शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

गांधी और टैगोर के वैचारिक संघर्ष की प्रासंगिकता : 2 अक्टूबर 2011 को अमर उजाला में प्रकाशित



(प्रकाशित अमर उजाला)
                       
                बचपन से आज तक जितना गांधी को पढ़ता या सुनता आया हूँ उतना टैगोर को पढ़ने का अवसर  नहीं मिल सका ! पिछले कुछ महीनो में सौभाग्य से राष्ट्रवाद एवं अन्तर्राष्ट्रवाद पर अध्यन का विशेष अवसर मिला जिसने मेरा ध्यान टैगोर के वैश्विक विचारों एवं चिन्तन कि तरफ आकृष्ट किया है ! तमाम बिन्दुओं पर मैंने पाया कि " गांधी की विचारधारा जितनी राष्ट्रवादी थी टैगोर उतने ही अन्तर्राष्ट्रवाद के समर्थक थे " ! हालांकि इसका मतलब यह कतई नही है कि टैगोर में देशप्रेम नहीं था या गांधी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाकारात्मक विचार रखते थे ! ऐसा कहीं नहीं दिखता कि गांधी में वैश्विक चिंतन का अभाव था ! एक फ्रांसीसी समाचार से बातचीत में गांधी ने कहा था कि "माई नेशनलिज्म इंटेस इंटरनेशनलिज्म " इस सन्दर्भ में गांधी का यह कहना कि उनके राष्ट्रवाद में ही गहरा अन्तर्राष्ट्रवाद है , कहीं ना कहीं आज भी प्रासंगिक प्रतीत होता है !  तो वहीँ दूसरी तरफ महान कवि टैगोर अपने अंतर्मन में  पाश्चात्य आदर्शों के साथ साथ राष्ट्रीय संस्कारों  का सुन्दर समायोजन रखते थे ! वो राष्ट्र के सन्दर्भ में सकारात्मक थे मगर राष्ट्रवाद पर हमेशा चिन्तित नज़र आये ! गौर करने वाली बात यह है कि यहाँ "राष्ट्र और राष्ट्रवाद " को दो अलग अलग तरीके से परिभाषित किया गया है ! यहाँ राष्ट्र अगर अन्तराष्ट्रीय इंकाई है तो राष्ट्रवाद एक अन्तर्राष्ट्रवाद विरोधी सोच ! टैगोर का मानना था कि "राष्ट्रवाद से प्रतिस्पर्धा कि भावना उत्पन्न होती है और प्रतिस्पर्धा संघर्ष का मूल कारण है "! इस सन्दर्भ में गुरुदेव टैगोर के यह विचार कहीं ना कहीं समाज को  स्थूलता से सूक्ष्मता कि तरफ जाते हैं, जो प्रासंगिक हैं !भारत भूमि कि इन दो महान विभूतियों के विचारों में इन मतभेदों के साथ -साथ सबसे बड़ी समानता यह थी कि दोनों ही चिन्तक प्रधानत: राजनीतिक विचारक नहीं थे ! गांधी एक अध्यात्मिक महापुरुष थे, जो कर्म,धर्म,मानव-मात्र में अगाध विश्वास रखते थे तो वहीँ टैगोर एक महान कवि, साहित्यकार , दार्शनिक एवं वैश्विक चिन्तक थे ! अगर गांधी के क्रिया-कलापों में तत्कालीन राष्ट्रीय जनमानस को पढ़ने कि ललक थी तो वहीँ यह महान कवि विश्व दर्शन, वैश्विक मानवता को एक सूत्र में सजोने का विचार रखता था ! यहाँ दोनों के बीच एक और समानता यह देखने को मिलती है कि "दोनों मनुष्य मात्र में विश्वास रखते थे अथवा मानव प्रेमी थे !" टैगोर का समस्त विदेश भ्रमण मानव केन्द्रित रहा और वे अन्य संस्कृतियों के मानवो से प्रभावित रहे !
                                                अगर सिद्धांतो के आधार पर गाँधी के स्वराज का विश्लेषण करें तो स्वराज को लेकर इस महात्मा कि सोच अत्यंत स्पष्ट थी ! गांधी स्वराज को सर्वोपरि मानते थे ! गांधी का स्वराज सिर्फ जनता और सत्ता तक सीमित  नही था बल्कि गांधी के स्वराज के वृहद् मायने थे ! गांधी का स्वराज भाषा, साहित्य, संस्कृति एवं समाज सबके लिए था ! गाँधी भाषा , संस्कृति के संरक्षण पर बल देते थे और इसी कारण उनका हिंदी प्रेम उन्हें घोर राष्ट्रवादी बनाता है ! गांधी ने हिंदी के संरक्षण पर बल दिया और इसके लिए उन्हें कई बार आलोचना भी झेलनी पडी थी ! वास्तव में गुलामी के दौर में एक समय ऐसा भी आया जब हमारी भाषा, साहित्य और संस्कृति को अंग्रेजों द्वारा निशाना बनाया जा रहा था जो कि गांधी के अनुसार राष्ट्र एवं समाज के निर्माण में बाधक था ! गांधी को इस बात कि चिंता थी कि कहीं हिंदी पर अंग्रेजी का ऐसा वर्चस्व ना हो जाय कि हिन्दुस्तान में हिंदी को अपने अस्तित्व के लिए ही संघर्ष   करना पड़े ! एक राष्ट्रवादी के लिए यह चिता स्वाभाविक थी ! सन 1921 को एक पत्रिका को दिए अपने लेख में गांधी ने लिखा था कि "महान समाज सुधारक राजा राम मोहन राय और बेहतर समाज सुधारक होते अगर वो अपने विचारों को प्रकट करने का माध्यम हिंदी रखे होते !भारतीय समाज में यह अंधविश्वास घर कर रहा है कि आज़ादी के विचारों को अपनाने के लिए अंग्रेजी अपनाना अनिवार्य है" ! ऐसी सोच को गाँधी अदृश्य गुलामी के नज़रिए से देखते थे और उनका मानना था कि ऐसी विचारधारा के साथ कोई पूर्ण स्वतंत्र नहीं हो सकता है ! गांधी के दिए इस लेख से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय  धरोहरों के प्रति उनकी चिंता ही उन्हें राष्ट्रवादी बनाती  है ! गांधी कि यह सोच एवं अभिधारणा ही गांधी के स्वराज को व्यापक बनाती है ! हालांकि गाँधी द्वारा  राजा राममोहन राय कि आलोचना में बोले गए स्वर से टैगोर काफी निराश हुए ! एक पत्र के माध्यम से इस आलोचना का जवाब देते हुए टैगोर ने लिखा " राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारक के लिए गांधी का ऐसा मानना अतिवाद है ! कई भाषाओं के ज्ञान कि वज़ह से राममोहन राय समाज के विभिन्न समुदायों , संवर्गों,क्षेत्रों,तक अपना सन्देश देने में सफल रहे हैं! राजा राममोहन राय का भारतीय ज्ञान अगाध है मगर पाश्चात्य के प्रति भी उनकी निष्ठा स्वीकारणीय  हैं!"टैगोर के इस पत्र से यह स्पष्ट होता है कि टैगोर मानवता को "भाषा और परम्परा " कि बेड़ियों में नहीं रखना चाहते थे ! वो ऐसी स्वतन्त्रता चाहते थे जहाँ कुछ भी अपना-पराया  नहीं हो बल्कि सब कुछ अपना ही हो और समूचा विश्व एक देश और एक परम्परा का निर्माता हो !टैगोर के इन शब्दों ने काफी हद तक गांधी को भी प्रभावित्र किया ! टैगोर के कथनों पर सफाई देते हुए गांधी ने कहा " मै भी आज़ाद हवा में उतना ही विश्वास रखता हूँ जितना यह महान कवि ! मै अपने घर के चारो तरफ बंद दीवारें और खिड़कियाँ नहीं चाहता ! मै समस्त संस्कृतियों का अपने  आँगन में स्वागत करता हूँ मगर यह कभी नहीं स्वीकार करता कि कोई मेरे ही पाँव उखाड़ दे !"
                                                            गांधी का यह  कथन इस बात का प्रमाण है कि गांधी अंतर्राष्ट्रीय सामंजस्य और एकता में निष्ठा तो रखते थे लेकिन इसके लिए राष्ट्र का बलिदान उन्हें कभी स्वीकार्य नहीं था ! वो राष्ट्र के अस्तित्व में अंतर्राष्ट्रीयता को तलाशने में यकीन रखते थे ! राष्ट्र के प्रति उनकी यही घोर समर्पण उन्हें अन्तर्राष्ट्रवाद से दूर ले जाता है ! गांधी के इन विचारों पर टैगोर कभी संतुष्ट नहीं दिखे ! टैगोर गांधी के असहयोग आन्दोलन के प्रति भी निराशा का भाव रखते थे !असहयोग को टैगोर मानवीय एकता में बाधक एवं एक ऐसा आन्दोलन मानते थे जो राष्ट्रवाद कि बुनियाद तैयार कर रहा था !  टैगोर कि मानवीय एकता में अगाध आस्था थी और वे राष्ट्र के दीवारों को तोड़ कर समूचे विश्व को एक सूत्र में पिरोने को मानवता के लिए सबसे उत्तम मार्ग मानते थे ! अपने एक लेख में टैगोर ने कहा "पश्चिम देशों में भ्रमण के दौरान मै तमाम  ऐसे लोगों से मिला जो इंसान कि एकता में विश्वास रखते हैं और राष्ट्रवाद कि सीमा को तोड़ कर समूचे विश्व को एक समाज एवं देश की तरह स्वीकार  करने की इच्छा रखते हैं !  अपने यूरोप भ्रमण से आने के बाद टैगोर ने  गांधी जी के आह्वान पर चल रहे असहयोग आन्दोलन पर काफी निराशा व्यक्त करते हुए कटाक्ष किया ! उन्होंने कहा " जब तमाम विश्व समुदाय मानवीय एकता को राष्ट्रीयता  के दायरे से बाहर निकाल कर वैश्विक मंच तलाशने में जुटा है तब हम असहयोग जैसे निराधार आंदोलनों से स्वराज कि नींव रखने के लिए लड़ रहे है ,जिसका अंत सिर्फ संघर्ष तक सिमित है !"टैगोर कि यह प्रतिक्रया उनके वैश्विक चिंतन को स्पष्ट करने के लिए काफी है ! वो मानव को राष्ट्र कि सीमाओं में बंधा कोई जीव मात्र नहीं बल्कि समूची धरती को मिला एक वरदान मानते है ! टैगोर का मानना यह था कि अगर हम इस धरती पर आये हैं तो धरती के प्रति  हमारा दायित्व किसी राष्ट्र नामक सीमामें नहीं बंधा  होना चाहिए बल्कि हमारा समर्पण  समूची धरती के प्रति  निहित होना चाहिए !असहयोग  पर टैगोर के इन तर्कों पर स्पष्टीकरण देते  हुए महात्मा गांधी ने कहा " हमारा असहयोग अंग्रेज़ प्रशासन कि शर्तों पर  है ! हम कहते हैं आप आओ और हमारा सहयोग करो यह सर्व समाज के लिए अच्छा है !भारतीय राष्ट्रवाद आक्रामक नहीं अहिंसावादी है,इसमे विनाश  नहीं जन एकता कि संभावना है ,यह मानवतावादी है ! दुनिया के लिए मरने कि इच्छा का हम स्वागत करते हैं मगर इसके लिए हमें स्वत: जीना पडेगा !  बिल्ली के जबड़े में फसे चूहे के बलिदान का कोई महत्त्व नही होता !इन तमाम वाद-विवाद एवं वैचारिक संघर्षों के बावजूद आज भी राष्ट्रवाद एवं अन्तर्राष्ट्रवाद पर बहस जारी है !
                         भारतीय इतिहास के दो महान विचारक जिस बहस का आगाज़ किये वो आज भी उतना ही प्रासंगिक एवं विचारणीय है जितना कल के  उस दौर में था ! आज जब हमारे बीच सत्य,अहिंसा ,मानवता के पुजारी महात्मा गाँधी महज़ एक शब्द विशेष नहीं बल्कि एक सिद्धांत विशेष के तौर पर मौजूद हैं ,जिसकी समय और स्थिति के अनुसार व्याख्या होती रहीहै  , के हर विचार आज भी  प्रासंगिक हैं! वहीँ अपनी कलमकारी से नोबेल पुरस्कार सम्मानित महान कवि,चिन्तक ,दार्शनिक गुरुदेव श्री रविन्द्र नाथ टैगोर का वैश्विक मंच पर मानवता का मूल्य निर्धारण करने वाला सार्वभौमिक विचार आज भी विचारणीय है ! आज जब यह  दुनिया तमाम प्राकृतिक एवं मानवीय आपदाओं कि उथल पुथल के दौर से गुजर रही है कहीं ना कहीं गांधी और टैगोर पर पुन: विमर्श ज्यादा प्रासंगिक प्रतीत होता है ! आज राष्ट्र और विश्व के बीच चल रहे इस संघर्ष को एक नया आयाम देने कि जरुरत है ! क्या राष्ट्र विश्व कि इंकाई है या राष्ट्र विश्व के लिए खतरा है ? क्या राष्ट्र से आगे बढ़कर विश्व में ही मानवीय एकता को तलाशने कि जरुरत है या राष्ट्र में ही मानवीय विकास कि संभावना है? क्या अद्वितीय विश्व का निर्माण ही मानव समाज को संघर्ष से सौहार्द कि तरफ ले जाने में सक्षम है या राष्ट्र कि अभिधारणा में ही विश्व कि संकल्पना है ? क्या एकल मानव  समाज से ही शांति कि स्थापना है ?इन तमाम प्रश्नों के साथ गांधी को महात्मा कहने वाले टैगोर एवं टैगोर को गुरुदेव कहने वाले महात्मा गाँधी के मतभेद प्रासंगिक है और विश्व पटल पर विचारणीय हैं !

शिवानन्द द्विवेदी "सहर"

                                                

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