(अमर उजाला में प्रकाशित)
9/11की दसवीं बरसी पर आयोजित श्रद्धांजली सभा में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का भाषण समूचे विश्व ने सुना ! आतंकवाद के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति ओबामा के संवाद में कहीं ना कहीं आत्मविश्वास से ओत-प्रोत राष्ट्रवाद कि झलक दिखाई दे रही थी ! वह एक ऐसा संवोधन था जो राष्ट्रीय जनमानस को संतुष्ट करने और आतंकवाद के प्रति अपना दृष्टिकोण विश्व पटल पर स्पष्ट करने के लिए दिया गया था !जिस स्पष्टवादिता से उस शक्तिशाली प्रशासक ने अपनी बात रखी उस स्पष्टवादिता का भारतीय राजनयिकों में सदा से अभाव सा रहा है ! ओबामा को वो संभाषण ना केवल सिर्फ आतंकवादियों बल्कि समूचे विश्व के लिए एक सन्देश के तौर पर देखा जा सकता है ! आज के दस साल पहले 9/11कि उस क्रूर वारदात ने महज़ हज़ारों कि जान ही नहीं ली वरन विश्वपटल पर आतंकवाद कि नई परिभाषाएं भी गढ़ीं ! 9/11के बाद विश्व समाज यह सोचने पर विवश था कि क्या आतंकवाद कि यह कालिमा इतनी वैश्विक एवं मजबूत हो गयी है कि आज एक ध्रुवीय विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति भी इसके आतंक से महफूज़ नहीं है ? विश्व कि यह चिंता तत्कालीन परिवेश के मद्देनजर स्वाभाविक थी !अमेरिकी क्षमता एवं एवं आतंकवाद जैसे मुद्दों के प्रति अमेरिकी निश्चिंतता पर यह महज़ एक हमला ही नहीं वरन एक ज्वलंत एवं मुह चिढाता सवाल बन कर उभरा ,जिसका तत्कालीन जवाब ढूढना अमेरिका के लिए अनिवार्य बन गया ! हालांकि ऐसा भी नहीं है कि वो दुनिया कि पहली आतंकी वारदात थी या वह आतंक का शैशव काल था !उसी दौर में भारत एवं अन्य एशियाई देशों में आतंकवाद अपने यौवनकाल का नंगा नाच कर रहा था ! लेकिन यह "आतंकवाद" शब्द अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी देशों को ज्यादा प्रासंगिक एवं चिंताजनक तब नज़र आया जब 9/11को पेंटागन को ध्वस्त करके आतंकवाद ने "भयवाद" की नीव रखी और शायद तभी आतंकवाद के प्रति सिर्फ चिंता नहीं वरन भय कि स्थिति को भी देखा गया ! आज जब ११ सिप्ताम्बर के उस निर्मम वारदात को हुए दस हाल हो गए फिर भी अमेरिकी आवाम उस दुर्दांत कृत्य को भुला नही पाया है ! आज भी लोग उस घटना को याद करते हुए ग्राउंड जीरो पर श्रद्धांजली देने प्रत्येक वर्ष आते हैं ! इसी स्मृति अवसर पर आतंकवाद कि उस क्रूर स्मृति ग्राउंड जीरो से अपने राष्ट्र का हौसला बढाते हुए अमेरिकी लोकतंत्र के दो प्रमुख दल डेमोक्रेटिक एवं रिपब्लिक कंधा से कंधा ,स्वर से स्वर मिलाते हुए एक मंच पर खड़े नज़र आये ! भारतीय लोकतंत्र ऐसे नाज़ुक दौर में भी ऐसे दृश्यों के लिए चिरकाल से तरसता रहा है ! ग्राउंड जीरो से सभा एवं राष्ट्र को संबोधित करते हुए दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्रप्रमुख ने जब कहा कि "ओसामा को मारकर हमने 9/11का प्रतिशोध लिया है " तब अमेरिकी राष्ट्रपति का यह संबोधन पुरी अमेरिका में आत्मविश्वास की लहर दौडाने के लिए एक उम्दा एवं राष्ट्रवादी बयान था जो कि भारतीय राजनयिकों के जुबान पर कभी फिसलता भी नहीं है !
अमेरिकी राजनयिकों का यह आत्मविश्वास ही है कि 9/11की वारदात अमेरिकी इतिहास के किसी पन्ने पर अपनी अंशमात्र पुनरावृत्ति भी नही कर सकी ! आज अमेरिका में उस एकमात्र वारदात की एकमात्र बरसी साल में परम्परागत तौर पर इसलिए आयोजित होती है क्योंकि अमेरिका ने पुनरावृत्ति कि सभी संभावनाओं पर पूर्ण विराम लगा दिया है ! इसके प्रतिकूल अगर भारत में ऐसी परम्परा का आगाज़ हो तो शायद हर शहर ग्राउंड जीरो होगा और लगभग हर रोज़ एक बरसी होगी !हालांकि बावजूद इन सबके इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता कि आतंकवाद के सबसे कुख्यात और दुर्दांत बेटे ओसामा का पिता भी वही है जिसने उसका विध्वंस किया ! यह वही ओसामा था जो कभी अमेरिकी सहयोग से एक लड़ाके के तौर पर इस्तेमाल किया गया था ,मगर जैसे उसने अपने पंजे उस वटवृक्ष के जड़ों पर मारने शुरू किये जिसने उसको जन्म दिया था , उसका विध्वंस भी किया गया !
इन सभी तथ्यों के बीच अगर आतंकवाद पर भारतीय रुख एवं भारत पर आतंकवाद के रुख की विवेचना करें तो तमाम तथ्य ऐसे परिलक्षित होंगे जो जो आतंकवाद के प्रति भारत के लचर एवं अदुरदर्शी रुख को स्पष्ट करते हैं !भारत में अगर आतंकवाद के पैठ एवं पहुच को समझने का प्रयास करें तो एक दृश्य ऐसा भी दिखता है जहां देश की सबसे बड़ी पंचायत "संसद-भवन" भी सुरक्षित नज़र नहीं आती ! हमलों और वारदातों को गिनना अब आसान नही रहा जबकि दिन प्रति-दिन दिल्ली,मुम्बई जैसे महानगरों में बम पटाकों की तरह फुट रहे हैं और निर्दोष मारे जा रहे हैं! लेकिन इन सबके बाद जवाबी तौर पर हमारी कार्यवाही महज़ "कड़ी निंदा" ,भर्त्सना और चंद मुआवजों तक सिमित होकर रह जाती है ! हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट में हुए हमले ने तो हमारे जवाबदेह राजनयिकों के आतंकवाद के प्रति असंवेदनशीलता का बड़ा ही हास्यपद एवं लापरवाह रुख स्पष्ट किया है ! हमारे राजनयिकों द्वारा हाल ही में दिए गए कुछ बयानों ने तो राष्ट्रीय आत्मविश्वास कि धज्जियां उड़ाने में उत्प्रेरक का काम किया है ! वारदात के तुरंत बाद जिस तरह से निंदा और भर्त्सना के रटे रटाये आलाप बजते हैं वो देश को क्या सन्देश देंगे इसकी चिंता किसी को नही ? किसी के जान की कीमत मुआवजे से चुकाना हमारे नेताओं का अचूक हथियार बन चुका है !घटना के बाद राष्ट्र कि आतंरिक सुरखा के प्रति जवाबदेह एक मंत्री का बयान आता है कि" इन घटनाओं के लिए राज्य कि पुलिस जिम्मेदार है ,वाराणसी विस्फोट कि जांच वाराबसी पुलिस कर रही है !" आतंरिक सुरक्षा के प्रति जवाबदेह एक मंत्री का यह बयान कहाँ से मजबूत एवं आत्मविश्वास से भरा प्रतीत होता है ? जवाब में दिल्ली पुलिस का बयान आता है कि " जहां विस्फोट हुआ वो क्षेत्र दिल्ली पुलिस के दायरे में नहीं आता है" इसका मतलब घटना स्थल कि सुरक्षा भगवान भरोसे थी ! वारदात से पहले भारत के भावी प्रधानमंत्री के रूप में तैयार किये जाने वाले एक नेता का बयान था कि "हम शत प्रतिशत हमलो को नहीं रोक सकते " इस बयान से आप भावी भारत के लिए कैसी आशा रखते हैं ? वहीँ विपक्ष बड़ी सफाई से अपने दौर में हुए आतंकी वारदातों पर पर्दा डालते हुए सत्ता पर दोषारोपण कर राजनीतिक लाभ लेने में अक्सर नज़र आ जाता है ! ऐसे में भला राष्ट्र को लेकर एक मंच कि गुंजाइश कैसे की जा सकती है ?
ऐसे ना जाने कितने तथ्य ऐसे हैं जो आतंकवाद के प्रति भारतीय राजनीतिक दृष्टिकोण के लचीलेपन एवं असंवेदनशीलता से पर्दा हटाते हैं ! हम आतंकवाद जैसी वैश्विक समस्या को भी राजनीतिक हथियार बनाने से बाज नहीं आ रहे ! जहां एक तरफ अपने एकमात्र आतंकवादी हमले से सबक लेते हुए अमेरिका अपने दुश्मन को मारकर अपनी जनता को प्रतिशोध का तौफा देता है वहीँ हम आतंकवादीयों को सरकारी खर्चे पर वकील मुहैया कराते हैं ! यह बात समझ से परे है कि एक आतंकवादी का पक्ष भी सुना जाना इतना अनिवार्य है ? संविधान के प्रयोग पर बोलते हुए डा. अम्बेडकर ने कहा था " कितना भी बुरा संविधान अगर अच्छे लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है तो वह अच्छा ही करेगा और कितना भी अच्छा संविधान बुरे लोगों के हाथ लगा तो परिणाम बुरे ही होंगे" आज अम्बेडकर का यह कथन सर्वथा सत्य प्रतीत होता है कि कमी संवैधानिक प्रारूप की नहीं बल्कि हमारे अदुर्दार्शिता एवं राष्ट्र के प्रति निष्ठा में है ! आज इस कानूनी प्रारूप में आतंकवादी महफूज हैं और परिणामत: जनता को खामियाजा भुगतना पढ़ रहा है ! हम आजतक आतंकवाद को लेकर को सर्वसम्मति से से परिणाम की तरफ जाने वाला मार्ग ही नहीं तलाश पाए, कोई निति निर्माण ही नहीं कर पाए जिसका नतीजा आज हमारे सामने है ! हम सिफ गिन रहे हैं और वो आतंक का नंगा तांडव एक के बाद एक करते जा रहे हैं !
शिवानन्द द्विवेदी "सहर"

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