| होते रहें ऐसे आयोजन |
| पांच जनवरी से 20 जनवरी तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तत्वाधान में चलने वाले भारतीय रंग महोत्सव ने दिल्ली के कल्चरल स्पॉट वाले मंडी हाउस इलाके को अपने रंग में रंग लिया था। कला और संस्कृति के नजरिये से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित इस महोत्सव को कला व संस्कृति प्रेमियों का त्योहार कहना अतिशयोक्ति न होगी। यह महोत्सव अपनी सांस्कृतिक एवं कला पक्ष की विविधताओं को लेकर खासा चर्चित रहा है ! इस बार देश-विदेश के तमाम थियेटर कलाकारों के समूहों द्वारा नाटकों के साथ-साथ नृत्य प्रस्तुति के बेजोड़ रंग ने एक तरफ जहां महोत्सव के कला पक्ष को पुष्ट किया वहीं दूसरी तरफ विद्यालय प्रांगण में सजाये गए मनमोहक टेंट ने भी दशर्कों व सैलानियों का मन मोहा। विविधताओं के रंग में रंगे एनएस डी प्रांगण का अनोखा टेंट पूरे महोत्सव के दौरान अपनी साज-सज्जा को लेकर खास आकर्षण का केन्द्र बना रहा! आंतरिक साज- सज्जा के नजरिये से अगर उस वातावरण का अनुभव किया जाए तो बांस की बल्लियों पर टिके टेंट के अंदर उठने-बैठने व खाने पीने के पारंपरिक इंतजाम थे। पूरे रंग महोत्सव में आकर्षण का केन्द्र बना रहा यह टेंट एक तरह का रंगमंच ही नजर आ रहा था। छोटे से क्षेत्रफल में फैले इस तम्बू को आपवाद मान लिया जाए तो शहरी चकाचौंध में जगमगाती दिल्ली में शायद ही कोई ऐसी जगह हो, जहां बांस के मचान और बांस की सीढ़ियों पर बैठ कर चाय की चुस्की का आनंद लिया जाना संभव हो। दिल्ली की कड़कडाती ठंड में देसी खाट पर बैठे लोगों को कोयले की अंगीठी पर हाथ सेंकते यहां के अलावा इस मेट्रो सिटी में भला और कहां देखा जा सकता था? शहर और गांव की संस्कृतियों का संतुलित और भव्य समन्वय प्रस्तुत करता यह टेंट प्रांगण में मधुर ध्वनि में बज रहे संगीत के बीच दशर्कों के लिए किसी रंगमंच से कम प्रतीत नहीं हो रहा था। प्रांगण की सुंदरता के अलावा रंग महोत्सव के कला पक्ष पर नजर डालें तो कला की विविधताओं की अद्भुत मिसाल देखने को मिली है। देश-विदेश की अलग-अलग भाषाओं में कुल सत्तासी नाटकों का मंचन नामचीन थियेटर समूहों द्वारा किया गया। महोत्सव में जिन नाटकों का मंचन तय था, कुछेक अपवादों को छोड़कर लगभग सभी का सफलता पूर्वक मंचन किया गया। जिनका मंचन तय किये जाने के बाद रद्द किया गया उनमें पाकिस्तान के ओजोक थियेटर का नाटक ‘कौन है ये गुस्ताख’ खासा र्चचा में रहा! ओजोक थियेटर की निर्देशक मदीहा गौहर ने बताया कि भारत-पाक सीमा पर हुए तनाव का खमियाजा उनके नाट्य समूह को भुगतना पड़ा जबकि उनका थियेटर समूह पाकिस्तानी चरमपंथियों के विरोध को खारिज करते हुए महोत्सव में हिस्सा लेने हिन्दुस्तान आया था। हालांकि कला और रंगमंच के इस महोत्सव में कलाप्रेमियों का वह जुनून भी देखने को मिला जिसने साबित कर दिखाया कि कला को भूगोल के दायरे में नहीं बांधा जा सकता है। वह उन्मुक्त हवा की तरह बहने वाली संस्कृति है। जब देश के राजनीतिक हालात एनएसडी की ओर से उक्त नाटक को प्रदर्शित होने की इजाजत नहीं दे रहे थे, ठीक उसी समय कला प्रेमियों के एक समूह ने निजी खर्चे पर ओजोक थियेटर को मंच दिलाकर “कौन है यह गुस्ताख” का मंचन संभव कराया! नाटक के मंचन के बाद मदीहा गौहर मंच पर यह कहते हुए रो पड़ीं कि इतना प्यार सिर्फ हिन्दुस्तान में ही मिल सकता है। अपनी ऑनलाइन टिकट बुकिंग पण्राली के कारण समारोह काफी हाईटेक भी रहा।पूरे आयोजन को कला व संस्कृति का सामाजिक संगम कहा जाना उचित प्रतीत होता है! ऐसे आयोजनों के माध्यम से न सिर्फ इस कला की संस्कृति को जीवित रखा जा रहा है बल्कि जड़वत पड़े सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी एक रफ्तार मिल रही है। दिल्ली व जयपुर जैसे शहरों की तर्ज पर अन्य छोटे बड़े शहरों में भी ऐसे आयोजन किये जाने चाहिए! जैसे-जैसे हम इस संस्कृति को आगे बढ़ाते जाएंगे, कला के प्रति हमारी समझ बढ़ती जाएगी। आज सिनेमा के बिगड़ते स्वरूप की वजह भी शायद यही है कि हमारा सिनेमा रंगमंच की नहीं, बल्कि व्यापार की बुनियाद पर खड़ा है। हमें याद रखना होगा कि रंगमंच ने शुरु आती दिनों में सिनेमा को बहुत कुछ दिया है। अत: सिनेमा की गुणवत्ता बचाने के लिए भी रंगमंच का ही रास्ता अख्तियार करना होगा। यानी इस तरह के रंग महोत्सवों का आयोजन होते रहने चाहिए। शिवानन्द द्विवेदी सहर |
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रविवार, 27 जनवरी 2013
होते रहें ऐसे आयोजन : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख
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