शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

पी.एम् का सिर्फ बेदाग़ होना काफी नही : अप्रकाशित लेख




                                                अपने ईमानदारी और दागमुक्त छवि को ढाल बनाकर किसी भी प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति द्वारा अपनी सरकार के खामियों से पल्ला झाड लेना किसी भी दृष्टिकोण से तर्कसंगत नही प्रतीत होता ! किसी भी देश के प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति जैसे गरिमामयी और जवाबदेही वाले शक्ति सम्पन्न पद पर बैठने के बाद व्यक्ति "गौण" हो जाता है और पद विशेष हो जाता है ! इन हालातों में पदासीन व्यक्ति के कार्य नीतियों को संविधान सम्मत पद नियमो के आधार पर विश्लेषित किया जाना चाहिए ना कि उस व्यक्ति के निजता के आधार पर ! पिछले कुछ महीनो से श्रृंखलाबद्ध भ्रष्टाचार के खुलासो में सरकार के आला मंत्रियों के नाम उजागर होने और भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए जनांदोलनो ने आरोप - प्रत्यारोप का एक सिलसिला शुरू किया जो अभी भी थमने का नाम नही ले रहा ! काला-धन मसले पर सरकार से पहले से खार खाए बाबा रामदेव हो या लोकपाल बिल के मसले पर एक बार फिर सरकार के हाथों ठगा-ठगा सा महसूस करने वाली टीम अन्ना , दोनों ही भ्रष्टाचार के मुद्दे  पर  सरकार पर बयानों के तीर चलाने से कभी नही चुकते ! अपने बयानों से सरकार के तमाम शीर्ष मंत्रियों को आहत करती रही टीम अन्ना ने जब कोयला ब्लाक आवंटन मसले पर सीधे प्रधानमंत्री पर निशाना  साधा तो समूचे कांग्रेस में खलबली मच गई और आनन् फानन में सरकार के तमाम बड़े मंत्रियों सहित प्रधानमंत्री खुद अपने बचाव में बयान देने सामने आये ! प्रधानमंत्री की बेदाग़ छवि का हवाला देकर गाहे-बगाहे अपनी सरकार को साफ़-सुथरी दिखाती रही कांग्रेस भला इस मसले पर चुप कैसे रह सकती थी ! हालाकि इस बार प्रधानमंत्री ने खुद अपने बंचाव में कहा कि उन पर लगे आरोपों की पुष्टि होने पर वो सार्वजनिक राजनीति  से खुद को दूर कर लेंगे ! आये दिन किसी ना किसी प्रकरण में कांग्रेस द्वारा डा.मनमोहन सिंह की बेदाग़ एवं इमानदार छवि का हवाला देकर पुरे प्रकरण से उनको अलग कर भावनात्मक सहानुभूति बटोरने का काम पहले भी किया जाता रहा है ! शायद कांग्रेस इस बात को भूल चुकी है या भूलने का नाटक करती रही है कि तमाम समस्याओ से जकडे इस देश को इसकी बुनियादी समस्याओं से इतर कोई बेदाग़ व्यक्ति नही बल्कि इन सभी समस्याओं पर जनता के प्रति जवाबदेह एक मजबूत प्रधानमंत्री की जरुरत है ! किसी की बेदाग़ छवि उसको उसके संविधान प्रदत्त कर्तव्यों ,दायित्वों एवं जवाबदेहियों से मुक्त होकर बेदाग़ बने रहने की कतई इजाजत नही देती !
भारतीय संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री की भूमिका हर दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है !भारतीय लोकतंत्र में  प्रधानमंत्री पद समय के साथ परम्परागत रूप से अधिक महत्वपूर्ण भी होता गया है एवं व्यवहारिक कार्यपालिका का महत्व जैसे-जैसे बढ़ा संवैधानिक कार्यपालिका प्रमुख के रूप में राष्ट्रपति की स्थिति व्यवहारिक रूप से गौण होती गयी ! वर्तमान परिवेश में भारतीय प्रधानमंत्री कि शक्तियां ब्रिटिश प्रधानमंत्री के सामानांतर हैं जबकि भारतीय संसद का अधिकार क्षेत्र आज भी ब्रिटिश संसद से छोटा है ! आज भारत का प्रधानमंत्री ना सिर्फ बहुमत दल का नेता है बल्कि मंत्री मंडल का प्रमुख नेतृत्वकर्ता भी है ! व्यवहारिक तौर पर सर्वशक्ति संपन्न प्रधानमंत्री की जवाबदेही  एवं दायित्वों की सूची भी राष्ट्रनिर्माण में काफी महत्वपूर्ण भूमिका रखती है ! भारत का प्रधानमंत्री समूचे सरकार एवं अपने मंत्रियों के कार्यों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति जवाबदेह होता है एवं यही जवाबदेही उसे मजबूत और महत्वपूर्ण बनाती है ! एक प्रधानमंत्री के रूप में उसकी शक्तियों ,दायित्वों एवं जवाबदेहियों के आधार पर अगर डा. मनमोहन सिंह के ऊपर उठ रहे सवालों एवं आक्षेपों पर गौर करें तो इन सवालों को किसी व्यक्ति के निजी छवि से जोड़ कर हमें कतई नही देखना चाहिए ! जिस तरह से मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत छवि को आगे लाकर एक प्रधानमंत्री के रूप में उनके दायित्वों पर उनकी  जवाबदेही  से विमुख किया जाता रहा है वह कहीं ना कहीं बतौर प्रधानमंत्री उनको कमजोर साबित करता है ! किसी भी भ्रष्टाचार संबंधी या अन्य मसलों पर व्यक्तिगत छवि को दिखाकर मूल समस्या पर एक प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण को नही सामने लाना बड़ा ही अव्यवहारिक लगता है क्योंकि यहाँ सवाल मनमोहन सिंह  की छवि या निष्ठा का नही बल्कि एक प्रधानमंत्री की कर्तव्य परायणता,दायित्व निर्वहन,एवं जनता के प्रति जवाबदेही का है ना कि डा. मनमोहन सिंह को अपनी छवि साबित करनी की,कि व्यक्तिगत रूप से वो कैसे हैं ! लाख बेदाग़ रहते हुए भी अगर मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री अपने दायित्वों के निर्वहन में असफल रहते हैं तो इसकी भारपाई उनके व्यक्तिगत छवि से नही की जा सकती ! उदाहरणार्थ अगर देखे तो वाजपेयी सरकार में बाजपेयी की छवि पुरे कार्यकाल के दौरान बेदाग़ रही लेकिन बावजूद इन सबके उनकी व्यक्तिगत छवि उनकी सरकार को नही बचा सकी !
                                    टीम अन्ना के लगाये आरोपों को सन्दर्भ में रख कर अगर सरकार के पिछले तीन साल के कार्यकाल पर नज़र डाले तो कई बार ऐसी परिस्थितिया दिखी हैं जहाँ बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने दायित्वों के निर्वहन  में पुरी तरह असफल नज़र आये हैं ! २ जी घोटाले में अपने ही एक महत्वपूर्ण मंत्री का नाम आने के बाद अगर कोई प्रधानमंत्री सिर्फ अपनी जवाबदेही का दायरा  इतने तक सिमित रखे कि इस सन्दर्भ में उसको कोई जानकारी नही थी और इससे उसका  कोई लेना देना नही है, तो इसे जवाबदेही नहीं बल्कि अपनी जवाबदेही से मुकरना अथवा भागना कहते हैं! चाहे वो लोकसभा में काले-धन पर लाया गया कोरा श्वेत पत्र हो या राज्यसभा में लोकपाल को पास कराने की जिम्मेदारी, हर जगह हमारा प्रधानमंत्री गौण सा नज़र आता है ! अब लोकपाल को लेकर बतौर प्रधानमंत्री दिए गए लिखित प्रस्ताव पर अगर सवाल उठते हैं तो वो भी प्रधानमंत्री के जवाबदेही के दायरे में ही आते हैं ! प्रधानमंत्री पद अगर जीत का सेहरा अपने सर बंधवाता है तो हार का ठीकरा भी उसी के सर फूटना तय है ! आज लोकपाल का लगभग वही हश्र है जो चार दशक पहले था ,वहीँ का वहीँ जैसे लोकपाल को सरकार द्वारा किसी  गोल-मोल रास्ते पर लुढ़का दिया गया हो जो जहां से चलती है वहीँ आ जाती है ! बतौर प्रधानमंत्री अगर उन पर कोई आरोप लग रहे हैं तो यहाँ  उनको उनकी  व्यक्तिगत छवि की दुहाईयाँ नही बचा सकती ! सवाल वाजिब और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से जरुरी भी कि आपके नाक के नीचे आप ही के लोग सरकारी धन का बंदरबांट कर रहे हैं तो आखिर आपको पता क्यों नही चल पाता ? यह सवाल एक प्रधानमंत्री के नेतृत्व क्षमता पर उठना ही चाहिए ! बतौर प्रधानमंत्री आप की जिम्मेदारियां और जवाबदेही दोनों सुनिश्चित हैं और आप से सवाल भी उसी दायरे में पूछ जायेंगे !
आरोप-प्रत्यारोप के इस पुरे प्रकरण में जो मूल तथ्य सामने आता है कि इस पुरे मसले को व्यक्तोंमुख ना करके पदोंमुख रखना चाहिए ! अगर प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठ कर व्यक्ति अपने दायरे को इतना निजी कर ले कि उसे सर्भौमिक समस्याओं से कोई सरोकार ना हो और वह महज़ अपने निजित्व को बचाने की तरफ अग्रसर हो जाय तो यह किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नही है ! प्रधानमंत्री का इमानदार अथवा बेदाग़ होना लोकतान्त्रिक मूल्यों के लिए काफी नही होता उसे निजता के दायरे से निकल कर एक पारदर्शी व्यवस्था के साथ उचित जवाबदेही पर काम करना होता है ना कि व्यवस्था के गलत दिशा में भटकने पर अपना ही रास्ता बदल लेना होता है ! लोकतंत्र में किसी की इमानदारी और छवि को उसके पद के कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों के गारंटी के तौर पर कतई स्वीकार नही किया जा सकता ! सवाल टीम अन्ना का नहीं या बाबा रामदेव का नहीं ,सवाल यह है कि प्रधानमंत्री पद की जवाबदेही का दायरा उसके व्यक्तिगत मूल्यों पर नहीं निर्धारित हो बल्कि संविधान के अनुरूप हो !

शिवानन्द द्विवेदी "सहर"

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