भारत एक कृषि प्रधान देश है ! कृषि प्रधान देश होने का तमगा हासिल होने के कारण हमारा यह प्रमुख दायित्व बनता है कि हम कृषि को आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक स्तर पर वरीयता दें ! पचास के दशक में जब प्रथम पंचवर्षीय की शुरुआत की गयी तो उस योजना के मूल में कृषि को रखा गया था ! तब से लेकर आज ग्यारहवी पंचवर्षीय योजना तक कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में कृषि को लगभग हर पंचवर्षीय योजना में जगह दी गयी है !आजादी के 6 दशक और ग्यारह पंचवर्षीय योजनाओं से गुजरने का बावजूद आज कहीं न कहीं हमारा किसान खुद को समस्याओं के मकड़जाल में खडा महसूस कर रहा है जहाँ उसे कृषि में बेहतर संभावनाओ का कोई रास्ता नही सूझ रहा ! क्या वाकई ऐसा नही लगता कि दुनिया के सबसे बड़े कृषि आधारित देशों में प्रमुख हमारा राष्ट्र अपनी कृषि प्रणाली एवं कृषि समबन्धी नीतियों में स्थायी तौर पर कुछ ऐसा नही कर पा रहा जिससे भारतीय कृषि व्यवस्था को सुवय्वस्थित आयाम दिया जा सके एवं कृषि के प्रति आम जन में आकर्षण पैदा किया जा सके ?हालाकि ऐसा कतई नही है कि कृषि के प्रति हमारी सरकार पुरी तरह से लापरवाह है या बिलकुल हाथ पर हाथ धरे बैठी है ! बजट दर बजट देखें तो कृषि बजट में एक सामान्य बढ़ोत्तरी देखने को मिलती रही है लेकिन यह बजट भारतीय कृषि को आकर्षक एवं मुनाफे का सौदा बनाने के लिए सदा से नाकाफी साबित होता रहा है !हाल ही के बजट सत्र में कृषि के लिए पिछले बजट के तुलना में 18% की बढ़ोत्तरी की गई ! बावजूद इस बढ़ोत्तरी के कोई ऐसा आशवासन नहीं दिया जा सकता कि यह बजट कृषि के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने में कारगर साबित होगा !18% की संतुलित वृद्धि के साथ इस सत्र का कृषि बजट बीस हज़ार दो सौ आठ करोड़ का रहा जबकि एक महत्वाकांक्षी योजना मिड डे मिल के नाम पर ११९३७ करोड़ रुपये सरकारी खजाने से लुटाये जा रहे है ! तुलनात्मक रूप से अगर हम देखे तो इन दोनों के तुलना में कृषि बजट नाकाफी नज़र आता है क्योंकि किसी महत्वकंशी योजना के नाम पर हम अपनी प्रथम वरीयता की बुनियादी योजनाओ को हाशिये पर लाना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नही प्रतीत होता है !
अगर वर्त्तमान सन्दर्भ में कृषि एवं कृषकों के बुनियादी हालत पर नज़र डाले तो कृषि के वास्तविक हालात कुछ ज्यादा बेहतर नहीं नज़र आ रहे ! आज आये din किसानो द्वारा कहीं आत्म हत्या तो कहीं आन्दोलन की खबरे आम होना इस बात को प्रमाणित करती हैं कि भारतीय कृषि व्यवस्था में सबा कुछ पटरी पर नही चल रहा है ! आज इंधन उत्पादों में बढ़ती मह्नागाई ने कहीं न कहीं सिचाई के साधनों को महँगा कर दिया है तो वही सरकार द्वारा खाद एवं बीज सामग्री के वितरण में हो रहे निचले स्तर के कुप्रबंधन ने किसानो की कमर तोड़ रखी है !गाँव-गाँव में बने सरकारी ट्युबेल्स की हालात जर्जर होती जा रही है या ट्युबेल्स का नव निर्माण कार्य लगभग बंद के बराबर है , परिणामत: किसानो को निजी एवं महंगे कृषि संसाधनों पर निर्भर रहने को मजबूर होना पड़ता है ! महंगाई एवं कुप्रबंधन के शिकार कृषक वर्ग को मानसून,पाला ,बारिश जैसे प्राकृतिक असंतुलन के दोहरे मार का संकट बना रहता है ! इन सभी समस्याओं में उलझा माध्यम वर्ग कृषि के क्षेत्र में निवेश करने से कदम खीच रहा है ! उदाहरण के तौर पर अगर पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों पर नजर डालें तो किसी ज़माने में ये जिले गन्ना खेती के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त थे ! केवल गोरखपुर मंडल के अन्तरगत आने वाले जिलों में लगभग दो दर्ज़न के आस पास सुगर फैक्टरी हुआ करती थीं और चीनी उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा यहीं से आता था ! लेकिन बढ़ती मह्नागाई के समान्तर बढ़ने कृषि संसाधनों के कारण धीरे-धीरे कृषक वर्ग का गन्ने की खेती से मोह भंग होता गया ! हालकी गन्ना खेती से किसानो के मोहभंग के कारणों में गन्ने के सही मूल्य निर्धारण एवं नियमित भुगतान का न होना भी एक प्रमुख कारन है ! आज इस क्षेत्र में इक्का दुक्का मीलों को छोड़ कर सारी अबंद पडी हैं और गन्ने की खेती न बराबर ही कही जा सकती है !
किसानो का कृषि से पलायन करने का संसाधनों के महंगे होने के अलावा एनी कारण भी हैं ! सरकार द्वारा किसानो के फसल उत्पादों का सही मूल्य निर्धारण एवं सीढ़ी खरीद प्रणाली की की आसन व्यवस्था नहीं किये जाने से भी किसान कभी कृषि को एक व्यवसाय के तौर पर नहीं देखते , परिणामत: यह महज़ बोने कटाने और खाने भर का अनाज जुटाने का साधन मात्र बन कर रह गया है ! आज उपरोक्त समस्याओं के परिणाम saraup माध्यम वर्ग कृषि में निवेश की बजाय नौकरी अथवा एनी उद्द्योग धंधों में निवेश करने को ज्यादा फायदे मंद मनाता है और इस दिशा में बहुसंख्यक किसान कदम बढ़ा चुके हैं ! माध्यम वर्ग का कृषि से बढ़ रहे दुराव एवं अविश्वास का होना इस कृषि प्रधान देश के भावी आर्थिक ढाँचे के लिए बहुत अच्छे संकेत नही हैं,क्योंकि आज भी देश की ७०% आबादी कृषि पर निर्भर है ! अगर इन आंकड़ो में लगातार कमी होती रही तो न सिर्फ देश में अनाज का संकट पैदा होगा बल्कि आर्थिक असंतुलन , बेरोजगारी, गरीबी आदि का ग्राफ भी ऊपर उठेगा ! आज हमरे तंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो भारतीय कृषि को प्रथम वरियत पर रख कर इसके बुनियादी स्तर का पूनाराविलोकन करे एवं इसके दुरुस्तीकरण की सही नीतियाँ तैयार करे ! उन उपायों पर विचार की जरुँरत है जिनके द्वारा कृषि को एनी उद्द्योगों की तरह आकर्षक एवं बहुविकल्पीय बनाया जा सके ! आज सरकार को ऐसी नीति निर्माण पर मंथन करने की आवश्यकता है जिसके द्वारा कृषि के क्षेत्र में निवेशकों अथवा क्रिसह्कों को रिझाया जा सके एवं कृषि को मुनाफे के निवेश के तौर पर स्थापित किया जा सके ! कृषि प्रशिक्षण जैसे बातों पर भी नीतिगत व्यवस्था की सख्त जरुँरत है !सही कदम एवं सही नीति निर्माण के द्वारा ही हरित क्रान्ति की संभावनाओ को तलाशा जा सकता है ! मीड डे मिल , खाद्य सुरक्षा जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओ को प्राथमिकता देने की बजे कृषि को प्राथमिकता देने की जयादा जर्तुरत हो ! दोयम दर्जे की योजनाओ के लिए कृषि को हाशिये पर लाना हमारे वरतमान की बहुत बड़ी भूल है जिसके परिणाम राष्ट्र हित में बाधक हैं ! कृषि को मुख्य धारा की योजनाओ में शामिल कर इसे ज्यादा आधुनिक एवं सुविधाजनक बनाने कि जरुँर्ट पर बल दिया जाना चाहिए ! समय रहते अगर इस पर ध्यान नही दिया गया तो भारत को कृषि प्रधान होने का मिला तमगा काला पड़ जाएगा और देश तमाम आर्थिक एवं घरेलु संकटों से घिर जाएगा !
शिवानन्द द्विवेदी "सहर"
saharkavi111@gmail.com
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