दैनिक जागरण नेशनल में 18 जनवरी को प्रकाशित.
व्यक्ति और समाज के सार्वभौमिक विकास में प्राथमिक शिक्षा के महत्व को निर्विवाद तौर पर स्वीकार किया जाता रहा है। रोटी, कपड़ा और मकान जैसे मूलभूत जरूरतों के बाद समाज में प्राथमिक शिक्षा की अनिवार्यता को ही सबसे अधिक महत्व प्राप्त है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षा की अनिवार्यता को समझते हुए भारत सरकार द्वारा कानूनी रूप से प्राथमिक शिक्षा को हर बच्चे के अधिकार के तौर पर परिभाषित किया जा चुका है। इसी शिक्षा के अधिकार कानून के तहत छह साल से 14 साल तक के हर बच्चे को मुफ्त शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार कानून द्वारा दिया गया है। सैद्धांतिक तौर पर बेशक हम शिक्षा के नाम पर इतना ठोस और कानूनी कदम उठा चुके हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर अब भी प्राथमिक शिक्षा को सहज, सुलभ एवं सुनिश्चित कर पाने में नाकामयाब ही साबित हो रहे हैं। दुर्व्यवस्था के शिकार सरकारी प्राथमिक शिक्षण संस्थानों से तो अभिभावकों का मोह भंग बहुत पहले ही हो चुका है और अधिकांश मध्यमवर्गीय अभिभावक निजी शिक्षण संस्थानों की ओर रुख कर रहे हैं। ऐसे हालात में जब निजी शिक्षण संस्थानों में बच्चों का दाखिला कराने के सिवा अभिभावकों के पास कोई और चारा नहीं दिख रहा है तो शिक्षण संस्थान भी दाखिले से लेकर पढ़ाई तक में मनमाना रुख अख्तियार करते नजर आ रहे हैं। निजी संस्थानों की मनमानी का आलम यह है कि अभिभावकों के लिए नर्सरी क्लास में भी अपने बच्चों का दाखिला करा पाना मील का पत्थर साबित हो रहा है। नर्सरी क्लास में दाखिले को लेकर वर्ष 1999 में शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी किए गए सर्कुलर को ताक पर रखकर निजी संस्थानों द्वारा जिस तरह से मनमाने नियमों के तहत दाखिला दिया जा रहा है, वह बच्चों के साथ-साथ उनके अभिभावकों के लिए भी परेशानी का सबब बना हुआ है। प्रास्पेक्टस शुल्क, अधिकतम आयु सीमा, अभिभावक की आय, विद्यालय से बच्चे के आवास की दूरी जैसे बिंदुओं पर शिक्षा निदेशालय द्वारा तय किए गए मानकों एवं निर्देशों को निजी संस्थान दशकों से धता बताकर अपने मुनाफे के हिसाब से नियम बनाते आ रहे हैं। मासूमों के भविष्य और अभिभावकों की दिक्कतों से बेपरवाह ये संस्थानों शिक्षा का जिस तरह से धड़ल्ले से बाजारीकरण कर रहे हैं, वह भारतीय शिक्षा के भविष्य के लिए बेहद घातक परिणाम ला सकता है। नर्सरी क्लास में बच्चों के दाखिले को लेकर प्वाइंट सिस्टम में अलग-अलग विद्यालय अलग-अलग मानकों के आधार पर भेदभावपूर्ण रवैया अपना रहे हैं। यह भी शिक्षा प्रणाली के लिए चिंताजनक है। प्वाइंट सिस्टम को अभिभावक के पद, आय आदि के अनुमानित आकलन के आधार पर आवंटित करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित और न्यायसंगत नहीं है। हालांकि शिक्षा निदेशालय द्वारा हर विद्यालय को अपना दाखिला मानक बनाने की छूट जरूर दी गई है, लेकिन इस छूट का कतई यह मतलब नहीं होना चाहिए कि प्वाइंट सिस्टम में ही पद, आय आदि के आधार पर बच्चों के साथ भेदभाव किया जाए। इस संदर्भ में शिक्षा निदेशालय को चाहिए कि वह निजी संस्थानों को दी गई इस छूट में थोड़ी सख्ती लाकर इसके दायरों को और स्पष्ट करे, जिससे निजी संस्थान दाखिले की मूल प्रक्रिया में ज्यादा मनमानी कर पाने को स्वतंत्र न हो सकें। इस संदर्भ में हमें इस बात को समझना होगा कि शिक्षा हमारे समाज की जरूरत है। इसे महज एक बच्चे की निजी जरूरत समझना हमारे वर्तमान समाज एवं व्यवस्था की सबसे बड़ी भूल साबित होगी। लिहाजा, प्रत्येक बच्चे को प्राथमिक स्तर पर शिक्षित बनाने का दायित्व भी इन संस्थानों का है। दाखिले की इस प्रक्रिया में अभिभावकों की शैक्षिक योग्यता को आधारभूत मानक बनाना भी किसी नजरिये से शिक्षा के मूल सिद्धांतों के अनुकूल नहीं प्रतीत होता है। किसी भी मासूम को शिक्षित बनाने में उसके शिक्षक एवं विद्यालय के शैक्षिक माहौल का बड़ा योगदान होता है, जबकि अभिभावकों की भूमिका अपने बच्चे को आचरण एवं सामाजिक मूल्यों का पाठ पढ़ाने की होती है। यह कुतर्क किसी भी नजरिये से स्वीकार नहीं किया जा सकता कि बेहतर शिक्षा पर उसी बच्चे का अधिकार है, जिसके अभिभावक पूर्णतया शिक्षित एवं संपन्न हों। शिक्षा के अधिकार के तहत शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार हर बच्चे का है और यह अधिकार उसे बिना किसी शर्त के मिलना चाहिए। प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से बढ़ती निजी संस्थानों की दखलअंदाजी एवं दाखिले आदि की प्रक्रिया में उनकी मनमानी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। यह देश एवं समाज से जुड़ी प्राथमिक स्तर की शिक्षा का मसला है। इस पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है। निजी संस्थानों का शिक्षा के प्रति रवैया बेहद अतार्किक एवं व्यापारोन्मुख है और उनसे किसी भी प्रकार की ऐसी अपेक्षा नहीं रखी जा सकती, जिससे हमारी शिक्षा की बुनियाद मजबूत हो सके। शिक्षा के नाम पर मुनाफे का बाजार खड़ा करते ये निजी शिक्षण संस्थान न तो शिक्षा के प्रति अपनी जवाबदेही जाहिर करते हैं। शिक्षा का बाजार खड़ा करते जा रहे इन संस्थानों के भरोसे देश की शिक्षा की नींव कैसे रखी जा सकती है। शिक्षा के इस बिगड़ते स्वरूप के लिए हमारी सरकार कम जिम्मेदार नहीं है। एक तरफ जहां शिक्षा के अधिकार कानून के तहत हर नौनिहाल को शिक्षा मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया, वहीं इन लक्ष्यों को प्राप्त करने संबंधी कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई। अगर नीति बनाने में थोड़ा-बहुत काम हुआ भी तो उसे अमल में नहीं लाया जा सका। हालांकि दाखिले में निजी संस्थानों के मनमाने रवैये पर आ रही शिकायतों के आधार पर शिक्षा निदेशालय द्वारा कुछ मानक जरूर तय किए गए हैं, लेकिन वास्तविक तौर पर इसे मूल समस्या का समाधान नहीं कहा जा सकता। इसमें कोई दो राय नहीं कि तमाम निर्देशों के बावजूद निजी संस्थानों की मनमानी चलती रहेगी और मजबूर अभिभावक निजी संस्थानों के दबाव को झेलने को मजबूर होते रहेंगे। ऐसा होने के पीछे का सबसे बड़ा कारण यह है कि शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरत को हमारी सरकार द्वारा बिना ठोस नियंत्रण के निजी संस्थानों के हाथों सौपा जा चुका है। सरकार शिक्षा के नाम पर अभियान चलाने, योजना आदि शुरू करने के लिए पैसे पानी की तरह बहा रही है, लेकिन सरकारी संस्थानों में पर्याप्त शिक्षक, बैठने के लिए बेंच, भवन आदि तक का इंतजाम नहीं किया जा रहा है। ऐसे में सरकारी विद्यालयों के प्रति लापरवाह हो चुकी सरकार से मनमाने होते जा रहे इन निजी संस्थानों पर नियंत्रण की उम्मीद करना भी बेमानी नजर आता है। बहरहाल, सवाल वहीं का वहीं बना हुआ है कि क्या शिक्षा को लेकर कोई और विकल्प हो सकता है या दाखिले के नाम पर अभिभावक, नौनिहाल और समाज यों ही ठगे जाते रहेंगे? यह सवाल पूरी शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है, न कि किसी एक बच्चे के दाखिले मात्र से। शर्तो की बुनियाद पर शिक्षा बांटना शिक्षा के अधिकार का मजाक उड़ाने जैसा ही है और यह मजाक धड़ल्ले से उड़ाया जा रहा है। हम सबके आस-पड़ोस, हर जगह।
शिवानन्द द्विवेदी सहर

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