शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

अव्यवस्था की शिकार प्राथमिक शिक्षा : प्रकाशित अमर उजाला



प्रकाशित अमर उजाला 


                                       ऐसा कहा जाता है कि राष्ट्र  एवं समाज के सर्वांगीण विकास  कि बुनियाद प्राथमिक विद्दयालयों में ही रखी जाती है ! किसी भी स्वस्थ समाज एवं संपन्न राष्ट्र के निर्माण में उस राष्ट्र के शिक्षा पद्धति एवं शिक्षा स्तर की अहम् भूमिका होती है ! आज जब हिन्दुस्तान में गरीबी एवं अनियंत्रित होती जनसंख्या पहले से ही समस्या का शबब बनी हैं ऐसे में अगर प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था भी लचर एवं लास्ट-पस्त हो जाय तो यह बड़ी चिंता का विषय बन जाता है ! शिक्षा के प्रति जागरूकता लाने एवं आम लोगों के अन्दर शिक्षा के प्रति रूचि पैदा करने के लिए भले ही सरकार द्वारा लाख परियोजनाएं चलाई जा रही हों मगर सतही सच्चाई तो यही है कि आज भी देश के बहुसंख्यक प्राथमिक विद्द्यालय बदहाली एवं खराब व्यवस्था के दंश को झेल रहे हैं ! समझ से परे तथ्य यह है कि किन कारणों से अरबों करोड़ों शिक्षा के नाम सरकार द्वारा खर्च किये जाने के बावजूद स्थिति सुधारने की बजाय दिन-प्रतिदिन और बिगड़ती जा रही है ? आज सरकार द्वारा पोषित प्राथमिक विद्द्यालयों की बदहाली का आलम यह है कि ना तो विद्द्यालय के लिए पर्याप्त भवन उपलब्ध है ना ही पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध है ! ऐसे हालात में उचित शिक्षा की उम्मीद करना बस ख्याली पुलाव बनाने जैसा ही है ! शिक्षा के स्तर एवं व्यवस्था की जांच एवं निगरानी के नाम पर आंकड़ों और कागजी पुलिदो के अलावा कुछ ज्यादा हाथ नही लग सकता ! शिक्षा के इस पहली पडाव में शिक्षा जैसा कुछ भी नही दिखता है ! शिक्षा के अधिकार के तहत निशुल्क शिक्षा के नाम पर भले ही किताबें आदि मुफ्त देने की योजना सरकार द्वारा चलाई जा रही हों लेकिन इस किताबों के वितरण एवं प्रबंधन के आदि की व्यवस्था आज भी लालफीता शाही की भेंट चढ़ रही हैं ! बड़ा सवाल यह है कि हम सिर्फ मुफ्त किताबें बाटने की योजना बनाकर शिक्षा के स्तर को ऊपर कैसे ले जा सकते हैं जबकि हमारे विद्द्यालयों की मूलभूत आवश्यकताओं का  प्रबंधन ही लचर है ?   हाल ही में अपने पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रवास के दौरान मुझे ग्रामीण प्राथमिक विद्यालयों के हालात को नजदीक से देखने का अवसर मिला ! देवरियां जिला स्थित प्राथमिक विद्द्यालय सजाँव में दो से ढाई सौ विद्द्यार्थियों का दाखिला है जबकि उनकी नियमित उपस्थिति का औसत तीस से चालीस विद्द्यार्थी  प्रतिदिन का है ! सच्चाई यह भी है कि ढाई सौ बच्चों के शिक्षा का पूरा दरोमोदार महज एक नियमित अध्यापक एवं एक शिक्षामित्र के कन्धों पर है ! अगर इन आंकड़ो पर अनुमान लगाएं सिर्फ प्राथमिक विद्द्यालयों में शिक्षा की बदहाली ही नही बल्कि शिक्षा के लिए लुटाए जा रहे सरकारी  खजाने में बन्दर बाँट क संभावना भी नकारा नही जा सकता है !यह तो महज़ एक अदद विद्द्यालय का आंकड़ा मात्र है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के हर प्राथमिक विद्द्यालय के हालात कुछ ऐसे ही हैं ! यहाँ प्रश्न ये भी उठता है कि ढाई सौ के दाखिले वाले विद्द्यालय में अगर तीस बच्चे ही  रोज़ उपस्थित होते हैं तो बाक़ी बच्चों की शिक्षा कैसे पुरी होती है ? इसका जवाब भी बड़ा स्पष्ट है कि सरकारी प्राथमिक विद्द्यालयों में गिरते शिक्षा के स्तर के चलते अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला त्वरित रूप से बढ़ रहे निजी संस्थानों में कराने लगे हैं लेकिन सरकारी योजनाओं  जैसे छात्रवृति आदि का लाभ मिलता रहे इस मकसद से बच्चों का नाम समानांतर रूप से प्राथमिक विद्द्यालय में भी चलाते रहते हैं जो कि सरकारी धन का दुरुपयोग है !इसे हम नैतिक भ्रष्टाचार भी कह सकते हैं ! इससे यह साबित होता है कि हमारा प्रशासनिक तंत्र कतिपय राजनीतिक हितों को देखते हुए योजनाओं को तो आरम्भ कर देता है जबकि इन योजनाओं के क्रियान्वयन की स्थिति ढ़ाक के तीन पात से ज्यादा कुछ भी नही हो पाती है !योजनाओं के ऐलान मात्र को हमारे प्रशासन द्वारा उपलब्धि मान लिया जाता है !
                                                                आज हमारे प्राथमिक विद्यालयों की प्रथम जरुरत पर्याप्त शिक्षक,भवन,शिक्षा संबंधी सामग्री आदि है लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि शिक्षालय बनाने की बजाय हमारे प्राथमिक विद्यालय भोजनानालय , राशन वितरण गोदाम आदि बन कर रह गए हैं ! सही पोषण के नाम पर प्राथमिक विद्द्यालयों के धन का भी दुरुपयोग भी खूब हो रहा है ! आंकड़ो की गणित में ढाई सौ बच्चों का राशन लेकर महज़ तीस बच्चों को राशन खिलाकर बाकी धन का काला कारोबार भी धड़ल्ल्ले से चल रहा है ! ऐसा बिलकुल नही है कि इन प्राथमिक विद्द्यालयों की दशा शुरुआत से ही ऐसी है आज के दस से पंद्रह साल पहले तक प्रत्येक विद्द्यालय में कम से कम पांच शिक्षक एवं क्षेत्र के बहुसंख्यक विद्द्यार्थी भी हुआ करते थे ! उस समय शिक्षा मुफ्त भी नही थी और किताबों का वितरण आदि भी नही होता था लेकिन हमारा वर्तमान इस बात का प्रमाण है कि तत्कालीन शिक्षा का स्तर उत्तम था आज की बजाय ! इन्ही विद्द्यालयों से निकले लोग आज तमाम अछे पदों पर है जबकि आज की स्थिति में उन विद्द्यालयों में कोई अभिभावक  अपने बच्चों को पढ़ाना नही चाहता ! इन सभी बातों को देखकर एक बात तो स्पष्ट होती है कि कहीं ना कहीं शिक्षा जैसी मूल जरुरत को लेकर हमारा प्रशाशन कितना लापरवाह एवं गैर जिम्मेदार है !आज योजनाओं को लागू करने से पहले जरुरी यह है कि हम उसके क्रियान्वयन की नीति का सही निर्धारण करें ! समुचित प्रबंधन नीति के बिना किसी भी योजना को लागू करना इसके असफलता का प्रमुख कारण है ! आज शिक्षा को आकर्षक बनाने के लिए जरुरी है कि मिड डे मील की बजाय शिक्षा की अधिनिक तकनीक उपलब्ध करायी जाय ! अगर राष्ट्र निर्माण की बुनियाद वाकई  विद्द्यालयों में ही रखी जाती है कि हम बच्चों की संख्या के अनुपात में टीचर उपलब्ध कराएं एवं बच्चों की शिक्षा के प्रति अध्यापकों की जवाब देही तय करने का पुख्ता प्रबंध करें ! जरुरी यह भी नही है कि बच्चों को लुभाने के मकसद  से हम बिना किसी मानक एवं नियोजन के धनराशि बाटते रहें वरना इसमे कोई दो राय नही कि बच्चों को शिक्षा के नाम पर दी जा रही धनराशि का उपयोग खेतों में खाद आदि के लिए किया जाता है ! प्रथम जरुरत यह है कि हम प्रशासनिक  स्तर पर प्रतयेक वर्ष प्राथमिक विद्द्यालयों का जिलास्तरीय परीक्षा या सेमीनार आदि कराकर उनके प्रदर्शन के आधार पर हर सुविधा में वरीयता दें ! शिक्षा के पैसे का उपयोग मुफ्त भोजन एवं कपडे आदि बाटने में करना शिक्षा को गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम बनाने जैसा प्रतीत होता है !किसी भी विद्द्यार्थी के आर्थिक एवं सामाजिक पहलुओं का निराकरण शिक्षा की योजनाओं के माध्यम से करने का ही दुष्परिणाम है कि आज प्राथमिक विद्द्यालयों में दाखिले का उद्देश्य छात्रवृत्ति ,कपड़ा राशन आदि हासिल करना हो रहा है  और शिक्षा का मूल कहीं विलुप्त होता जा रहा है ! सामाजिक एकता और सामाजिक न्याय के प्रसार के नाम पर एक पंक्ति में बिठा कर भोजन देने की सरकारी योजना के लिए प्राथमिक विद्द्यालयों को चुना जाना हास्यपद एवं निराधार लगता है ! प्राथानिक विद्द्यालयों को शिक्षा का मंच बनाने की बजाय दुसरे दिशाओं में ले जाना शिक्षा को द्विउतीय पायदान पर धकेलने जैसा है ! शायद तंत्र की इन्ही दिशा भ्रमित नीतियों की वजह से ही आज देश के बहुसंख्यक प्राथमिक विद्द्यालय बदहाली के शिकार हो रहे हैं ! आज शिक्षा की मूल आवश्यकता नीति निर्माण , नियोजन,नियंत्रण एवं प्रबंधन आदि पर धन व्यय करने की बजाय गरीबी उन्मूलन,आहार पोषण ,सामाजिक समानता आदि के नाम पर धन प्रयोग कर शिक्षा के धन का दुरुपयोग किया जा रहा है ! समय रहते अगर सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा  कि योजनाओं के सही नियोजन  नही किया गया तो निश्चित रूप से राष्ट्र को बाल-श्रम,गरीबी,अशिक्षा जैसे तमाम समस्याओं से निजात नही मिलेगा बल्कि ये समस्याएँ दिन-प्रतिदिन  बढ़ती ही जायेंगी ! दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी प्राथ्यमिक विद्द्यालयों की खामिया जितनी बढ़ेगी निजी संस्थानों का प्रसार उतना ही ज्यादा होता जाएगा जो शिक्षा के लिए बहुत अच्छे संकेत के तौर पर नही देखा जाना चाहिए ! निजी शिक्षण संस्थानों को   शिक्षण के प्राथमिक विद्द्यालयों के  विकल्प के तौर पर देखना हमारे वर्तमान की सबसे बड़ी भूल है ! एक समय ऐसा आयेगा कि निजी शिक्षण संस्थानों का मूल उद्देश्य शिक्षा का प्रसार राष्ट्र निर्माण हेतु नही  बल्कि शिक्षा का व्यापारीकरण के तौर पर किया जाएगा ! प्रमुख शहरों में तो इसके लक्षण दिखाने भी लगे हैं ! आने वाले समय में मध्यमनिम्न वर्ग कीई जेबें इन निजी संस्थानों के आगे छोटी पड़ने लगेगी ! अत: प्रमुख जरुरत  यह है कि प्राथमिक विद्द्यालय के सही संचालन से शिक्षा के व्यापारीकरण पर भी लगाम लगाने कि कोशिश की जाय ! शिक्षा हमारी प्रमुख जरूरत है है एवं इसका पुख्ता इंतजाम आवश्यक है हमें इसके विकल्पों पर नही सुधार पर ज्यादा जो देने की जरूरत है !


शिवानन्द द्विवेदी "सहर"



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