सरकार की कोशिशों और घटकों के सहयोग से खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश विधेयक को दोनों सदनों से पास करा लिया गया ! एफ.डी.आइ पास होने के बाद अब खुदरा व्यापार में वालमार्ट के सीधे निवेश की सारी अडचनों को विराम लग गया है !खुदरा व्यापार के क्षेत्र में जिस वालमार्ट की अगुवानी करने को सरकार सालों से बेताब दिख रही थी उस वालमार्ट का आना भी अब तय हो चुका है ! वालमार्ट के भारत में निवेश करने से होने वाले फायदों की जो फेहरिश्त सरकार द्वारा दिखाई जाती रही है उसमें किसानो और बेरोजगारों को होने वाले फायदे के साथ-साथ आर्थिक सुधार की जरूरतों को प्रमुखता से रखा गया हैं ! एफ.डी.आइ और वालमार्ट के आने से होने वाले फायदों को बताने के लिए सरकार द्वारा गढे गए तमाम कसीदों को संदर्भ में रख कर अगर समझने का प्रयास किया जाय तो हमें सबसे पहले वालमार्ट के निवेश की मूल धारणा एवं उद्देश्यों को समझना होगा ! इतना तो तय है कि वालमार्ट का खुदरा व्यापार के क्षेत्र में भारत में निवेश करना पूर्णतया व्यवसायिक है, और ऐसा भी नहीं है कि वालमार्ट द्वारा भारत में ये कोई पहला निवेश किया जाना है या इसके पहले वालमार्ट ने भारत में काम नहीं किया है ! हा, प्रत्यक्ष तौर पर सीधा निवेश का रास्ता साफ़ ना होने की वजह से आज के पहले वालमार्ट जैसी कम्पनियाँ भारत में साझेदार के रूप में निवेश करती रही हैं ! अभी हाल ही के साल में पंजाब में भारती समूह के साथ साझीदारी में इसी वालमार्ट ने किसानो के साथ एक करार किया जिसमे किसानो को तमाम लुभावने सपने दिखाए गए ! इस करार के तहत किसानो द्वारा उत्पादित बेबीकार्न(शिशु मक्का) को कंपनी द्वारा करार में निर्धारित मूल्यों पर खरीदे जाने का प्रावधान रखा गया था ! इस करार में ऐसा कहा गया कि किसानो द्वारा उत्पादन किये गए बेबोकॉर्न को वालमार्ट द्वारा आठ रुपया प्रतिकिलो के दर से खरीद लिया जायेगा ! वालमार्ट के साथ हुए इस करार में किसानो को अच्छा मुनाफा होने की संभावना नजर आयी और उन्होंने इस करार के तहत भारी मात्रा में बेबीकार्न उत्पादन का काम शुरू किया ! उत्पादन के बाद तय करार के अनुसार वालमार्ट-भारती द्वारा उनके उत्पादों को करार में तय आठ रुपये प्रति किलो की दर से खरीद लिया गया ! वालमार्ट-भारती द्वारा किसानो से आठ रुपये की दर से खरीदे गए बेबीकार्न को पंजाब के ही शहरों में १०० रुपये प्रति किग्रा की दर से बेचकर भारी मुनाफे कमाया जा रहा है जबकि किसानो के हाथ मुनाफे के नाम पर २ से ३ रुपये प्रति किग्रा हाथ लग पाया रहा है !
पंजाब के किसानो के साथ हुए इस करार और इसके परिणामों को आधारभूत मानकर अगर खुदरा व्यापार में वालमार्ट के आने से किसानो को होने वाले फायदों की संभावना को तलाशा जा रहा तो ऐसा कतई नहीं लगता कि मुनाफे के उद्देश्यों से बाजार को हथियाने की भागमभाग में दौड़ रहीं ये विदेशी कम्पनियाँ भारतीय किसानो के हितों के अनुकूल कही से भी काम करेंगी ! एक कंपनी अगर किसानो से खरीदे गए उत्पादों को खरीद मूल्य से दस गुनी कीमत पर उसी बाजार को बेचती है तो कहीं ना कहीं सवाल कंपनी की नीयत और देश की बहुसंख्यक आम जनता के के हितों में उसकी भूमिका पर उठना लाजिमी है ! वालमार्ट जैसी कंपनी का अगर कुल कारोबार देखें तो भारतीय खुदरा बाजार के स्थानीय निवेशकों की हालात तुलनात्मक रूप से बहुत ही नाजुक प्रतीत होती है ! किसी भी नजरिये से ऐसा नहीं प्रतीत होता कि लगभग ५०० अरब डॉलर प्रति वर्ष का कारोबार करने वाली वालमार्ट से हमारे स्थानीय खुदरा निवेशक मुकाबला कर पायेंगे ! वालमार्ट के विश्व स्तरीय आधारभूत संरचना पर अगर नजर डाले तो इस कंपनी का खुदरा व्यापार के क्षेत्र में दुनिया के १५ देशों में लगभग साढे आठ हजार बड़े स्टोर्स हैं जबकि भारत के थोक व्यापार में भारती समूह के साथ भी इस कंपनी का निवेश है जो बेस्ट प्राइस के नाम से चल रहा है !
भारतीय कारपोरेट जगत के निवेशको से अगर वालमार्ट के बाजार की तुलना की जाय तो भी वालमार्ट की पहुँच को पकडना दूर की कौड़ी साबित होता दिख रहा है ! भारतीय बाजार के सर्वोच्च दस मुनाफा कमाने वाली कंपनियों का कुल मुनाफा भी वालमार्ट के कुल मुनाफे के सामने कहीं ठहरता नहीं दिख रहा ! ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारतीय कम्पनियाँ वालमार्ट से प्रतिस्पर्धा कर पाने में अधिक दिनों तक सक्षम रह पाएंगी ? इस संदर्भ में इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि प्रतिस्पर्धा में असंतुलन की स्थिति से बाजार में वालमार्ट के वर्चस्व की स्थिति ना उत्पन्न होने लगे ! भारत में खुदरा बाजार का कुल कारोबार भी वालमार्ट के अकेले के कारोबार से कम है ! अत: इस बात से बिलकुल इनकार नहीं किया जा सकता कि वालमार्ट अगर भारत में निवेश करेगा तो अपनी पूँजी को मुनाफे में बदलने के सारे हथकंडे आजमाने की तैयारी के साथ आएगा ! हाल ही में भारत में निवेश करने से पहले लाबिंग के नाम पर वालमार्ट द्वारा दिये गए १२५ करोंड़ के खर्च के ब्योर को अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए ! लाबिंग के नाम पर खर्च किये गए इस बड़ी धनराशि से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में वालमार्ट द्वारा किस स्तर तक बाजार में उतरने का प्रयास किया जा सकता है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि बाजार फतह करने की होड़ में वालमार्ट जैसी कम्पनियाँ निश्चित तौर पर स्थानीय खुदरा व्यापारियों के लिए मुसीबत का सबब बन सकती है ! वर्तमान में भारतीय खुदरा बाजार में लगभग डेढ़ करोंड़ के आस-पास निवेशक है और इनका कुल निवेश ३५० अरब डॉलर का है ! ५०० अरब डॉलर का अकेले कारोबार करने वाली वालमार्ट का बाजार अकेले भारत के कुल खुदरा बाजार से बड़ा नजर आता है ऐसे में भारत का असंगठित खुदरा बाजार वालमार्ट के मुकाबले टिक पायेगा ,ऐसा मुश्किल ही लगता है !
बाजार,अर्थवयवस्था और आम जनता के नजरिये से अगर वालमार्ट के खुदरा क्षेत्र में निवेश को समझने का प्रयास किया जाय तो तमाम ऐसे तथ्य निकाल कर सामने आते हैं,जो कि आम किसान अथवा छोटे निवेशकों के लिए चिंताजनक प्रतीत होते ! सबसे पहला तथ्य ये है कि बेशक हम वालमार्ट के निवेश में भारतीय अर्थव्यवस्था के बेहतरी की संभावनाओं को तलाश रहे हैं लेकिन खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को इस नजरिये से भी देखना होगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि एक समय ऐसा आ जाए कि समूचा खुदरा बाजार वालमार्ट के इर्द-गिर्द चक्कर काटता नजर आये और खुदरा बाजार पर वालमार्ट का एकक्षत्र राज्य कायम हो जाय ! किसी भी बाजार पर किसी निवेशक की संप्रभुता का कायम हो जाना बाजार को जनविरोधी बना देता है और जनता बाजार से त्रस्त होने लगती है ! बेशक वालमार्ट अत्यन्त छोटे शहरों या निचले दुकानदारों को तुरंत प्रभावित ना करे लेकिन ऐसा भी नहीं है एक समय बाद जब वालमार्ट का बाजार पर वर्चस्व कायम हो जायेगा तो इससे निचले स्तर के खुदरा व्यापारी हुए बिना रह पायेंगे ! साथ ही इस सच्चाई को तो सरकार नहीं नकार सकती कि हमारे बड़े शहरों में भी गरीबी और बेघरी जैसी समस्याएं आज भी कायम हैं ! ऐसे में अगर दिल्ली जैसे शहरों में भी खुदरा व्यापार के क्षेत्र में वालमार्ट का वर्चस्व कायम हो जाय और अन्य निवेशक बाजार से बाहर हो जाय तो गरीब तबके से आने वाले बहुसंख्यक समुदाय का क्या होगा ? अंतर्राष्ट्रीय बाजार के आंकड़ों के ग्राफ पर बेशक हम वालमार्ट जैसी विदेशी कंपनियों के सहारे कीर्तमान रचते नजर आयें लेकिन देश के वर्तमान आंतरिक हालात के नजरिये से तो ये बिलकुल उचित नहीं प्रतीत होता है ! वालमार्ट का बाजारवादी वर्चस्व बेशक देश के अल्पसंख्यक उच्च वर्ग के लिए फायदे का सौदा नजर आ रहा हो लेकिन देश का बहुसंख्यक मध्यम एवं निम्न वर्ग तो इस बाजारवादी वर्चस्व के कारण हाशिए पर ही जाता नजर आ रहा है ! चाहे वो पंजाब का किसान हो या यू.पी ,बिहार का बेरोजगार !!
शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

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