शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

लोक अभिव्यक्ति के नए मंच और तंत्र का डर : अप्रकाशित लेख


                                      

                                    सशक्त संचार सम्प्रेषण ही मीडिया की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भागीदारी को पुख्ता करता है एवं उसे चौथा खम्भा होने का गौरव भी प्रदान करता है !जन और तंत्र के अभिव्यक्ति का मंच अगर मीडिया है तो दोनों के सूचना आदान-प्रदान का माध्यम भी मीडिया ही है ! नुक्कड़ से लेकर बड़े चैनलों और अब वेब माध्यम तक मीडिया के अनेकों मंच सामने आये हैं ! समय,व्यवस्था,तकनीक एवं अर्थव्यवस्था के विकास के साथ-साथ मीडिया के प्रारूप और मंच में बदलाव भी अवश्यम्भावी था ! मीडिया के शैशव अवस्था में जब प्रिंट मीडिया ने आज़ादी से पूर्व खुद को जन अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में खडा करना शुरू किया उस दौरान भी ब्रिटिश सरकार द्वारा इसे दबाने का प्रयास किया गया था ! तत्कालीन मीडिया के सन्दर्भ में गौर करने वाली बात यह कि तत्कालीन मीडिया का आधार अर्थ निहित नही वरन विचार एवं उद्देश्य निहित था जिसमे जनमानष को आंदोलित करने की एक प्रबल इच्छा शक्ति थी ! विचारणीय तथ्य यह भी है कि तत्कालीन मीडिया का मंच महज़ सूचना सम्प्रेषण  तक सिमित नही था वरन जनसंघर्ष की बुनियाद को मजबूत करने हेतु संकल्पित थी ! सत्ता से संघर्ष के लिए खड़े किये मीडिया मंच की सफलता का प्रमाण यही है कि तत्कालीन सरकार द्वारा उसे दबाने का निरंतर प्रयास होता रहा है ! मीडिया के दुसरे दौर में जब देश आज़ादी के यौवन की अंगडाई ले रहा था तभी मीडिया ने अपने मंच में बदलाव के संकेत भी तकनीकी रूप से दिए ! शायद ईलेक्ट्रोनिक मीडिया का जन्म इसी का नतीज़ा है ! आज़ादी के बाद एक स्वस्थ लोकतंत्र के निर्माण में मीडिया की सशक्त भूमिका को जन और तंत्र दोनों द्वारा स्वीकार किया गया ! सूचना सम्प्रेषण एवं अभिव्यक्ति के मंच को ध्यान में रखते हुए सरकार ने मीडिया के क्षेत्र में एक पहल दूरदर्शन और अन्य राष्ट्रीय चैनलों को जारी करके की ! हालाकि बाद में बदलते परिवेश के साथ मीडिया में निजी निवेशक भी सामने आये जिससे मीडिया का चयनात्मक एवं बहुविकल्पीय दौर चल पडा ! नीजी निवेशकों की इसी प्रतिसप्र्धा को आज हम "कार्पोरेट मीडिया" का नाम दिया जा रहा है ! हालाकि यह मीडिया के सन्दर्भ में आलोचनात्मक विषय भी रह है !
                                                मीडिया शारांश के इतिहास को अगर देखें तो एक बात साफ़ तौर  पर परिलक्षित  होती है कि हमेशा से जन और तंत्र दोनों द्वारा अपने अभिव्यक्ति को बुलंद करने के लिए मीडिया का इस्तेमाल होता रहा है ! यानी मीडिया का एक दौर वह भी आया जब वह जन और तंत्र की जरुरत बन कर सामने आयी ! इसी दौर में पेड न्यूज जैसे कुप्रथा ने जन्म लिया मीडिया का दुरपयोग का एक रास्ता खुल गया ! पेड न्यूज के बूते समूचे तंत्र और कार्पोरेट द्वारा मीडिया का इस्तेमाल हाल ही कुछ सालों में अधिकता से खुल कर आया ! मीडिया के इसी भटकाव के कारण जन असंतोष की भावना मीडिया के प्रति बलवती होने लगी और जनतंत्र का जन अपने स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए नए विकल्पों की तलाश में हाथ पाँव चलाने लगा ! जनता के इसी प्रयास के परिणाम स्वरुप आम जनता का एक प्रबुद्ध तबका वेब मीडिया का सहारा लेने चुका था ! प्रिंट मीडिया के सीमित पेपर स्पेस और ईलेक्ट्रोनिक मीडिया के समय सीमा के काउंट डाउन के दायरे में जकडे प्रबुद्ध आम जनमानष  को मानो वेब मीडिया के रूप में कोई अलाद्दीन का चिराग मिल गया हो ! अभिव्यक्ति  का ऐसा स्वतंत्र एवं वैश्विक मंच मीडिया  के इतिहास में एक क्रान्ति के तौर प़र माना जा सकता है !पिछले  लगभग दो सालों में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का स्वतंत्र उपयोग वेब मीडिया के आधुनिक मंचों से व्यापक तौर पर हो रहा है ! वेब मीडिया से आम जनता के जुडाव एवं विमर्शों में हो रहे गुणात्मक प्रसार ने विश्व कि तमाम देशों की सरकारों को इस न्यू मीडिया पर पुनर्विचार करने को मजबूर कर दिया ! अमेरिका से लगाए भारत सहित तमाम देश आज वेब मीडिया के प्रभाव से खुद की राजनीतिक एवं सामाजिक संरचना को प्रभावित महसूस कर रहे हैं  ! वेब मीडिया के माध्यम से जन विमर्शों का प्रभाव भारतीय राजनीतिक क्षेत्र में भी सं २०१० से पड़ना शुरू हो गया था !न्यू मीडिया कि इस क्रान्ति का ही परिणाम है कि सं २०११ का पूरा साल आंदोलनों के नाम रहा और वर्तमान सरकार को जनता के विरोध का दंश झेलना पडा ! न्यू मीडिया के व्यापक प्रभाव को देखते हुए भारत सहित  दुनिया के तमाम सत्ताधारी समूह  वेब मीडिया पर नकेल कसने की कवायदें शुरू कर चुके हैं ! तकनिउकी रूप से सबसे ज्यादा संपन्न अमेरिका इन सबमे अगर अग्रिम पंक्ति में खडा हुआ तो दूसरी मुहीम भारतीय राजनायिको की तरफ सी शुरू कर दी गयी है ! सन २०११ में बहुचर्चित एवं सबसे ज्यादा प्रभावी   रहे  अन्ना  आन्दोलन का श्रेय भी कहीं ना कहीं वेब मीडिया के नए उपक्रमों फेसबुक ,ट्विटर जैसे सोसल साइट्स एवं वेब पोर्टल्स को जाता है ! "इंडिया अगेंस्ट करप्शन " के फेसबुक समूह पर  दस लाख लोगों की सक्रिय भागीदारी किसी भी सत्ता को वेब मीडिया के प्रभाव एवं परिणाम पर सोचने को मजबूर कर सकती है ! आज के दौर में जब तमाम वेब पोर्टल्स के जरिये आम आदमी को स्वतंत्र अभिव्यक्ति के बेवाक  मंच उपलब्ध हो रहे हैं और विचारों  के साथ विमर्श के उचित विकल्प उपलब्ध हो रहे हैं तो कहीं ना कहीं जनता के  सत्ता से सीधा संचार में नजदीकियों कि संभावना अधिक होती जा रही है, जो शायद एकांत सत्तावादी  राजनयिकों के चिंता का शबब जरुर हो सकता है ! आज सत्ता पक्ष लामबंध होकर यह सोचने पर विवश है कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की इस बेलगाम होती कड़ी पर कैसे नियंत्रण पाया जाय ! परम्परागत रूप से भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में लोक और तंत्र के बीच इतना सपाट एवं स्पष्ट कम्युनिकेशन पहले कभी नही देखा गया जहाँ जनता सत्ता में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करती हो ! मगर ऐसा होना लोकतंत्र को और परिशुद्ध बनाता है  लेकिन भारतीय तंत्र ऐसे  कार्य पद्धति में किअभी सहज नही रहा है और आज ऐसा होने पर असहज महसूस कर रहा है ! उनके लिए यह अभिव्यक्ति एकांत सत्तावाद में खलल डालने जैसी ही है ! शायद इसी वज़ह से तंत्र द्वारा वेब मीडिया पर नियंत्रण के कुछ वैकल्पिक हथकंडे अपनाए जा रहे हैं ! चुकीं इस पर सीधा प्रतिबन्ध लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रतिकूल है अत: वेब मीडिया पर प्रतिबन्ध अथवा नियंत्रण बनाने के लिए तंत्र द्वारा साम्प्रदायिकता एवं अश्लीलता जैसे तर्क प्रस्तुत किये जा रहे हैं ! आज सबसे बड़ा सवाल यह है  जिन तर्कों की आड़ में सरकार अभिव्यक्ति के इस जनमंच पर लगाम लगाने की वकालत कर रही है क्या वास्तविक  रूप से सरकार  की मंशा और नियत अश्लीलता एवं साम्प्रदायिकता निहित ही हैं,या इसके कुछ एकांत सत्तावादी सोच भी है ? अश्लीलता का हवाला देकर अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने की बात करने वाली सरकार सनी लियोन को सरे आम प्रचारित प्रसारित करने वाले मसाले पर चुप क्यों हैं ? सनी लियोन के नाम के पूर्व प्रयुक्त होने वाले विशेषण पोर्न स्टार से क्या पोर्न को कम प्रचार मिला , आखिर सरकार यहाँ अश्लीलता के प्रति चिंतित क्यों नही नज़र आई ? जबकि इस सनिलियों का भारतीय सिनेमा में महिमा मंडन किया जा रहा है ! साम्प्रदायिकता के नाम पर राजनीति करके सत्ता का लाभ लेने वालों के प्रति सरकार के मौन  का क्या कारण है ? चर्चा यहाँ तक है कि कहीं अश्लीलता और साम्प्रदायिकता के नाम पर वेब मीडिया को नियंत्रित अथवा प्रतिबंधित करने का सियासी चाल  तो  नही चली जा रही ? ऐसे तमाम सवाल हैं जो सरकार की नियत को शक के दायरे में लाने के लिए काफी हैं !
खैर बावजूद इन सबके इतना तो लगभग तय है कि वेब मीडिया के बढ़ाते प्रसार एवं सत्ता में जनता की प्रत्यक्ष विमर्श को भारतीय राजनयिक अभी पचा नही पा रहे और इसी लिए मीडिया के इस जन मंच को भी अश्लीलता  एवं सम्पर्दायिकता  के तर्क के आधार पर  अपने नियंत्रण लेने का प्रयास कर रहें हैं ! इन तर्कों का यथार्थ में व्याप्त अश्लीलता एवं साम्प्रदायिकता से कुछ ख़ास सम्बन्ध नही है ये जनाभिव्यक्ति को दबाने की सत्तावादी चाल मात्र है !

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