शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

चेहरे बदलने की सियासत : दैनिक जागरण में प्रकाशित





सियासत के अध्याय में एक कहावत यह भी प्रासंगिक होती जा रही है कि बात चरित्र पर बन आये तो चेहरा बदलना कई बार कारगर हो जाता है  ! समय-समय पर चेहरे बदल कर सियासत का चेहरा साफ़ रखने का यह फार्मूला भारतीय राजनीति में काफी व्यवहारिक होता जा रहा है, जिसका प्रयोग केन्द्र से लेकर राज्यों की सरकारों द्वारा भी खूब किया जाने लगा है ! पिछले कुछ सालों में ऐसा बहुतायत देखने को मिला है कि जब-जब सियासत का चरित्र कृरूप दिखा आनन्-फानन में चेहरे ही बदले गए, जिसे आज की मीडिया “डैमेज कंट्रोल” का भी नाम देती है ! हालाकि डैमेज  कंट्रोल का यह फार्मूला राष्ट्र की जनता के बीच राजनीति की शुचिता को कायम कर पाने में कितना कामयाब हो पाया है या हो पायेगा यह एक बड़ा विषय है और बहस का मुद्दा भी ! आज जब पिछले तीन साल के कार्यकाल में तीसरी बार यूपीए-२ की मनमोहन सरकार द्वारा मंत्रीमंडल के चेहरे बदलने की कवायदें की गयीं हैं तो निश्चित रूप से सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या इसके पीछे सरकार का मकसद सिर्फ नए चेहरों को मौका देना है या अंदरूनी सियासत कुछ और भी है ? लोकसभा चुनाव में अब तैयारीयों के दृष्टिकोण से ज्यादा समय शेष नहीं बचा और साथ ही कई राज्यों में कांग्रेस की साख दाँव पर लगी है,ऐसे में मंत्रीमंडल में हुए इस बड़े बदलाव को सियासत के गुणा-भाग से अलग रख कर नहीं देखा जा सकता ! भ्रष्टाचार के मुद्दे पर श्रृंखलाबद्ध घिरती जा रही मनमोहन सरकार अभी तक कोई ऐसा काम नहीं कर पाई जिससे कि उसे इस संकट से निजात मिल सके ! भ्रष्टाचार के मुद्दे को समेटने की कवायदों में एफ.डी.आई ,प्रोन्नति में आरक्षण,आर्थिक सुधार जैसे कई पैंतरे सरकार द्वारा चले गए लेकिन मामला बनता नहीं दिखा, जिससे कि सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राहत मिल सके !यह बात कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व  को बखूबी पता है कि आगामी चुनावों तक अगर इस भ्रष्टाचार के मुद्दे को समेटा नहीं गया तो परिणाम बहुत प्रतिकूल  भी आ सकते हैं ! मनमोहन सिंह के मंत्रीमंडल में हुए इस बड़े बदलाव, जिसमे दो चार नहीं बल्कि लगभग दो दर्जन चेहरों को बदला गया है और मनीष तिवारी सरीखे तमाम युवा चेहरों को मौका दिया गया एवं विशेष जिम्मेदारी दी गयी है ! बड़े स्तर पर हुए इस बदलाव को अगर चुनावी नफा नुकसान के आधार पर देखें तो मंत्रीमंडल में टीम राहुल गाँधी के तमाम युवा चेहरे सरकार में बने हुए हैं लेकिन हमेशा की तरह एक बार फिर राहुल गाँधी ने सरकार में जाने से इनकार कर दिया है ! यहाँ युवाओं को मौका देकर कहीं ना कहीं राहुल गाँधी की सियासत का भावी रास्ता साफ़ करने का प्रयास किया गया है साथ ही यह जताने का भी प्रयास किया गया है  कि राहुल गाँधी द्वारा युवाओं को राजनीति से जोडने का एजेंडा केवल बातों तक सीमित नहीं है ! आगामी लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में  देखा जाय तो  मंत्रीमंडल में हुआ यह बदलाव राजनीतिक दृष्टिकोण से राहुल गाँधी की आगामी सियासत को मजबूत करने एवं उनके राजनीतिक एजेंडे को पुख्ता करने के लिए किया गया है ! हालाकि यह बदलाव राहुल गांधी की सियासत को कितना बल देगा यह तो समय आने पर ही पता चलेगा क्योंकि पिछले तमाम चुनावों में राहुल गाँधी द्वारा आजमाए तमाम सियासी हथकंडे चुनावी अखांडे में चारों खाने चित्त ही हुए है ! ऐसे में आगामी चुनाव राहुल गाँधी के लिए भी किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं हैं,अत: पूरी कांग्रेस राहुल गाँधी को इस परीक्षा की घड़ी से उबारने में कोई  ढिलाई बरतने को तैयार नहीं दिख रही ! मंत्रीमंडल में हुए व्यापक बदलाव के समय को लेकर अगर स्थिति को समझने का प्रयास किया जाय तो एक बात स्पष्ट होती है कि भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों से घिरी सरकार द्वारा यह बदलाव तब किया गया जब प्रमुख विपक्षी दल बी.जे.पी खुद अपने अध्यक्ष नितिन गडकरी पर लगे तमाम भ्रष्टाचार एवं फर्जीवाड़े के आरोपों से बचाव की मुद्रा में आ गयी है ! ऐसे में अपना बचाव कर रही भा.जा.पा के विरोध से निजात पाकर कांग्रेस द्वारा सियासी हवा का रुख बदलने का प्रयास किया गया है, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता ! हालाकि इस पुरे बदलाव में कहीं भी ऐसा नहीं जाहिर होने दिया गया है कि सरकार को यह कदम भ्रष्टाचार के लगे तमाम आरोपों के कारण उठाने पड़ रहे हैं बेशक सुबोध कान्त सहाय जैसे मंत्रीयों को अपना पद छोडना पड़ा हो ! हालाकि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे तमाम मंत्री अभी भी सरकार में बने हुए हैं जिससे सरकार को यह कहने का संबल मिल सकता है कि इस पुरे बदलाव के पीछे भ्रष्टाचार का कोई लेना देना नहीं है,यह सिर्फ नए चेहरों को मौका देने के लिए किया गया है ! इस पुरे बदलाव में अगर देखें तो कांग्रेस द्वारा कहीं ना कहीं क्षेत्रों और राज्यों में कमजोर हो रहे अपने नेतृत्व को मजबूती देने का उद्देश्य भी साफ़ झलकता है ! अगर नजर पश्चिम बंगाल पर डाले तो हाल ही में ममता बनर्जी के समर्थन वापसी एवं प्रणब मुखर्जी के रायसीना हिल्स जाने के बाद सियासत के नजरिये से पश्चिम बंगाल सरकार के नियंत्रण से छूटता जा रहा था,शायद इसी पकड़ को कायम रखने के लिए और ममता बनर्जी से सियासी हिसाब बराबर करने के लिए बंगाल से तीन मंत्री बनाये गये ! वही अगर तुलनात्मक रूप से देखें तो यू.पी और बिहार मिलाकर कुल एक सौ तीस संसदीय क्षेत्र वाले राज्यों से मात्र पाँच मंत्रीयों को जगह मिल पाई है ! गठबंधन की सियासत में अगर यू.पी से कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं भी लगता तो बात मुलायम या मायावती से बनाई जा सकती है क्योंकि दोनों ही गठबंधन में भागीदार हैं, शायद इसी दूरगामी सोच के तहत इन राज्यों को मंत्रीमंडल में पर्याप्त भागीदारी नहीं दी गयी है !
      आगामी चुनावों को मद्देनजर रखते हुए इस पुरे फेर बदल को डैमेज कंट्रोल का प्रयास कहें या मुद्दांतरण की सियासत या इससे भी दो कदम आगे बढ़कर राहुल गाँधी की सियासी राह मजबूत करने का एकजुट प्रयास,लेकिन हर हालात में एक सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या ये फेर बदल कांग्रेस और उसके नेताओं के प्रति जनता में उठे आक्रोश और अविश्वास की भावना को खतम करने में सफल हो सकेगा ?क्योंकि गौर करने वाली बात है कि जिस शशि थरूर को पिछले साल आईपीएल फ्रेंचाइजी विवाद पर हटाया गया था अब पुन: मंत्री मंडल में जगह दी गयी है ! इतना तो लगभग तय के बराबर है कि कांग्रेस के लिए आगामी डेढ़ साल की राह आसान नहीं दिखती ! तमाम प्रयासों के बावजूद भी यह सवाल जनमानस के पटल पर बना ही रहेगा कि क्या चेहरे बदल जाने मात्र से सरकार का चरित्र भी बदल सकता है ? क्या सरकार द्वारा नए चेहरों को खड़ा करना इस बात की गारंटी है कि अब सबकुछ संभल चुका है ? जनता के मन में यह भी प्रश्न है कि क्या भ्रष्टाचार जैसी समस्या को महज चेहरा बदलने की सियासत से खतम किया जा सकता है ? आज जनता के पास ना तो सरकार का दिया लोकपाल है,ना महिला विधेयक,ना ही महंगाई पर किया गया नियंत्रण और ना ही रोजगार आदि के पर्याप्त अवसर ,ऐसे में क्या इन समस्यायों को पाटने में ये चेहरे कामयाब हो पायेंगे ,बड़ा सवाल बना हुआ है ! चेहरे बदलने से सरकार का चरित्र बदलेगा ऐसा कैसे मान लिया जाय ?


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