोई मसला संसद और सड़क से जुड़ता है तो सियासत होती ही है और स्वस्थ लोकतंत्र के नजरिये से होनी भी चाहिए। पीडि़ता के नाम के खुलासे को लेकर जो भी सियासी संभावनाए पैदा हो रही हैं और वाद-प्रतिवाद हो रहा है, वह इसके सामाजिक पहलुओं को लेकर ही है। इसलिए पीडि़ता के नाम के खुलासे का सामाजिक पक्ष समझना ज्यादा जरूरी है। भारतीय समाज की पृष्ठभूमि में जाकर अगर स्त्री के प्रति सामाजिक नजरिये को देखा जाए तो स्त्री को लेकर समाज का दोहरा चरित्र साफ नजर आता है। आज नाम के खुलासे को लेकर जो बहस हो रही है, वह इस बात को प्रमाणित करती है कि स्त्री के प्रति हम कितने रूढि़वादी हैं। इस पूरे बहस-मुबाहिसा के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर दुष्कर्म या छेड़छाड़ के किसी भी मामले में नाम छिपाकर रखने का औचित्य क्या है? नाम छुपा लेने मात्र से हासिल क्या होता है? पीडि़ता का नाम सार्वजनिक न करने का जो आडंबर पुरुषवादी समाज द्वारा आदिकाल से रचा जाता रहा है, उसने एक तरफ जहां स्ति्रयों के प्रतिवाद क्षमता को कम किया है, वहीं दूसरी तरफ अपराधियों के मनोबल को बढ़ाने का काम किया है। जब पीडि़त पक्ष पर नाम छिपाने का ही अतिरिक्त सामाजिक दबाव पहले से कायम है तो ऐसी स्थिति में हम उससे उसके ऊपर हुए अत्याचार या शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? दुष्कर्म जैसे अपराधों के प्रति अपराधियों का बढ़ता मनोबल इस बात का द्योतक है कि नाम और पहचान छुपाने के नाम पर हमारा समाज इन अपराधों को किस तरह से बढ़ावा देता रहा है। पीडि़ता पर हुए शोषण को किस नियम के तहत उसकी अस्मिता और इज्जत से जोड़कर उसे गुमनाम जीने पर मजबूर किया जाता रहा है, इसके पीछे की वजह भी आजतक साफ नहीं हो पाई है। पीडि़त महिला या लड़की का नाम और उसकी पहचान को छिपाना किसी भी दृष्टिकोण से ठीक नहीं प्रतीत होता। इस तरह की धारणा महज आडंबर और ढोंग के सिवाय कुछ भी नहीं है। स्थिति बड़ी ही हास्यपद हो जाती है कि जिस नाम और पहचान को हम सामाजिक प्रतिष्ठा और लाज के नाम पर छिपाते हैं, वह नाम और पहचान पीडि़ता के निकटस्थ समाज को तुरंत ही पता चल जाता है। दूर दराज के जिन लोगों से वह नाम और पहचान छिपा रह पाता है, उन लोगों का पीडि़ता की निजी जिंदगी से कोई सरोकार नहीं होता। नाम और पहचान छिपाने के नाम पर स्त्री प्रताड़ना का इतिहास पन्ना दर पन्ना लिखा जाता रहा है और जब भी इसका विरोध हुआ है, परंपराओं का हवाला देकर इसे दबाया जाता रहा है। इस औचित्यविहीन सामाजिक रूढि़वादिता से स्त्री समाज का भला होने की बजाय नुकसान ही होता रहा है। आज जब भारत 21वीं सदी में विकास की संभावनाएं तलाश रहा है और प्रगतिशीलता के पथ पर अग्रसर हो रहा है, ऐसे में तमाम सुधारों के साथ-साथ सामाजिक सुधारों पर भी कार्य करने की जरूरत है। नाम और पहचान को छिपाना अपराध और अपराधी को छिपाने जैसा है। नाम, पहचान आदि को लेकर जिस तरह की स्त्री विरोधी मान्यताएं समाज की मानसिकता में घर की हुई हैं, उन्हें तोड़ने की दरकार है। आधुनिक भारत में समाज के दोनों ध्रुवों को सामान नजरिये से देखे जाने के लिए सामाजिक सुधारों के प्रति सख्त होने के साथ-साथ जड़वत हो गई रूढि़यों को भी ध्वस्त करने की पहल की जानी चाहिए। आज अगर दामिनी के परिवार ने इस बात को स्वीकार किया है कि उनकी पीडि़ता बेटी के नाम से कानून बनाया जाना उनके लिए गौरव की बात है तो पीडि़ता के परिजनों के इस प्रगतिशील सोच के निहितार्थ को समझने की जरूरत है। आज सामाजिक सुधारों को इस कदर अंजाम तक पहंुचाने की जरूरत है कि दुष्कर्म, छेड़छाड़ की शिकार महिला या लड़की खुद जाकर थाने में इसकी रिपोर्ट दर्ज कराए और मीडिया के सामने आकर इसका खुलासा करे। बजाय इसके कि बेबुनियादी तौर पर इज्जत का भय खाकर अपराध और शोषण का घूंट पीकर रह जाए। हम जिस सोच को बदलने की बात आज कर रहे हैं, उसी बदलाव का यह भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अगर हर स्त्री, हर लड़की इस तरह से शोषण के खिलाफ सामाजिक रूढि़यों की जंग लगी जंजीरों को तोड़कर अपनी अस्मिता की लड़ाई अपने नाम पर लड़ने लगे तो दुष्कर्मियों के हौसले पस्त होंगे और सामाजिक बदलाव की नई सुबह नई इबारत लिखेगी। केंद्रीय मंत्री शशि थरूर द्वारा नाम और पहचान छिपाए जाने की प्रासंगिकता पर उठाए गए इन सवालों के निहितार्थ को समझने की जरूरत है। हमें इन सवालों को बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए समझना होगा कि नाम और पहचान छिपाने मात्र से सामाजिक सुधारों एवं स्त्री अधिकारों का क्या भला हो सकता है या आजतक हो भी सका है? उस परिवार की भावना को भी समझना होगा, जिसने अपनी बेटी का नाम सार्वजनिक करने एवं स्त्री विरोधी रूढि़यों को तोड़ने की शुरुआत की है। आज दुष्कर्म के खिलाफ खड़े इस जनाक्रोश में सियासत के रहनुमाओं की भी सबसे बड़ी भूमिका यह होनी चाहिए कि वह नाम और पहचान के खुलासे पर नाकारात्मक सियासत न करते हुए देश की सर्वोच्च अदालत से यह मांग करें कि दुष्कर्म के खिलाफ बनाया जाने वाला कानून उसी पीडि़ता के नाम पर हो, जिसने अपनी शहादत से हम सबको इस मसले पर जगाया है। याद रहे, अगर ऐसा हुआ तो यह एक संसदीय परंपरा का आगाज होगा, जिसमें घटनाक्रम के भुक्तभोगियों के नाम पर कानून बनता है। यह परंपरा भारत के लिए बेशक नई है, लेकिन दुनिया के कई देशों में ऐसे कानून बनते रहे हैं।
शिवानन्द द्विवेदी "सहर"

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