मुझे अच्छी तरह से याद है, नब्बे का दशक अपने अंतिम पडाव पर था और देश में पहली बार कोई पूर्णतया गैर कांग्रेसी सरकार बनने जा रही थी जो अपना कार्यकाल पूरा कर सकी ! पचास के दशक से ही भारतीय राजनीति में अपनी पुरजोर मौजूदगी देते आये श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्त्व में जब भाजपा की सरकार बनी तो लाल कृष्ण आडवाणी को दुसरे सबसे बड़े मंत्री की हैसियत मिली ! लगभग चार दशक से ज्यादा से नेहरू-गांधी परिवार या कांग्रेस के इर्द-गिर्द परिक्रमा लगाती संदीय राजनीति को प्रथम दृष्टया किसी गैर कांग्रेसी दल के नेता के रूप में अटल-आडवानी की परिक्रमा करते देखा गया ! अटल-आडवाणी की यह राजनीतिक जुगलबंदी तत्कालीन दौर में सड़क के जयघोषों से लेकर संसद के अभिभाषणों तक खूब छायी रही ! हालाकि अटल-आडवानी कि यह जुगलबंदी महज सत्ता निहित किसी समझौते की बुनियाद पर नही थी बल्कि इस जोड़ी ने भाजपा के गर्भकाल से लेकर यौवनावस्था तक तमाम राजनीतिक संघर्षों को साथ-साथ झेला था ! जिन राजनीतिक संघर्षों से निकल कर अटल-आडवानी की इस जोड़ी ने भाजपा की बुनियाद को संसद के अन्दर पुख्ता किया वो महज एक राजनीतिक दल का निर्माण नही था बल्कि एकदलीय लोकतांत्रिक तानाशाही के दिशा में अग्रसर राष्ट्र को बचाने के लिए द्विदलीय व्यवस्था की मांग पर आधारित एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन था ! इस सन्दर्भ में अगर भारतीय राजनीति को नब्बे के दशक से पहले जाकर देखें तो शायद संसद के दोनों सदनों में संख्या बल के नाम पर एकजुट विपक्ष की स्थिति एवं अभिधारणा नगण्य के बराबर थी ! आपात काल के बाद की जनता पार्टी की उस सरकार के अल्पावधि को अगर अपवाद मान ले तो इन्डियन नेशनल कांग्रेस साढ़े चार दशकों तक लागातार भारतीय संसद की विकल्पहीन धुरी के रूप में सुशोभित होती रही ! लेकिन नब्बे के दशक में भारतीय राजनीति में बड़े परिवर्तनों को देखा गया ! श्री राजीव गांधी की ह्त्या के बाद ना सिर्फ भारतीय राजनीति में वरन स्वयं कांग्रेस में भी उथल पुथल की स्थिति उत्पन्न हुई ! समय की नजाकत कहें या जनता में कांग्रेस के विकल्प की प्रत्याशा, नब्बे के दशक के शुरुआती दौर में में ही भाजपा के रूप में द्विदलीय संसदीय व्यवस्था की संभावनाए प्रबल हो चुकी थीं ! एक तरफ जहाँ अटल बिहारी वाजपेयी अपने मंत्रमुग्ध करने वाले उद्दबोधनो से जनता का ध्यान विकल्प की राजनीतिक व्यवस्था की तरफ आकृष्ट कर रहे थे तो वही दूसरी तरफ भाजपा के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवानी रथ यात्राओं के बहाने देश की राजनीतिक तापमान का ध्रुवीकरण करने निकल चुके थे ! एक तरफ जहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आशीर्वाद भाजपा को मिला हुआ था तो वहीँ दूसरी तरफ राम मंदिर लोगों की भावनाओं की आवाज बनने लगा था ! फिर देर किस बात कि थी, देखते ही देखते अटल-आडवानी की इस जोड़ी ने सदन के राजनीतिक नजरिये को ही बदल डाला और तमाम उठा-पटक के बाद सन ९८-९९ में कई दलों से जनतांत्रिक गठबंधन का फार्मूला निकाल कर कांग्रेस को विपक्ष में बैठने पर मजबूर कर दिया ! जब तक अटल बिहारी वाजपेयी सक्रिय राजनीति में रहे सबके आदर्श और चहेते बने रहे और पुराने दिनों से आडवानी का नाम उनके नाम के साथ आने की वजह से आडवानी की भी हैसियत वाजपेयी के कतार में ही आती रही !
आज जब अटल सक्रिय या किसी भी राजनीतिक सहभागिता से दूर हैं तो भाजपा में भी काफी कुछ बदल चुका है ! समय और परिस्थितियों के साथ-साथ भाजपा में नेताओं की महत्वाकांक्षाओं का दायरा भी बदलता गया ! २००४ और २००९ के लोकसभा चुनावों में मिली क्रमश: हार ने भाजपा के आतंरिक झुंझलाहट को सामने ला दिया है ! २००९ का चुनाव पुरी तरह से आडवानी के नाम पर लड़ा गया एवं आडवाणी को समर्पित था लेकिन उस चुनाव में मिली शिकस्त ने आडवाणी के कद को अपनो के बीच ही छोटा कर दिया ! स्वाभाविक तौर पर भाजपा को परदे की आड़ से मोडरेट करने वाले संघ ने भी आडवानी पर विश्वास दिखाना कम कर दिया ! आज जब आगामी लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है तो निश्चित तौर पर भाजपा में अंदरूनी उठा-पटक का होना स्वाभाविक है ! आडवानी के प्रति हो रहे आर.एस.एस सहित तमाम नेताओं के मोहभंग ने दूसरी कतार के नेताओं में प्रतिस्पर्धा की हलचले तेज़ कर दी हैं ! हाल ही में मुम्बई में आयोजित भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नरेंद्र मोदी के जिद पर संजय जोशी के इस्तीफे को इस अंतर्संघर्ष का एक उदहारण कह सकते हैं ! संजय जोशी के इस्तीफे ने यह साबित कर दिया कि अब भाजपा में संगठनात्मक तौर पर वो बात नही रही जो वाजपेयी के समय में दिखती थी ! हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में औसत प्रदर्शन करने वाले संघ के चहेते गडकरी को दुबारा भाजपा अध्यक्ष बनाने में भी संघ का प्रभाव निहित था ! एक तरफ जोशी को किनारे कर संघ ने मोदी को खुश किया तो दूसरी तरफ गडकरी को दुबारा पद्लाभ दिया ! हालाकि मोदी के जिद पर भाजपा का शीर्ष नेतृत्त्व खुश नही था लेकिन उसके पास कोई और चारा भी नही था ! राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बैठक के तुरंत बाद अडवानी और सुषमा स्वराज का ना दिखना इस बात का मौन संकेत है कि भाजपा में शीर्ष नेता खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं ! इसमे कोई संदेह नही कि आज अडवानी इस बात को लेकर कतई आश्वस्त नही होंगे कि आगामी लोकसभा चुनावों में उनकी क्या हैसियत रहेगी और किन जिम्मेदारियों के तहत वो मैदान में उतरेंगे ! संघ का पुरजोर समर्थन पाकर गडकरी के बयान अकसर पुराने नेताओं के आजीवन समर्पण को चुनौती देने वाले होते हैं तो वहीँ बार-बार मोदी का नाम प्रधानमंत्री के रूप में उछाला जाना अडवानी सरीखे नेताओं के लिए किसी गलें में फंसे कांटे से कम नही है ! सुषमा स्वराज , अरुण जेटली सरीखे नेताओं द्वारा यह पचा पाना आसान नही कि उनके राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहते ही किसी राज्य के मुख्यमंत्री का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे लाया जा रह हो ! वर्चस्व के अंतर्संघर्ष से जूझ रहे भाजपा के वर्तमान संघठन को मोदी के नाम पर अगर सहमति बनाने में कामयाबी मिल भी जाए तो जनतांत्रिक गठबंधन के घटकों में प्रमुख जनता दल(यु) को मनाना टेडी खीर साबित होगा ! भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद अपनी सेक्युलर छवि बनाकर मुस्लिम समुदाय को अपने पाले में रखने वाली ज.द.यु ,मोदी के नाम पर पर कभी सहमत नही हो सकती !
अपने शैशव काल से अबतक के सफ़र में भाजपा ने उतार-चढ़ाव के कई दौर देखे लेकिन जैसे जैसे अटल-आडवानी की जुगलबंदी की गाँठ कमजोर होती गयी और आडवानी अकेले पड़ते गए तो अब भाजपा में दर्जनों दलों को जोड़ कर सरकार चलाने का फार्मूला तो दूर की बात अपनो को ही साथ रखने में खासी मेहनत करनी पड़ रही है !ना तो आज वो फार्मूला दिख रहा ना ही शीर्ष नेताओं के प्रति आस्था और अनुशासन ही दिख रह , आज तो भाजपा में हर दूसरी और तीसरे कतार का नेता खुद को जबरन पहली कतार में धकेल कर आगे होने को उत्सुक दिख रह है ! पार्टी में संघ के बढ़ते वर्चस्व और पुराने नेताओं की क्षमताओं पर उठ रहे अंदरूनी सवालों ने आगामी चुनाव में भाजपा कि स्थिति को कठघरे में खडा कर दिया है ! अटल-अडवानी के दौर की भाजपा और गडकरी-मोदी के दौर की भाजपा में अगर तुलना करें तो यही बात खुलकर आती है कि "एक थे अटल-अडवानी एक थी भाजपा" !!!
शिवानन्द द्विवेदी "सहर"
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