रविवार, 27 जनवरी 2013

सेहत के मोर्चे पर पिछड़ता देश : अमर उजाला में प्रकाशित


मानव जीवन के लिए स्वास्थ्य को निर्विवाद तौर पर स्वीकार किया जाता रहा है! स्वास्थ्य का सरोकार महज एक व्यक्ति से नहीं होता, बल्कि राष्ट्र व समाज पर भी उसका व्यापक प्रभाव पड़ता है! स्वस्थ व्यक्ति से ही स्वस्थ समाज का निर्माण होता है एवं स्वस्थ समाज में ही समृद्ध राष्ट्र की बुनियाद निहित होती है! लेकिन हमारी सरकारें स्वास्थ्य से जुड़ी मूलभूत जरूरतें पूरी करने में विफल रही हैं। चाहे स्वास्थ्य के नाम पर दिया जाने वाला हमारा सालाना बजट हो या प्रत्येक साल जानलेवा बनने वाली मौसमी बीमारियों पर नियंत्रण कर पाने में सफलता का आंकड़ा, हर मोर्चे पर हम अन्य देशों के मुकाबले पिछड़ते नजर आते हैं। आंकड़ों पर गौर करें, तो एनीमिया और डायरिया जैसी बीमारियों से मरने वालों की संख्या हमारे देश में सबसे ज्यादा है। बेशक पोलियो जैसी खतरनाक बीमारी पर नियंत्रण पाने में हम काफी हद तक सफल रहे हैं, लेकिन आज भी स्वास्थ्य से जुड़े तमाम ऐसे मसले हैं, जो हमें शर्मसार करते हैं।
बुनियादी तौर पर अगर स्वास्थ्य के प्रति संवेदनहीनता या व्यवस्थागत लापरवाही को खंगालें, तो हमारी स्वास्थ्य नीतियों में वे तमाम खामियां नजर आएंगी, जिन्हें बदहाली के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है। दुख की बात है कि स्वास्थ्य से जुड़े मामले को बाजार के हाथों सौंपा जा रहा है। स्वास्थ्य से जुड़ी मूलभूत जरूरतों में चिकित्सालय, चिकित्सक एवं दवाइयों को रखा जाता है! एक सर्वे के अनुसार, हमारे देश में मरीजों द्वारा स्वास्थ्य पर किए जाने वाले कुल व्यय का 70 प्रतिशत हिस्सा दवाइयों पर खर्च होता है, जबकि मात्र तीस प्रतिशत अन्य संसाधनों आदि पर! लेकिन दवाइयों को लेकर हमारी सरकार का रवैया बेहद आश्चर्यजनक एवं निराशापूर्ण है! अब तक लागू दवा नीति के अनुसार, मात्र चौहत्तर दवाओं के मूल्य निर्धारण का अधिकार सरकार के पास है, जबकि अन्य सभी जरूरी दवाओं का मूल्य निर्धारण दवा निर्माता कंपनियों द्वारा मनमाने ढंग से किया जाता रहा है! सरकार के नियंत्रण से मुक्त ये दवा निर्माता कंपनियां अपनी मर्जी से मूल्य निर्धारण कर मुनाफा कमा रही हैं, जबकि गरीब लोग महंगी दवाओं के चलते इलाज करा पाने अक्षम साबित हो रहे हैं। हालांकि नई दवा नीति, 2012 के तहत कुल 348 दवाओं के नए ढंग से मूल्य निर्धारण को मंजूरी दे दी गई है, जिस पर शीघ्र ही अधिसूचना जारी होगी, लेकिन सवाल उठता है कि आखिर दवा जैसी मूलभूत चिकित्सकीय सामग्री को लेकर सरकार इतनी संवेदनहीन और लाचार क्यों है। वह स्वयं लागत के आधार पर दवाओं का मूल्य निर्धारित क्यों नहीं करती! आज देश में दवाओं का कारोबार जहां हजारों करोड़ का है, वहीं सरकारी दवा कंपनियों का कुल सालाना कारोबार मात्र पांच सौ करोड़ का, यह आंकड़ा भी स्वास्थ्य के प्रति सरकारी तंत्र की संजीदगी पर सवाल खड़े करता है।
हर वर्ष देश के विभिन्न हिस्सों में मौसमी बुखारों से भारी संख्या में लोग मरते हैं! उत्तर प्रदेश के गोरखपुर मंडल में दिमागी बुखार या दिल्ली में डेंगू के प्रकोप के चलते हजारों लोग हर वर्ष मर जाते हैं। बावजूद इसके आज तक इनके नियंत्रण के उपायों पर कोई ठोस कार्य नहीं किया जा सका है। यह चिकित्सा बाजार द्वारा फैलाया भ्रम नहीं तो और क्या है कि जिन छोटी बीमारियों से लाखों लोग मरते हैं, उन्हें महामारी या आपदा घोषित कर उसका समाधान मुआवजे से किया जाता है, जबकि एड्स से कम लोगों के मरने के बावजूद उससे जुड़े अनुसंधानों पर कई गुना राशि खर्च की जाती है। सरकार द्वारा चिकित्सालय बनवाने की बातें तो अक्सर होती हैं, लेकिन सार्वजनिक जगहों पर सरकारी दवा दुकान उपलब्ध कराने की दिशा में खास कोशिश नहीं दिखती है। स्वास्थ्य सेवा आज निजी क्षेत्र के हवाले हो चुका है, जिस पर नियंत्रण की जरूरत है। सरकार को उचित दरों पर दवाइयों की दुकानें उपलब्ध करवाने पर गंभीरता से सोचना चाहिए, और प्रति हजार जनसंख्या पर एक डॉक्टर उपलब्ध कराना चाहिए, अन्यथा निजी क्षेत्र के व्यवसायी यों ही मरीजों को लूटते रहेंगे।
हर वर्ष देश के विभिन्न हिस्सों में मौसमी बुखार से हजारों लोग मरते हैं, पर उनकी रोकथाम के लिए ठोस कदम नहीं उठाया जाता। 
शिवानन्द  द्विवेदी सहर 


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