लिंगगत विविधताओं एवं विशेषताओं के आधार पर दुनिया को दो हिस्सों में बांटकर स्त्री-पुरुष विमर्शों को समय-समय पर अलग-अलग तरीकों से समझने का प्रयास किया जाता रहा है ! अधिकाँशत: पुरुष प्रधान सामाजिक संरचनाओं में स्त्री के आधी दुनिया के प्रतिनधित्व का हवाला देकर अक्सर उसके सशक्ती करण एवं सहभागिता के विमर्श को भी आगे बढ़ाया जाता रहा है ! लेकिन विमर्श के इस कड़ी में लिंगगत अवधारणाओ पर सामाजिक रूप से दो ध्रुवों में बटी इस दुनिया में लिंगगत बंटवारे के बीच की बारीक लकीर पर गुमनाम बस रही एक बीच की दुनिया को ज्यादातर संघर्षो के तमाम विमर्शो से दूर ही रखा गया है !अगर बहस और विमर्श लिंगगत विभेदों के आधार पर किया जाता है तो शायद स्त्री-पुरुष के लिंगगत बंटवारे के बीच बस रही इस दुनिया को विमर्श की मुख्याधारा में न लाना बेमानी होगा ! जनसँख्या एवं लिंगगत भेद के आधार पर किसी भी एक वर्ग को आधी दुनिया और दूसरे वर्ग को शेष आधी दुनिया मान लेना कहीं से न्याय पूर्ण एवं प्रासंगिक नहीं प्रतीत होता है ! भारत के संदर्भ में अगर इस लिंगगत विभेद को समझने का प्रयास किया जाय तो आज भारत में स्त्री और पुरुष के साथ-साथ किन्नरों की संख्या लाखों में है ! एक किन्नर संगठन द्वारा सन १९८० में कराये गए एक सर्वे के अनुसार उस समय भारत में किन्नरों की संख्या चार लाख से भी ज्यादा बताई गयी थी जो की सामाजिक रूप से एक बड़ी संख्या कही जा सकती है !सन २००० के आसपास किन्नरों की संख्या चार लाख से बढकर बारह लाख तक पहुच गयी और इसमें प्रत्येक साल लगभग पैंतीस से चालीस हजार की बढोत्तरी होती रही है ! ऐसे में स्त्री-पुरुष विमर्श को समाज अथवा दुनिया के संदर्भ में आधा-आधा बाँट देना इन किन्नरों के मूल अधिकारों एवं इनकी संख्यागत उपस्थिति के साथ अन्याय होगा ! सामाजिक सहभागिता की मुख्यधारा से अलग रखकर किन्नरों को लिंगगत तौर पर विकलांग घोषित करना कहीं से भी तर्कसंगत या न्याय पूर्ण नहीं प्रतीत होता ! आज दुनिया अथवा भारतीय समाज में भारी संख्या में सहभागी किन्नरों को समाज की मुख्यधारा से न जोड़कर उनको उपेक्षा अथवा हेय दृष्टि से देखना हमारे वर्तमान के मुख्यधारा के समाज पर तमाम सवाल उठाता है !आज अगर किन्नरों के बुनियादी समस्यायों को देखे तो तमाम ऐसे सवाल हैं जो ये दिखाते है कि कहीं न कहीं किन्नरों के प्रति सामाजिक एवं संवैधानिक रूप से दोहरा रवैया अपनाया जाता रहा है ! इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि भारतीय लोकतंत्र में आजादी के लगभग पैतालीस साल बाद तक किन्नरों को मतप्रयोग का अधिकार नहीं था और उनको लोकतांत्रिक रूप से सत्ता में हिस्सेदारी नहीं प्राप्त थी जो कि किन्नरों के प्रति संवैधानिक संवेद्नहीनता का एक बड़ा उदाहरण माना जा सकता है ! हालाकि इस दिशा में किन्नरों के सामाजिक सहभागिता और उनको समाज का तीसरा वर्ग मानने की दिशा में एक कदम बढाते हुए सन १९९६ में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषन द्वारा किन्नरों को मत प्रयोग करने एवं अपना प्रतिनिधी चुनने का अधिकार दिया गया जो कि किन्नर समाज के लिए एक बहुत बड़ा फैसला था !इस फैसले के परिणाम स्वरुप किन्नरों के लिए राजनीतिक रूप से तमाम रास्ते खुले और उनमे राजनीतिक चेतना भी जागृत हुई ! आज कई जगहों पर नगर निगम पार्षद ,विधायक आदि के चुनावों में किन्नर समाज अपने प्रतिनिधी खड़ा करने लगा है ! स्त्री-पुरुष समाज की तरह किन्नर समाज को भी सभी मूल अधिकार प्राप्त हैं लेकिन बावजूद इसके आज भी किन्नरों को समाज में वह स्थान नहीं प्राप्त हो पा रहा है जिससे कि उनको समाज के मुख्यधारा में शामिल एक सामान्य आदमी माना जा सके !आज भी किन्नर समाज शिक्षा,रोजागर के सामान अवसर,नौकरी आदि के लिए सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं हो पाए हैं ! किन्नरों को लेकर समाज में व्याप्त वो अश्लील चित्रवृत्त आज भी कायम है और आज भी उनको नाचने गाने से मनोरंजन करने का जरिया माना जाता है ! अपने लैंगिक वर्चस्व को कायम रखने के लिए समाज का बहुसंख्यक वर्ग कहीं न कहीं किन्नर समाज को मुख्यधारा में लाने का पक्षधर नहीं रहा है और इसी कारण बालपन में ही किन्नर बच्चे को किन्नर समाज द्वारा लिया जाता है और उसे अपने दिनचर्या के अनुकूल प्रशिक्षित किया जाता है ! रोजगार आदि में किन्नरों की भूमिका सुनिश्चित नहीं होने की वजह से उनके सामने रोजी-रोटी का एक बड़ा संकट होता है और इसकी पूर्ति के लिए किन्नरों द्वारा तमाम ऐसे हथकंडे भी अपनाये जाते हैं जो सामाजिक मान्यताओं के अनुकूल नहीं हैं! हालाकि इन मान्यताओं को भी प्रश्रय देने का काम इसी दो ध्रुवीय समाज का है ! बसों गाड़ियों ,सामूहिक जगहों आदि पर जाकर लोगों से पैसे लेने के अलावा इन किन्नरों के पास कोई चारा नहीं है और इसके लिए किन्नरों को किसी भी हद तक उतरने पर मजबूर होना पड़ता है ! आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिए पर धकेला जा चुका किन्नर समाज आज हम सबके बीच रहते हुए एक तीसरे दुनिया के रूप में अलग थलग पड़ा जीवन यापन करने को मजबूर है ! किन्नर समाज को लेकर अभी तक ना तो सामाजिक रूप से और ना ही राजनीतिक रूप से ही कुछ विशेष किये जाने का प्रयास बहुत ज्यादा हद तक हो पाया है !आज तक सरकारी दस्तावेजों में लिंग पुष्टिकरण को लेकर सिर्फ स्त्री-पुरुष की दो ही मान्यताओं को माना जा रहा है और इन दस्तावेजों में किन्नरों की भूमिका गौण है ! वर्तमान में प्रगतिशीलता और आधुनिकता का मंच बनते सोशल मीडिया साइट्स पर भी समाज की इस तीसरे वर्ग को मान्यता नहीं दी जा रही ! अगर आप गौर करें तो फेसबुक आदि में लिंग चयन में सिर्फ दो ही विकल्प दिए जा रहे हैं या तो स्त्री या पुरुष !इसका मतलब यही निकलता है कि खुद को आधुनिक मान्यताओं के प्रति सजग मानने वाला हाईटेक समाज भी दुनिया के सर्व सम्मति से मान्यता प्राप्त स्त्री-पुरुष के बीच की इस बारीक उपस्थिति को समझने का प्रयास नहीं कर रहा है !
आज समाज के इस उपेक्षित वर्ग को समाज की मुख्यधारा में जोडने की जरूरत है और समाज की तमाम सुविधाओं और संसाधनों में इनकी भी भागीदारी सुनिश्चित करने की जरुरत है ! हमें इस बात को समझना चाहिए कि जिस तरह एक स्त्री की अलग शारीरिक संरचना है और एक पुरुष की अलग संरचना है उसी तरह एक किन्नर भी अपने तरह की अलग शारीरिक संरचना में जी रहा है और उसकी शारीरिक संरचना को विकलांगता का नाम नहीं दिया जा सकता ! आज सरकार और प्रशासन को संवैधानिक रूप से समाज के इस उपेक्षित वर्ग के प्रति गंभीर होने की जरूरत है और इनको समाज की मुख्यधारा से जोडने के उपायों के क्रियान्वयन पर बल देने की जरूरत है ! शेष दो वर्गों की तरह इनको भी समाज में सामान अधिकारों से जीवन यापन का अधिकार है जिस पर की संवैधानिक और प्रशानिक रूप से ठोस पहल करने की जरूरत है ! बेशक समाज का यह वर्ग समाज में प्रजनन और समाज सृजन में सक्षम नहीं है लेकिन ये वो पर्याप्त कारण नहीं हैं जिनका हवाला देकर किन्नरों को उनके अधिकारों से वंचित रखा जाय ! इनके रोजगार ,शिक्षा आदि को भी सुनिश्चित करना संवैधानिक दायित्व है !किन्नर भी स्त्री पुरुष की तरह ही हमारे बीच का एक वर्ग है और उसकी भी अपनी काबिलियत हो सकती है अत:हमें उसे भी समाज के मुख्य धारा से जोडने के लिए प्रयास करना चाहिए !
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