प्रकाशित अमर उजाला
देश का भविष्य हमारे नौनिहालों के वर्तमान से तय होने कि बातें अक्सर मंचो से सुनने को मिलती रहती हैं लेकिन उन नौनिहालों का बचपन कितना महफूज़ है इसके आकड़ें कहीं ना कहीं गुमनाम कब्रों में दफ़न से हैं !! बुनियादी तौर पर हमारे देश के बच्चों का बचपन पूरी तरह से महफूज़ है और भविष्य निर्माण में फल फुल रहा है ,ऐसा कहना या सोचना हमारे समाज और तंत्र कि कोरी भूल के सिवा कुछ भी नही है !हाल ही में आई नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक़ कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि हमारे देश में बचपन सुरक्षित नही है ! एन.सी.बी की रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले तीन सालों में एक लाख चौरासी हज़ार बच्चे लापता हुए हैं जबकि तीस हज़ार के आस-पास बच्चे अगवा किये गए हैं ! अगर इन आकंड़ो को थोड़ी गहराई से देखे तो यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आती है कि साल दर साल इन आकंड़ो के ग्राफ स्तर में इजाफा ही हुआ है ! बाल तस्करी का यह उठता ग्राफ यह दिखाता है कि हम अपने नौनिहालों के साथ हो रहे इन अपराधों के प्रति किस कदर लापरवाह एवं संवेदन हीन होते जा रहे हैं ! आज जब सरकार द्वारा बच्चों के हित को ध्यान में रखकर बाल श्रम अधिनियम और शिक्षा का अधिकार जैसा क़ानून लाया जा रहा है,वहीँ तो इन आंकड़ो के आधार पर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वाकई इन कानूनों को लागू करने एवं इसके क्रियान्वयन को लेकर हमारी सरकार के पास कोई ठोस नीति है या ये सारे क़ानून महज़ बचपन बचाओ के नाम पर खानापूर्ति मात्र हैं ? क्योंकि जैसे जैसे ये क़ानून हम लाते जा रहे हैं लागातार अपराध में इजाफा ही होता जा रहा है ! इस रिपोर्ट के अनुसार जो 96 हज़ार बच्चे प्रत्येक साल लापता हो रहे हैं क्या उन बच्चो को श्रम करने पर मजबूर नहीं किया जाता होगा या क्या वो शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं हैं ? इसी क्रम में यह सवाल भी प्रमुख रूप से उठता है कि बड़ी तादाद में लापता हो रहे इन बच्चों को बाल तसकरों द्वारा किस-किस तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है और उसका समाज पर कैसा प्रभाव पड़ रहा है ? बाल तस्करी के परदे के पीछे किन-किन अपराधों का नंगा नाच इन माफिययों द्वारा किया जा रहा है ? ये वो सवाल हैं जो बाल विकास से समबन्धित हवा हवाई योजनाओ की पोल खोलते हैं !
बाल तस्करी के पीछे लगे इन माफियाओं द्वारा अगवा किये गए अथवा लापता बच्चो को अलग-अलग स्तर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है ! लापता बच्चों में से एक बड़ा हिस्सा दूर प्रदेशों अथवा विदेशों में बाल-श्रम की तरफ धकेल दिया जाता है एवं इन मासूमो के बचपन का गला घोंट दिया जाता है ! ऐसा कतई नही है कि ये घटनाएँ सिर्फ पिछड़े इलाकों में ही देखने को मिलती हैं बल्कि इस तरह की घटनाओ में शोषित वर्ग का एक बड़ा हिस्सा आपको दिल्ली.मुम्बई जैसे बड़े शहरों में गुमनाम रूप से मिल जाएगा ! बाल-श्रम क़ानून के नाम पर सरकार को मूह चिढा रही इन घटनाओ की हद तो तब हो जाती है जब किसी थाने या सरकारी दफ्तर की चाय कोई "छोटू" पहुचाता है ! बाल-श्रम के अलावा इन मासूमो के यौन शोषण कि घटनाए भी इसी बाल तस्करी के काले कारनामे का हिस्सा है ! इस तथ्य से बिलकुल नकारा नहीं जा सकता कि प्रत्येक साल लाखों की संख्या में हो रहे इन वारदातों में गायब हो रहे बच्चों को यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है और इसके बाद इन्ही नौनिहालों को तमाम छोटी बड़ी अपराधिक प्रवृतियों में धकेल दिया जाता है ! नशाखोरी,चोरी आदि के क्षेत्र में नए एवं कम उम्र के बच्चों कि संलिप्तता इसका एक उदहारण भी है ! माफियाओं द्वारा तमाम अपराधों के लिए प्रशिक्षित किये जा रहे इन बच्चों के बचपन का गला घोंट कर उन्हें इस अपराध की दुनिया के लिए तैयार किया जाता रहा है ! बाल तस्करी के दंश के शिकार इन बच्चों कि हत्याएं भी निजी स्वार्थ में करके इनके शरीर के अंगों की खरीद फरोख्त का कारोबार यहीं से शुरू होता है ! आये दिन जगह-जगह से मिल रहे नर कंकालों को इन वारदातों से जोड़कर देखा जा सकता है और कहीं ना कहीं इसके तार इन बाल तस्करी से जुडी वारदातों से ही जुड़े होते हैं ! बाल मजदूरी ,यौन शोषण ,बाल अपराध एवं बाल हत्या का यह नंगा तांडव इन बाल तसकरों द्वार बेख़ौफ़ होकर किया जाता रह है ! प्रत्येक साल लाखों कि संख्या में ना जाने कितने मासूम इस कारनामे की भेंट चढ़ अपने बचपन को का दम तोड़ रहें हैं ,ना जाने कितनी माताओं की गोद सुनी कर ये बाल-तसकरी से जुड़े माफिया अपनी जेबें गरम कर रहे हैं और बजाय इसको रोकने के हमारा तंत्र बाल-श्रम और शिक्षा का अधिकार जैसे विज्ञापनों पर खुश होकर अपनी पीठ थप-थपा रहा है ! समाज में फैली इस समस्या को ना तो कभी राजनीतिक स्तर पर उठाया जात है और ना ही कभी इस पर संसद में कोई बहस दिखती है ! यूँ कहें तो हमारे भविष्य के कर्णधारों के वर्तमान से जुडा यह मुद्दा कभी हमारे राजनीतिक रहनुमाओं के स्तर पर गंभीर बन ही नही पाया है !
उपरोक्त घटनाओं परे लगाम कसने के लिए समय समय पर खानापूर्ति मात्र के कुछ शिगूफे जरुर सरकारों द्वारा छोड़े जाते रहें हैं ! सं २०१० में केंद्र द्वारा राज्यों एवं संघ शाशित प्रदेशों को भेजी गयी एक एडवाइजरी में इस तरह के बढ़ाते अपराधों को रोकने एवं इस पर जागरूकता कार्यक्रम चलने की बात की गयी थी ,लेकिन बात, बात तक रह गयी उसका कुछ ख़ास परिणाम नहीं निकल कर आया और आगे के सालों में इन घटनाओं में लागातार इजाफा होता रह ! फिर इस साल सं २०१२ में केंद्र ने अपनी बात को पुन: दोहराते हुए राज्यों एवं संघ शासित प्रदेशों को दुबारा एडवाइजरी भेज इस पर लगाम लगाने एवं लापता बच्चों का पता लगाने के लिए ठोस कदम उठाने के निर्देश दियें है ! लेकिन फिलहाल तो केंद्र और राज्य के बीच चल रहे इस खाना पूर्ती के नूरा कुश्ती में कहीं ना कहीं मासूमो का बचपन हाशिये पर लटका दिख रह है !यहाँ बात बड़ी स्पाष्ट सी है कि किसी भी समस्या के निवारण का अर्थ यह कतई नही हो सकता कि हम उस समस्या से समबन्धित एक क़ानून बना दें ! बल्कि ज्यादा जरुरत इस बात पर बल देने की है कि वह क़ानून किस हद तक अपने उद्देश्यों में सफल हो पा रह है और उस क़ानून में क्या खामिया हैं जो उसके क्रियान्वयन में बाधक बन रही है ? किसी भी क़ानून के पारदर्शिता एवं जवाबदेही का भी प्रावधान भी अवश्य होना चाहिए और उस क़ानून को अमली जामा पहने कि मजबूत इच्छा शक्ति भी होना नितांत आवश्यक है , जो कि हमारे तंत्र में कम ही अवसरों पर दिखता है ! आज बाल-श्रम से लेकर बाल तसकरी तक की घटनाएँ इतनी आम होती जा रही हैं कि हमारे कानूनों कि स्थिति ढाक के तीन पात से ज्यादा कहीं नही ठहरती ! आंकड़े बताते हैं कि अब तक चालीस हज़ार के आस पास के लापता बच्चों की कोई जानकारी जुटाने तक में हमारा प्रशाशन सक्षम नही हो पाया है और सिर्फ साठ हज़ार बच्चों के लापता होने का मामला दर्ज हो पाया है ! बाल तस्करी का यह प्रसार गाँव गाँव ,गली गली तक बेख़ौफ़ होकर पहुच रह है और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं तो वहीँ दुसरे तरफ मासूमो का बचपन दम तोड़ रह है !
बच्चों के बचपन से सीधी सरोकार रखने वाली इस समस्या में लागातार नाकामयाब हो रहे हमारे प्रशासनिक ढाँचे को इस पर गंभीर होने की जरुँरत है ! बाल तस्करी जैसे जघन्य अपराध के खिलाफ हमारे तंत्र को नींद से जाग कर कुछ सख्त कदम उठाने एवं अपनी जवाबदेही तय करने की जरुरत है ! बच्चों का बचपन छीनने वाले इन माफियाओं तक पहुचने एवं उन्हें दण्डित करने के कड़े प्रावधान बनकर उन्हें सख्ती से लागू करने को लेकर हमारे तंत्र को सजग होने की जरुरत है ! अगर हम जल्द ही इस समस्या के प्रति गंभीर नही हुए तो शायद आने वाले दिनों में हमारे बच्चों का भविष्य खतरे में होगा और इन माफियाओं का हौसला दिन-प्रतिदिन और बुलंद होता जाएगा ,जो समाज एवं राष्ट्र दोनों के लिए घातक है ! हमें अपने नौनिहालों एवं देश के भावी कर्णधारों का बचपन बचाने के लिए आगे आना ही होगा !!!
शिवानन्द द्विवेदी "सहर"
saharkavi111@gmail.com
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