इन्डियन हेबिटेट सेंटर में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में आये गुलजार से हुई एक मुलाक़ात के बाद लिखा गया यह पोस्ट : मुलाक़ात के बाद
इन्डियन हेबिटेट सेंटर दिल्ली में विनोद खेतान की “पुस्तक उम्र से लंबी सडको पर गुलजार” का विमोचन करने आये गुलजार को सुनने एवं उनसे निजी तौर पर मिलने का अवसर मिला ! गुलजार से मिलना दूर से जितना दुष्कर लगता है पास से उतना ही सरल है , और गुलजार भी दूर से जितने खास दिखते हैं आम लोगों के बीच आकर उतने आम हो जाते हैं ! डा. विनोद खेतान की यह किताब गुलजार के चुनिन्दा नज्मो और गीतों के संकलन एवं समीक्षा पर आधारित है ! हालाकि इस किताब में समीक्षा या आलोचना से ज्यादा लेखक की व्यक्तिगत टिप्पणियाँ ज्यादा नजर आती हैं ! शाम साढे छ: बजे इन्डियन हेबिटेट सेंटर में आयोजित इस पुस्तक विमोचन समारोह में गुलजार के अलावा कई ख्यातिलब्ध हस्तियाँ मौजूद रही ! प्रमुख वक्ता के तौर पर प्रख्यात साहित्यकार केदारनाथ सिंह एवं जनसत्ता के प्रधान संपादक ओम थानवी सहित सुकृता पाल आदि मौजूद रहे ! पुस्तक विमोचन की पारम्परिक औपचारिकताओं के बाद वक्ताओं को सुनने का अवसर मिला ! पुस्तक एवं गुलजार पर प्रकाश डालते हुए ओम थानवी ने कई ऐसे सवाल उठाये जो वाकई फिल्म जगत में एक लेखक के लिए चुनौती के रूप में कायम हैं ! गुलजार के लेखन के तमाम नए पुराने उदाहरणों को याद करते हुए ओम थानवी ने उन गीतों का भी जिक्र किया जो गुलजार के व्यक्तित्व से ज्यादा सिनेमा के बाजार को सूट करने वाले हैं ! इसमे कोई दो राय नहीं कि सिनेमा बाजार की अपेक्षाओं से गुलजार भी अछूते नहीं रहे हैं और उनके द्वारा भी ऐसे तमाम गीत लिखे गए हैं जिनको लेकर गुलज़ार की जम कर आलोचना हो सकती है या होती भी रही है ! हालाकि गुलजार के तमाम अच्छे और दिल को छूने वाले नज्मो का जिक्र करना भी ओम थानवी नहीं भूले ! गुलज़ार के द्वारा लिखी गयी एक प्रार्थना “हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए” का जिक्र करते हुए प्रख्यात साहित्यकार केदार नाथ सिंह ने कहा कि यह प्रार्थना पूर्वांचल के हर विद्द्यालय में गाई जाती है लेकिन शायद ही किसी को पता हो कि इस प्रार्थना के रचयिता कौन है ! बकौल केदार नाथ सिंह “जब रचना इतनी मशहूर और जन-जन की कंठ पर बसने वाली हो जाय कि लोग लेखक का नाम भुल जाए तो समझिए कि यह उस लेखक द्वारा किया गया सर्वश्रेष्ठ सृजन है ! केदारनाथ सिंह के इस वाक्यांश को संदर्भ में रखकर अगर देखा जाय तो प्रतीत होता है कि सदी के महान गीतकार गुलजार की तमाम कृतियाँ गुलजार से भी बड़ी और गुलजार से भी महान हो चुकी हैं !
पुरे कार्यक्रम के अगर गुलज़ार को लेकर मै अपना नजरिया रखूं तो वाकई गुलजार महज एक गुलजार नहीं दिखते बल्कि उनके भीतर ना जाने कितने जाने-पहचाने या अनजाने गुलजार दिखते है जो आपको यत्र-तत्र कहीं भी दिख जायेंगे ! “दिल वालों के दिल का करार लूटने” वाले गुलजार अपने गीतों में सभी भाषाओं के शब्दों को डाल कर साहित्य और भाषा की विविधताओं का ऐसा घोल तैयार कर लेते हैं जो हर श्रोता के लिए मीठा एवं सुपाच्य बन जाता है ! चाहें आधुनिक वातावरण के अनुकूल गीत लिखना हो या पारम्परिक उर्दू का शायराना अंदाज हो ,गुलजार बस गुलज़ार करते नजर आते हैं ! हालाकि इस मसले पर बोलते हुए गुलजार खुद को अदना बताते हैं और बड़ी मासूमियत से कह जाते हैं कि शायरी का मिज़ाज तो मैंने शैलेन्द्र और डा.प्रदीप से सीखा है ! गुलजार को इस बात की कसक है कि डा. प्रदीप और शैलेन्द्र पर भी लेखन होना चाहिए ! कार्यक्रम के अंत में जब गुलजार थोड़े खाली नजर आये तो मै उनके पास गया और नमस्कार करते हुए सिर्फ यही कहा कि आपसे मिलकर अच्छा लगा ! जवाब में गुलज़ार ने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए और जवाब दिया “मुझे भी” ! इसमे कोई दो राय नहीं कि गुलज़ार साहब के रूप में साहित्य,सिनेमा और संगीत जगत को अनोखा उपहार मिला है जिसने अपने कलम से तमाम ऐसे आयाम गढे हैं जो कभी नहीं भुलाए जा सकेंगे ! इस पुरे कार्यक्रम में केदार सिंह को सुनना सबसे रुचिकर रहा तो वहीँ गुलजार द्वारा पेश की गयी दो नज्मो से पूरा आडिटोरियम गुलज़ार हो गया ! फिर चाय कि चुस्की के बाद मै और मेरे मित्र शुक्ला जी गुलजार को दिल में समेटे घर वापस आये !
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गुलज़ार साहब से मिलना हर किसी को अच्छा लगता है...वो सचमुच गुलज़ार हैं और सामने वाले को भी गुलज़ार कर देते हैं...
जवाब देंहटाएंजी...गुलजार तो गुलजार हैं ही..:)
जवाब देंहटाएंमैं भी पढ़ कर गुलजार हो गया....बढ़िया.
जवाब देंहटाएंहा हा हा हा ....अब क्या कहूँ ? बस कह ही दिया...
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