शनिवार, 5 जनवरी 2013

स्मृतियों में रूस : दैनिक जागरण में कुछ अंश प्रकाशित


  शिखा वार्ष्णेय जी  की संस्मरण पुस्तक स्मृतियों में रूस पर मेरे द्वारा लिखी गयी इस प्रतिक्रिया का कुछ अंश 6 जनवरी 2013 के दैनिक जागरण राष्ट्रीय के पेज 9 पर "हिन्दी का महत्व" शीर्षक से प्रकाशित है !


स्मृतियों में रूस हमेशा पाठक की स्मृतियों में उसी तरह बनी रहेगी जिस तरह मानो उसे भूलने की कला आती ही नहीं हो,या भूलने की कला का माहिर खिलाड़ी होते हुए भी हमेशा उसे ना भुल पाने की वजह ढूंढता फिरता हो ! पाठक मन यत्र-तत्र लिखता-पढ़ता हुआ, कुछ खोजता सा, कुछ गढता सा भटकता रह जाता है कि स्मृतियों में रूस में आखिर ऐसा क्या है कि पाठक की स्मृति में यह संस्मरण पुस्तक हमेशा बनी  रहती है !लन्दन में रह रहीं लेखिका शिखा वार्ष्णेय जी की संस्मरण पुस्तक “स्मृतियों में रूस” मुझे मेरे दफ्तर के पते पर पहुचने के दो दिन बाद मिली, क्योंकि मै अवकाश पर था ! पुस्तक मिलने के उपरान्त एक सरसरी निगाह डालना एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है बेशक पाठक द्वारा वो विस्तार से बाद में पढ़ी जाय ! मैंने भी दफ्तर में ही सरसरी निगाह से एकाध पन्ने पलटना शुरू किया, लेकिन एक एक पंक्तियाँ  एक के बाद एक कुछ यूँ कड़ियों में जुडती गयीं कि मेरा पाठक मन पंक्तियो,अवतरणों और अध्यायों के बनाये साहित्य जाल में पूरी तरह नतमस्तक हो चुका था ! पंक्ति दर पंक्ति आगे बढ़ने और  हर  पंक्ति को जल्दी पढ़ लेने की होड़ ने मेरे मन को बिना पूरा पढ़े रुक जाने  की इजाजत देने से इनकार कर दिया   ! साहित्य और शब्दों की क़ैद में कैदी बन जाने का अनुभव बहुत कम मिलता है, इसलिए मै उस अवसर को गंवाना नहीं चाहता था ! शब्द बांधे जा रहे थे और मेरा पाठक मन बंधा जा रहा था !  
              एक भारतीय परम्परा और आदर्श संस्कृति में पली बढ़ी लड़की का घर से पराये देश अध्यन करने हेतु जाते समय  उत्पन्न हुई पारिवारिक मनोदशा एवं परिजनों की चिंता का बड़ा ही व्यवहारिक पक्ष पुस्तक के प्रथम अध्याय “दोपहर और नई सुबह” में देखने को मिलता है ! माँ की स्वाभाविक चिंताएं और पिता का पुत्री के प्रति खुद को संतोष दिलाने वाला वो आत्मविश्वास एवं  आभासी परिणामों के प्रति परिजनों को होने वाली चिंताओं का सुंदर समन्वय भी इसी अंश में खुल कर मुखरित हुआ है ! इन्ही चिंताओं को शब्दों में उकेरते हुए लेखिका लिखती हैं “ अब जब अचानक मेरा चयन रूस जाने के लिए हो चुका था तो ये समझ नहीं पा रही थी कि खुश होऊं,डरूं या फिर...अजीब मनोदशा !” लेखिका के ये शब्द एक तरफ जहाँ प्रेम,विछोह और परिजनों की चिंता को बखूबी प्रस्तुत करते हैं तो वहीँ दूसरी तरफ इन्ही शब्दों में भारतीय परिवारों के रुढियों एवं रुढियों से लड़ने सहित तमाम मनोभावों के भी दर्शन होते  है ! लेखिका के इस डर में एक तरफ जहाँ भारतीय समाज की रूढियां उभर कर सामने आती हैं तो वहीँ रूस जाने के फैसले पर कायम रहना इन रुढियों को झुठलाने के साहस को दिखाता है !
पुस्तक के अगले अध्याय का सबेरा हमें रूस की चाय के साथ देखने को मिलता है जहाँ भौगोलिक विषमताओं में भाषाई समस्या का बड़ा ही पुष्ट उदाहरण लेखिका के संस्मरण का हिस्सा बन जाता है ! चाय को रूस में भी चाय ही बोलते हैं यह बात शायद बहुत कम लोगों को पता हो ! भाषाओं को लेकर हमारे मन में कोई पूर्वाग्रह का भाव होता है या भाषाई विषमता का असर कि लेखिका एवं उनके मित्रों द्वारा रूस में चाय को हर उस नाम से माँगा जाता है जिसे रूसी वेटर नहीं समझ पाती ! लेकिन जैसे ही लेखिका के मित्र द्वारा झुंझलाते हुए यह कहा जाता है कि “चाय दे दे मेरी माँ”......वेटर तुरंत समझ जाती है ! भाषा के दृष्टिकोण से मेरे मन में यहाँ एक अतिरिक्त सवाल यह उठता है कि चाय शब्द  भारत से रूस गया है या रूस से भारत आया ?  खैर, इसे तमाम विषमताओं के बीच की भाषाई समानता ही कह सकते हैं जो कि विश्व के दो अलग-अलग संस्कृतियों  को जोड़ने का काम चाय जैसे शब्द द्वारा संभव हो पाता है !
              संस्मरण की स्मृति यात्रा पर निकलीं लेखिका, रूस के एक शहर वोरोनिश को करीब से  टटोलते हुए उसमे अपने गृह नगर कानपुर को तलाश लेती हैं !व्यावहारिकता का एक सबसे बेहतर चरित्र यह है  कि  दूर दराज में जहाँ हमे हमारे अपने कम ही मिलते हैं तो हम तमाम विषमताओं को दरकिनार कर छोटी-छोटी समानताओं में अपनापन ढूढ लेते है !  इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रूस जैसे देश में भी लेखिका ने एक कानपुर ढूढ लिया ! प्राथमिक स्तर पर भाषाई विषमता की समस्या के चलते लेखिका को एक तरफ जहाँ  भाषा की  दिक्क्त का सामना करना पड़ रहा था तो वहीँ दुभाषिये की जरुरत कदम कदम पर पड़ रही थी ! शायद अंतर्राष्ट्रीय भाषा के नाम से जानी जाने वाली अंग्रेजी अभी वहाँ अपना वजूद नहीं बना पाई थी ! हालाकि लेखिका ने इस पुस्तक में इस बात का जिक्र किया है कि व्यक्ति के नामो का सरलीकरण भारत जैसे ही रूस में भी कर लिया जाता है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि  लेखिका के लिए यह शायद मुश्किल भरा किन्तु एतिहासिक दौर था क्योंकि वो नब्बे का शुरुआती दशक था जब वो जब रूस प्रवास पर थी और उसी दौरान रूस में आंतरिक हालात भी बहुत बिगडने लगे थे! आर्थिक हालात चरमरा गए थे ,अमेरिकी प्रभाव कायम होने लगा था और सोबियत टूट रहा था  ! तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर आज मै यही कह सकता हूँ कि उन विषम परिस्थितियों का गवाह बनना लेखिका के लिए एक साहसिक ही नहीं बल्कि  ऐतिहासिक स्मृति के रूप में भी उनके  जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा ! लेखिका द्वारा लिखे गए संस्मरण में तत्कालीन परिस्थितियों में  आर्थिक तंगी से जूझते रूस और बदहाल देश का चित्रण भी बखूबी देखने को मिलता है !रूस के उन तत्कालीन बदलावों को भी लेखिका की कलम ने बड़ी बारीकी से रेखांकित किया है और लेखिका के इसी रेखांकन ने  साहित्य के संस्मरण विधा की इस कृति को  अत्यधिक प्रभावशाली बनाता बनाने का काम किया है !   इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संस्कार और संस्कृति के साथ-साथ देशकाल और वातावरण तक को लेखिका द्वारा शब्दों में सहेजने का सफल प्रयास किया गया है और इस बात के प्रति खास ख्याल रखा गया है कि  संस्मरण के हर संभव दृश्य को कागजों पर बखूबी गढा जा सके !इस पुस्तक के माध्यम से रूस के कल पक्ष पर नजर डालने पर ऐसा प्रतीत होता है कि  फिल्मो के मामले में भारतीय कलाकारों की फिल्मे उस दौर में भी वहाँ खूब प्रचलित थी और देखी जाती थी ! रूस के नागरिक शायद हमारी अपेक्षा ज्यादा कलाप्रेमी हैं यही कारण है कि वहाँ हिन्दी फिल्मे भी प्रचलित रहीं हैं  ! पुरे संस्मरण में कई बार ऐसा भी समय आया जब लेखिका को अपने भारतीय संस्कृति के मूल्यों से समझौता करने की मजबूरियों का भी प्रस्ताव आया ! शायद इसी अनुभव को साझा करते हुए लेखिका ने जिक्र किया है कि वहाँ हर मर्ज के इलाज के रूप में वोदका का सुझाव आम था ! खाने पीने और नाचने में खुशी तलाशने का रुसी फार्मूला अब भारत में भी आम हो चुका है लेकिन रूस इसे किस नजरिये से समझता है ,यह कहना मुश्किल है ! जिस वोदका को ना लेने की मजबूरियां भारतीयों को आसानी से समझाई जा सकती थी उन्ही मजबूरियों और कारणों को रुसी मित्रों को समझाना उतना ही मुश्किल हो जाता था ! मांस वहाँ खूब प्रचलित था ! रूस में पढ़ाई के साथ-साथ स्वतंत्र लेखन में हाथ लगाने और अखबारों में प्रकाशित लेखों का जिक्र भी लेखिका के संस्मरण से अछूता नहीं रहा है ! रूस की राजधानी मास्को की सुंदरता और वहाँ के संसकृति ,संगीत ,संगीत प्रेमियों ,नृत्य कला आदि को भी लेखिका के कलम की बारीक निगाहों ने करीब से पढ़ा है जो इस पुस्तक को सीधे रूस से जोडने का काम करती है !लेखिका की कलम रूस के ऐतिहासिक तथ्यों को समझते और जिक्र करते हुए टालस्टाय और चेखव की कहानियों में भारत दर्शन को भी तलाशती हैं ,जहाँ उन्हें गाँधी और अहिंसा के प्रभाव् का दर्शन होता है !
 अपने हर घड़ी  और हर पल में रूस को समझने की कोशिश करती यह  भारतीय लेखिका अपने अनुभव को जहाँ विराम देती है वहीँ से पाठक का मन रूस को निहारने पर विवश होता है ! लेखिका ना तो वहाँ की बबुश्का को भूली हैं, ना ही वहाँ की चाय को और ना ही उन दोस्तों सहेलियों को जो शौक से भारतीय साडियां पहन लेती थीं ! इस संस्मरण पुस्तक में अनुभवों,तथ्यों और चित्रों का शानदार समन्वय जिस तरह से लेखिका द्वारा प्रस्तुत किया गया है ,पाठक हमेशा शिकायत करेगा लेखिका से कि थोड़ा और होता तो कितना अच्छा होता ! बेस्वाद पड़े सफ़ेद पन्नों पर रूस का स्वाद लेखिका ने अपनी कलम से कुछ यूँ विखेरा है कागज के बने मुर्दा पन्ने हर बार जी उठते हैं और पाठक के मन एक रूस बनकर घुस जाते हैं ! हर वो व्यक्ति जो शायद रूस ना जा पाए एक बार इन पन्नों को निहार ले शायद एक रूस उस तक चलकर खुद आ जाए ! अंत में मै एक पाठक की प्रतिक्रिया के तौर पर यही कहूँगा कि इस दुनिया में दो रूस बसते हैं एक ,जो एशिया और यूरोप के भूभाग पर तो दूसरा “स्मृतियों में रूस के इन पचहत्तर पन्नों में”....! धन्यवाद

शिवानन्द द्विवेदी “सहर”


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