शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

महफूज नहीं भारत-नेपाल सीमा : अप्रकाशित लेख




सीमा सुरक्षा सहित तमाम अन्य अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मसले पर जिस तरह से भारत सरकार द्वारा अक्सर चिंता जताई जाती है अथवा नीति निर्माण के पुख्ता इंतजाम किये जाते रहे हैं, इस मामले में भारत-नेपाल सीमा  सुरक्षा नीति की स्थिति को अपवाद  कहा जाना उचित होगा ! भारत-नेपाल सीमा पर चल रही हलचलों को लेकर कोई राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ठोस नीति निर्माण का ना तो विशेष प्रयास ही किया गया है और ना ही इसे मुख्यधारा के अंतर्राष्ट्रीय मामले के तौर पर स्वीकार ही किया गया है ! रक्षा मंत्रालय एवं गृह मंत्रालय दोनों ही सीमा-सुरक्षा एवं आंतरिक सुरक्षा के मसले पर नेपाल-भारत सीमा पर चुप्पी साधे हुए हैं और किसी भी नीतिगत निर्णय का खाका तक नहीं तैयार कर पाए हैं ! सरकारों द्वारा नेपाल-भारत सीमा सुरक्षा के मसले पर दिखाई जा रही इस असंवेदनशीलता का कतई यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि नेपाल सीमा पूर्णतया सुरक्षित है और वहाँ सब कुछ शांतिप्रिय ढंग से चल रहा है ! सरकार को यह बात बखूबी पता होनी चाहिए  कि राजशाही के खातमे एवं माओवादी संघर्षों के बाद से अभी तक नेपाल की आंतरिक स्थिति सामान्य नहीं हो पाई है और नेपाल अपने आंतरिक संघर्षों से जूझ रहा है जिसका असर निकटतम पड़ोसी होने के नाते भारतीय सीमा पर पड़ना स्वाभाविक है  ! बेशक नेपाल में माओवादी-यू.सी.पी.एन सरकार में गठबंधन के रूप में शामिल हैं लेकिन नेपाल के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य अभी भी सामान्य नहीं हो पाए हैं और संविधान सभा के मसले पर नेपाल में स्थिति अस्थिर बनी हुई है ! आज नेपाल में माओवादीयों के भी दो धड़े बन गए है जिसमे एक धड़ा माओवादी नेता मोहन वैद्य के नेतृत्व में सक्रिय है और ये भारत का धुर विरोधी धड़ा है ! हालाकि माओवादीयों द्वारा तो हमेशा से भारत को नेपाल के पिछडेपन का कारण बता कर भारत  विरोध किया जाता रहा है ! एक लम्बे हिंसक संघर्षों के बाद जब नेपाल में  राजशाही का अंत हुआ और सत्ता में माओवादियों की हिस्सेदारी सुनिश्चित  हुई तो निश्चित तौर पर भारत-नेपाल के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर असर पड़ना स्वाभाविक था, और पड़ा भी !संबंधो के बदलते नजरिये का ही फर्क ही तो था कि नेपाल द्वारा भारत के साथ हुए साठ के दशक के उस समझौते को ताक पर रखते हुए नए हथियार खरीदे गए,जिसमे कहा गया था कि नेपाल कोई भी हथियार आदि बिना भारत की अनुमति के नहीं खरीदेगा ! अगर बात सत्ता बदलावों से भारत सीमा सुरक्षा पर पड़े असर की करें तो उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों से सटे नेपाल सीमा पर हालात लागातार नाजुक होते जा रहे हैं और आये दिन नेपाल की तरफ से भारत विरोधी मुहीम को को बढाने का काम किया जाता रहा है ! अभी कुछ ही दिनों पहले नेपाल के माओवादी नेता मोहन वैद्य के नेतृत्व वाले माओवादी गुट द्वारा भारत से नेपाल जाने वाली गाड़ियों को लेकर जो हिंसात्मक रुख अख्तियार किया गया जिसमे तमाम गाड़ियों को निशाना बनाया गया लेकिन उस पर हम कोई अंतर्राष्ट्रीय कदम नहीं उठाये, कहीं ना कहीं यह असंवेदनशीलता नेपाल सीमा एवं नेपाल  को लेकर हमारी लचर नीति को दर्शाता है ! नेपाल की तरफ से भारत विरोधी मुहीम अक्सर चलाई जाती रही हैं बावजूद इन सबके इस अंतर्राष्ट्रीय समस्या पर अभी तक हमारी सरकार गंभीर नहीं हो पा रही है ! नेपाल से सटे तमाम जिलों जिनमे महाराजगंज,सिद्धार्थनगर,लखीमपुर खीरी प्रमुख हैं,से भारी मात्रा में खाद एवं अनाज आदि नेपाल सीमा पार भेजा जाता रहा है जिससे नेपाल के पहाड़ी इलाकों में लोगों का जीवन यापन होता है ! ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि खुलेआम चल रही ये आवाजाही क्या सुरक्षा के दृष्टिकोण से उचित है ? क्या इस आवाजाही पर सरकारी  अंकुश नहीं लगाया जाना चाहिए ?
                  भारत-नेपाल सीमा की सुरक्षा को लेकर हमारे पास कोई ठोस नीति नहीं हो पाने के कारण नेपाल सीमा, बाहर से आने वाले माओवादी संगठनो,अपराधियों,आतंकवादीयों के लिए सबसे आसान रास्ता बनती जा रही है और भारी संख्या में हथियार आदि की तस्करी की संभावना प्रबल होती जा रही है ! इसमे कोई दो राय नहीं कि बांग्लादेश एवं पाकिस्तान सीमा पर चौकस सुरक्षा इंतजाम होने के कारण तमाम वाह्य राष्ट्रविरोधी ताकते नेपाल के रास्ते भारत में घुसपैठ करने की कोशिश करती रही हैं या बहुत हद तक घुसपैठ कर पाने में सफल भी हो रही हैं,जिस पर नकेल कसने में हम नीतिगत रूप पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहे हैं ! भारत-नेपाल सीमा की कमजोर सुरक्षा नीति से  देश के आंतरिक एवं वाह्य सुरक्षा पर पडने वाले प्रभावों को अगर चीन एवं पाकिस्तान के परिप्रेक्ष्य में  समझने का प्रयास करें तो इस बात को स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए  कि चीन द्वारा नेपाल का इस्तेमाल भारत में आंतरिक अस्थिरिता का माहौल बनाने के लिए किया जा सकता है या किया भी जा रहा है ! इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता है कि नेपाल में राजशाही के खिलाफ माओवादी संघर्ष को शुरूआत से ही चीन का आंतरिक समर्थन प्राप्त था ! ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि आज जब माओवादी दल सत्ता में भागीदार हैं तो चीन भारत के खिलाफ अपने मकसद को साधने में कोई कोर कसर नहीं छोडेगा ! दूसरी तरफ पाकिस्तान भी मावोवादी ताकतों का सहारा लेकर कहीं ना कहीं अपनी आतंकवादी गतिविधियों को नेपाल से सटे सीमावर्ती इलाको में बढाने में हमेशा से प्रयासरत रहा है और भारी संख्या में आतंकवादी गतिविधियों में इस्तेमाल में होने वालीं सामग्री नेपाल के रास्ते भारत भेजी जाती रही हैं ! भारत में पहले से ही नक्स्लावाद एवं माओवाद एक आंतरिक संकट बना हुआ है ऐसे में अगर नेपाल सीमा से इन संगठनों को मदद पहुचती है तो निश्चित रूप से यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए चिंता की बात है जिस पर सरकार को गंभीर होने की जरुरत है !
            आज जब पाकिस्तान,बांग्लादेश एवं चीन से लगी भारतीय सीमाओं को चौकस सुरक्षा इंतजामों से लैस किया गया है तो सवाल उठना लाजिमी है कि फिर नेपाल सीमा के साथ इस तरह का दोहरा रवैया क्यों ? इस संदर्भ में नेपाल के आंतरिक हालात को संज्ञान में लेते हुए  नेपाल-भारत सीमा पर भारत के विदेश मंत्रालय एवं एवं रक्षा मंत्रालय सहित गृह मंत्रालय को गंभीर होने की जरुरत है एवं सीमा सुरक्षा को लेकर द्विपक्षीय ठोस नीतियों को अमली जामा पहनाने  की जरुरत पर भी  बल दिया जाना चाहिए  ! नेपाल-भारत मसले को गंभीरता से लेते हुए आवाजाही के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानको के अनुरूप नियम बनाने एवं उसके क्रियान्वयन पर ठोस नीति निर्माण की आवश्यकता है  ! नेपाल की लगभग पाँच सौ किलीमीटर में फैली सीमा को किस तरह से चाक चौबंद किया जाया इसके लिए भी आंतरिक सुरक्षा नीतियों सहित वाह्य सुरक्षा नीतियों को पुख्ता करने पर समय रहते ठोस कदम उठाये जाने चाहिए  ! नेपाल के आंतरिक राजनीति में बढते माओवादी हस्तक्षेप को मद्देनजर रखते हुए भारत को नेपाल-भारत सीमा की गंभीरता को समझना अत्यंत जरूरी है वरना नेपाल सीमा के प्रति नरम रुख देश के आंतरिक सुरक्षा के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकते हैं !

शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

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