शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

देवनागरी बनाम रोमन के दुष्चक्र : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख




कोई भी भाषा किसी न किसी लिपि पर निर्भर जरुर होती है लेकिन कोई खास लिपि किसी भाषा के लिए अनिवार्य है या नहीं इस विषय पर वृहद स्तर पर बहस चल रही है ! भाषा और लिपि दोनों एक दूसरे से करीब से संबद्ध होने के बावजूद भाषाई तकनीक के दृष्टिकोण से बहुत अलग-अलग तथ्य है एवं दोनों के अलग-अलग मायने हैं, अलग-अलग परिभाषाएं हैं ! एक तरफ जहाँ लिपि और भाषा को लेकर बहुसंख्यक शिक्षित वर्ग में भ्रम की स्थिति देखने को मिलती है तो वहीँ भाषा की बारीकियों को करीब से समझने वाले भाषाविदों के बीच भी यह हमेशा एक बहस का विषय रहा है ! हिन्दी के संदर्भ में अगर लिपि और भाषा को समझने का प्रयास करें तो जहाँ हिन्दी एक संपन्न भाषा के तौर पर प्रतिष्ठित है तो वहीँ देवनागरी इस भाषा की सबसे सहज और तटस्थ  लिपि के तौर पर जानी जाती है ! इसमे कोई दो राय नहीं कि  अपने भाषाई विकास के शैशव काल से ही हिन्दी को देवनागरी में ही लिखे जाने की सर्वमान्य परम्परा रही है और हिन्दी के लिए देवनागरी को सबसे अनुकूल लिपि के तौर पर स्वीकार किया गया है ! लेकिन जैसे-जैसे प्रद्द्योगिकी और तकनीक के त्वरित विकास ने जनसंचार एवं लेखनी को प्रभावित करना शुरू किया हिन्दी में लिपि को लेकर एक नयी बहस ने जन्म ले लिया ! तकनीक के रास्ते सहूलियत तलाशने की होड़ में भागते वर्तमान समाज ने हिन्दी लेखनी में देवनागरी की बजाय रोमन को ज्यादा आसान और सहज उपलब्ध माध्यम मानना शुरू कर दिया ! आज हिन्दी लेखनी के संदर्भ में मूल देवनागरी बनाम रोमन की बहस ने भाषाविदों को भी दो अलग-अलग धड़ों में बांट दिया है और इस बहस को ज्वलंत किया है ! हिन्दी के लिए प्रयुक्त लिपि के संबंध में एक धड़ा यह मानता है कि हिन्दी के अंतरराष्ट्र्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार एवं  विकास की दिशा में तकनीक के आधुनिक संसाधनों एवं वैश्विक मंचों पर देवनागरी लिपि की जटिलता बाधक साबित हो सकती है जबकि रोमन लिपि के माध्यम से हिन्दी को ज्यादा सहजता से प्रचारित किया जा सकता है ! भाषा के जानकारों का यह समूह इस बात पर बल देता है कि तकनीकी विकास के अनुरूप तेज़ी से बदलते सामाजिक एवं शैक्षिक वातावरण में हिन्दी लेखनी में रोमन लिपि को स्वीकार करना हिन्दी के वैश्विक स्तर पर प्रसार के लिए सबसे कारगर उपाय साबित हो सकता है ! हिन्दी को देवनागरी के दायरे में बाँध कर रखना भाषाई दृष्टिकोण से हिन्दी को अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर सीमित और संकुचित बनाता है ! वहीँ देवनागरी को हिन्दी भाषा के लिए सबसे उपयोगी लिपि को मानने वाला दूसरा तबका हिन्दी लेखन में रोमन स्वीकृति को हिन्दी के भाषाई व्याकरण एवं शब्द संरचना के दृष्टिकोण से अनुचित मानता है ! देवनागरी के समर्थकों का मानना है कि किसी भी भाषा को बेशक किसी भी लिपि में लिखा जा सके मगर भाषाई परिशुद्धता के दृष्टिकोण से यह देखना जरूरी है कि कौन सी लिपि किस भाषा के शब्द संरचना,शब्द उच्चारण,व्याकरण आदि के दृष्टिकोण से सबसे तटस्थ और पुष्ट प्रतीत होती है ! इनके अनुसार, उच्चारण एवं शब्द संरचना के हिसाब से हिन्दी को जितनी सुंदरता और सहजता से देवनागरी में प्रस्तुत किया जा सकता है उतनी स्पष्टता से रोमन में कर पाना संभव नहीं है !
      भाषा और लिपि के संदर्भ में चल रही यह बहस आजादी के बाद से ही पनपने लगी थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी रोमन में हिन्दी लिखने से कोई एतराज नहीं था ! तबसे लेकर आज तक अक्सर रोमन बनाम देवनागरी की बहस साहित्य जगत में चलती रही है और इस पर जवाब सवाल होता रहा है ! अगर थोड़ा अलग नजरिये से देखें तो भारत में हिन्दी ही नहीं वरन उर्दू को भी देवनागरी में ही लिखा एवं पढ़ा जाता है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दी लेखन में रोमन की तुलना में देवनागरी की स्वीकार्यता प्राथमिक एवं सामाजिक स्तर पर बहुत ज्यादा रही है ! परन्तु आज के तकनीकी विकास की रफ़्तार ने लेखन की दिशा में देवनागरी को को मात दे दिया है ! आज की पीढ़ी में जब कलम की जगह की-बोर्ड की प्रासंगिकता ज्यादा बढ़ रही है और चिट्ठी-पत्री का जगह मोबाइल मैसेजों ने ले लिया है तो लेखनी का स्वरुप बदलना भी स्वाभाविक है ! तकनीक के सहारे संचार को तीव्र रफ़्तार देने में लिपि बाधक ना बने इसलिए आज की पीढ़ी ने देवनागरी और रोमन के संघर्षों से मुक्त सहूलियत का रास्ता अख्तियार करना मुनासिब समझा ! परिणामत: आज तकनीक के अत्याधुनिक माध्यमों से होने वाले तमाम संचार रोमन की राह पकड़ कर चल रहे हैं ! पश्चिम देशों से आयात की हुई इस तकनीक में पाश्चात्य का पारंपरिक स्वाद दिखना स्वाभाविक है अत: लेखनी के लिए रोमन को जितना सहज बनाया गया है देवनागरी उतनी ही दुष्कर प्रतीत होती है ! तकनीक के सहारे लेखन करने के लिए आपको रोमन आसानी से उपलब्ध है जबकि मूल देवनागरी समझना थोड़ा मुश्किल हो चुका है ! की-बोर्ड के माध्यम से देवनागरी लिखने में इसलिए भी कठिनाई है कि एक मानक स्तर का कोई भी की-बोर्ड रोमन लिपि के लिए ज्यादा सहज और सरल बनाया जाता है !तकनीक के माध्यम से लेखन करने एवं तीव्र संचार सम्प्रेषण की चाह ने आधुनिक पीढ़ी को रोमन के प्रति ज्यादा आकृष्ट किया है और बहुसंख्यक लोगों द्वारा रोमन में हिन्दी लेखन को आसानी से स्वीकार भी किया जा चुका है ! हालाकि इसी तकनीक ने देवनागरी को भी सहज बनाने के उद्देश्य से तमाम रोमन से देवनागरी रूपांतरण के तकनीक भी उपलब्ध कराये हैं, जिसकी मदद से हम रोमन में लिखकर उसका आसानी से देवनागरी रूपांतरण प्राप्त कर सकते हैं ! लेकिन लिपि के अस्तित्व के दृष्टिकोण से देवनागरी लेखन के लिए उपयुक्त हो रही यह रूपांतरण प्रक्रिया बहुत घातक सिद्ध हो रही है ! मूल देवनागरी के संरचना के हिसाब से अगर इस रूपांतरण तकनीक को देखें तो इसमे लिखते समय हम शब्द संरचना रोमन में ही करते हैं लेकिन उसका परिणाम हमको देवनागरी में प्राप्त होता है जिसे कि किसी भी नजरिये से परिशुद्ध देवनागरी नही कहा जा सकता ! इस तकनीक के माध्यम से शब्द संरचना का देवनागरी व्याकरण नष्ट होने का खतरा है बेशक हम छणिक तौर पर देवनागरी लिख पाने में सफल हो रहे हों ! इस तरह की तकनीक का विकास भी देवनागरी में हिन्दी लेखन को कमजोर ही करता है ना कि इससे देवनागरी की मूल संरचना का विकास या प्रसार हो रहा है !
      आज जब तकनीक की सम्पन्नता के दौर में रोमन लिपि में हिन्दी लेखन की सहजता प्रतिष्ठित हो रही है तो निश्चित तौर पर इस बात पर विचार करने का समय आ गया है कि हिन्दी को सबसे करीब से कौन सी लिपि प्रस्तुत करने में सक्षम है ?हमें इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है कि  क्या हिन्दी को रोमन के सहारे भी उतने ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है जितना देवनागरी में संभव है ? सवाल यह भी है कि रोमन के बढते वर्चस्व से हिन्दी के मूल व्याकरण को तो कोई खतरा नहीं है ? क्या शब्द संरचना एवं उच्चारण की स्पष्टता को रोमन लिपि में भी उतने ही पारदर्शीता के साथ लिखा एवं पढ़ा जा सकता है जितना देवनागरी लिपि में संभव है ? और सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि इस बात से भला कैसे आश्वस्त हो लिया जाय कि रोमन में लिखे जाने मात्र से हिन्दी को वैश्विक मंच पर एक भाषा का मुकाम मिल सकता है ? क्योंकि इस बात से बिलकुल इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रचार प्रसार के अन्धुत्साह में रोमन का हाथ थाम कर भागती हुई  हिन्दी विश्व मंच पर मात्र बोली की तरह स्वीकार्य ना हो जाय बजाय भाषा बनने के ! हमें रोमन की रफ़्तार से सम्हलते हुए इस विषय पर पुनर्विचार करना जरूरी है एवं मूल देवनागरी एवं देवनागरी में फर्क को समझने की जरुरत है !
शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

     

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