शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

एफ डी आइ का दिखावटी विरोध : दैनिक जागरण में प्रकाशित





एफ.डी.आइ को लेकर संसद के शीतकालीन सत्र में चल रही गहमा-गहमी आखिरकार सत्ता पक्ष की जीत और विपक्ष की हार के साथ खतम हुई ! एफ.डी.आइ के पक्ष में पड़े २५३ वोटों के मुकाबले एफ.डी.आइ के विरोध में पड़े २१८ सांसदों का समर्थन इस विधेयक की मंजूरी को रोक पाने में कामयाब नहीं हो सका ! राजनीतिक भाषा में अगर कहा जाय तो एफ.डी.आइ के मसले पर सरकार अपने संख्याबल को साबित करने में कामयाब रही ! हालाकि इस पुरे मामले में महीनो से चल रही नूराकुश्ती में वोटिंग के बाद कई सियासी चेहरे बेनकाब होते भी नजर आये हैं ! वोटिंग के बाद दोहरे चरित्र का नकाब उन सियासी पहरेदारों के चेहरे से भी उतरा है जो कल तक एफ.डी.आइ के विरोध में सड़क से संसद तक ताल ठोकते नजर आ रहे थे और इसे किसान विरोधी,जन- विरोधी और जाने क्या क्या बताते नहीं अघा रहे थे ! लोकसभा में नियम १८४ के तहत हुई चर्चा में ऐसा अंदेशा पहले से ही लगाया जा रहा था कि सरकार लोकसभा में इस बिल को  पास कराने में कामयाब हो जायेगी ! क्योंकि सरकार बिना अंदरूनी गठजोड़ और सियासी प्रबंधन किये नियम १८४ के तहत चर्चा को कभी नहीं स्वीकार करती ! संसद के निचले सदन में जो भी हुआ वो काफी हद तक पूर्वनियोजित था और सबकुछ सरकार द्वारा प्रबंधित किया गया था ! अब जब लोकसभा में एफ.डी.आइ पास हो चुका है तो इसके जनहितैषी होने या जनविरोधी होने पर बहस करने की बजाय बहस इस बात पर होनी चाहिए कि एफ.डी.आइ के मसले पर किस दल का चरित्र किस रूप में उभर कर सामने आया है ? आज बहस संख्याबल और आंकड़ों की भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि आंकड़ों की गणित को सरकार किस तरह मैनेज कर लेती है यह  जग जाहिर हो चुका है ! अगर आप भूले नहीं हो  तो ये वही मुलायम सिंह यादव हैं जो कुछ ही महीनो पहले एफ.डी.आइ के विरोध में बी.जे.पी के भारत बंद में साथ खड़े नजर आये तो वही संसद में बहस के प्रथम दिन अपने भाषण में एफ.डी.आइ को किसान विरोधी एवं जन विरोधी बताते हुए सरकार से वापस लेने की अपील करते दिखाई दिये ! लेकिन सियासत में गिरगिट से भी तेज रंग बदलने की परम्परा में नई कड़ी जोडते हुए मुलायम सिंह यादव एवं उनकी समाजवादी पार्टी ने जिस तरह से लोकसभा से बायकाट किया वो उनके दोहरे चरित्र की सियासत को जनता के सामने बेनकाब करने के लिए पर्याप्त है ! मुलायम सिंह यादव द्वारा  लोकसभा से बायकाट करने की  वजह जनता की बीच  चाहे जो भी बताई जाय लेकिन उनको इतना तो समझना ही होगा कि देश की जनता अब अंकगणित के मामले में इतनी कमजोर भी नहीं कि उनके बायकाट का मतलब ना समझ पाए ! बेशक समाजवादी पार्टी ने एफ.डी.आइ के पक्ष में वोट नहीं दिया लेकिन इसको किसी भी दृष्टिकोण से  एफ.डी.आइ का  विरोध कहना बेमानी लगता है ! मुलायम सिंह यादव द्वारा संख्याबल के निगेटिव मार्किंग की ऐसी सियासी चाल चली गयी कि सरकार अपने मंसूबे में कामयाब भी रही और मुलायम विरोध करते हुए भी सरकार के लिए फायदेमंद साबित हुए ! हालाकि इस रंग बदलने की सियासत में सी.बी.आइ फैक्टर को  एक अहम कारण के रूप में देखा जा सकता है, साथ ही इसमें मुलायम सिंह यादव के भावी सियासी गठजोड़ के गुणाभाग को भी नकारा नहीं जा सकता ! मुलायम को यह बखूबी पता है कि सरकार के खिलाफ जाने पर सी.बी.आइ का जिन्न मुह बाए निगलने को तैयार बैठा है तो वहीँ भविष्य में उनकी कोई भी सियासी महत्वाकांक्षा बिना कांग्रेस के समर्थन के पूरी होती नहीं दिख रही ! सी.बी.आइ का डर और सियासत में स्वार्थसिद्धि की महत्वाकांक्षा ने इस धरती पुत्र को लोकसभा से बायकाट करने पर मजबूर कर दिया ! बेशक एफ.डी.आइ बिल लोकसभा में पास हो गया हो लेकिन साथ ही साथ मुलायम सिंह यादव एवं उनकी पार्टी के दोहरे चरित्र की राजनीति का एक कुरूप चेहरा भी जनता के सामने उभर कर आ चुका है ,बेशक समाजवादी पार्टी अपने बचाव में कोई भी दलील दे !
जैसी स्थति मुलायम सिंह यादव की रही कमोबेश कुछ वैसी ही स्थिति बसपा सुप्रीमो मायावती की भी रही ! यू.पी में एक दूसरे की रीतियों-नीतियों के धुर विरोध की सियासत करने वाली दो प्रमुख पार्टियां किस तरह केन्द्र में समान नीति अख्तियार करते हुए अपना रंग बदलती हैं और आर-पार की लड़ाई से मुह मोड़कर सदन से बायकाट करती हैं, स्वार्थ की सियासत का यह समझौता आज देश की जनता के सामने साफ़ हो चुका  है ! संसद में प्रथम दिन की बहस में बसपा सांसदों द्वारा भी एफ.डी.आइ के विरोध में खूब जन हितैषी कसीदे पढ़े गए थे लेकिन एन मौके पर जब उस विरोध को अमली जामा पहनाने की बारी आइ तो ये सारे जन सरोकारी नेता और उनकी पार्टिया बंगले झाकती नजर आईं ! चुकि मायावती पर सी.बी.आइ फैक्टर का दबाव होने के साथ-साथ यू.पी में विपक्ष में होने का दबाव भी है अत: उनके पास सरकार के खिलाफ जाने का कोई औचित्य ही नहीं बनता ! अपनी सियासी सुरक्षा को पुख्ता करते हुए बसपा ने अपने भाषणों से पलटते हुए सरकार को अप्रत्यक्ष मदद करने का समझौता कर लिया ! और सबकुछ वैसा ही हुआ जैसा पहले से तय था !
इस पुरे प्रकरण में ना तो कहीं मुलायम के अंदर समाजवाद ही दिखता है और ना ही मायावती के सियासत में दलित-पिछडों के प्रतिनिधित्व की झलक दिखाई देती है ! समाजवाद की विचारधारा को ताक पर रख कर अगर मुलायम ने खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का अप्रत्यक्ष समर्थन किया है तो वहीँ मायावती ने कांशीराम के सपनों को तार-तार करने का काम किया है ! सवाल यह भी उठेगा कि एफ.डी.आइ आने से  दलितों का क्या भला होगा,जिनकी  हिमायत करना मायावती की राजनीति का प्रमुख एजेंडा है ?
      हालाकि विपक्ष ने अपने विरोध का धर्म निभाते हुए अंतिम समय तक विरोध को कायम रखा, बेशक किसी जमाने में वो इसके पक्षधर रहे हों ! एफ.डी.आइ के  विरोध में पड़े २१८ मतों को बेशक लोकतांत्रिक पद्धति में हार का नाम दिया जाता हो लेकिन आवाम के राजनीतिक रुख के नजरिये से इन मतों को फिजूल समझना राजनीतिक नजरिये से किसी के लिए भी भारी भूल होगी  ! मायावती और मुलायम के बायकाट करने से ये २१८ मत सरकार पर भारी पड़ सकते हैं क्योंकि इसमें सरकार द्वारा सी,बी,आइ के दुरुपयोग करने का सवाल उठना लाजिमी है ! मुलायम और मायावती के बायकाट को अगर  एफ.डी.आई के विरोध के नजरिये से देखा जाय तो सदन में एफ.डी.आई विधेयक कहीं से भी पास होता नहीं नजर आ रहा, लेकिन ऐसा मानना महज राजनीति का एक व्यवहारिक दृष्टिकोण हो सकता है ना कि सैद्धांतिक पक्ष ! कुछ भी हो संसद में एफ.डी.आइ पर हुए वोटिंग ने देश के तमाम दलों के चेहरे एवं चरित्र से पर्दा उठाने का काम किया है और जनता को सदन के पटल से एक संदेश दिया है कि किस प्रकार उनके प्रतिनिधी  चुने जाने के बाद उनके मतों का दुरपयोग अपने निजी स्वार्थ और महत्वाकाक्षा को साधने के लिए करते हैं ! एफ.डी.आइ पर वोटिंग से कई चेहरे बेनकाब हुए तो वही सरकार द्वारा सी,बी,आई के दुरपयोग की कलई एक बार और खुल कर सामने आई ! खैर, निचले सदन की नूराकुश्ती के बाद अब देखना होगा कि ये नेतागन उच्च  सदन में क्या गुल खिलाते हैं क्योंकि वहाँ सरकार अल्पमत में हैं !!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें