सोमवार, 5 अगस्त 2013

निलंबन के बहाने तुष्टिकरण की राजनीति : यह लेख अखबारों की नजर से



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर 


गौतमबुद्ध नगर जिला स्थिति ग्रेटर नोएडा में बतौर उप जिलाधिकारी कार्यरत महिला आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल का निलंबन अब समाजवादी पार्टी के लिए ही गले का घाव बनता जा रहा है ! निलंबन रद्द कराने एवं महिला आईएएस के समर्थन में सोनिया गाँधी द्वारा प्रधानमंत्री को पत्र लिखने के कारण यह मामला अब उत्तरप्रदेश की राजनीति से ऊपर उठता दिख रहा है ! निलंबन की पूरी प्रक्रिया को अगर शुरू से देखा जाय तो एक बात साफ़ तौर पर सामने आती है कि उत्तरप्रदेश की सत्तानशीं समाजवादी पार्टी सरकार ने इस पुरे मामले को राजनितिक रंग देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है ! इस बात में कोई संदेह नहीं कि भू-खनन माफियाओं के काली-कमाई के लिहाज से ग्रेटर नोएडा एवं नोएडा एक मलाईदार जगह है ! नोएडा क्षेत्र एक ऐसी जगह है जहाँ निजी कन्सट्रक्सन कंपनियों द्वारा भू-खनन के लिए दिये जाने वाले ठेकों में बड़े स्तर पर रेत आदि अवैध तरीके से बेचा जाता है और रातो-रात काली कमाई की जाती है ! वैसे तो ऐसी जगहों पर अपनी तैनाती के लिए अधिकारी वर्ग हर हथकंडा अपनाने को तैयार रहते है फिर भी अगर कोई ईमानदार अधिकारी इस क्षेत्र में गलती से आ जाए तो उसका भू-माफियाओं की नजर में खटकना लाजिमी है ! निलंबन के बाद आ रहे बयानों के आधार दुर्गाशक्ति नागपाल मामले में भी कुछ ऐसा ही होता प्रतीत होता दिख रहा है ! अपने ही द्वारा चले गए पैंतरों के उल्टा पड़ने के बाद कटघरे में खड़ी समाजवादी पार्टी की इस मामले में भूमिका एक तीर से दो-दो निशान करने वाली रही है ! दुर्गाशक्ति का निलंबन कर समाजवादी पार्टी सरकार ने एक तरफ जहाँ भू-खनन माफियाओं को राहत देने का काम किया है तो वहीँ दूसरी तरफ इसे एक वर्ग विशेष की हिमायत से जोड़कर तुष्टिकरण की सियासत करने का भी काम किया है ! इस निलंबन के बाद सरकार के तरफ से शुरुआत में दिये गए तर्कों से यह साफ़ तौर पर स्पष्ट होता है कि सरकार एक खास वर्ग को यह संकेत देना चाहती थी कि यह सारा निलंबन उन्ही के हितों में किया गया है ! जबकि निलंबित अधिकारी ने अपने जवाब में साफ़ तौर पर कहा है कि जिस मस्जिद की दीवार गिराए जाने को लेकर उनका का निलंबन किया गया, उस दीवार को उन्होंने नहीं बल्कि ग्रामीणों ने खुद ही आपसी सहमति से गिरा दिया था और कहीं कोई विवाद आदि नहीं हुआ था ! इसमें कोई दो राय नहीं कि उत्तरप्रदेश में वर्ग विशेष के तुष्टिकरण की सियासत करने वाली समाजवादी पार्टी द्वारा इस मामले को भी बेवजह सियासी रंग देकर अपनी तुष्टिकरण की राह पुख्ता की जा रही है ! सवाल उठता है कि अगर वह दीवार गिरने से साम्प्रदायिक सदभाव बिगड़ सकता था तो इसकी सूगबुगाहट तक क्यों नहीं हुई अथवा किसी समुदाय द्वारा अधिकारी के निलंबन की मांग क्यों नहीं की गयी ? इस मामले में ज्यादा आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि सरकार की कृपा से मंत्री का दर्जा पाकर घूम रहे नरेंद्र भाटी द्वारा इस मामले को इतने त्वरित स्तर पर संज्ञान में कैसे ले लिया गया और मात्र चालीस मिनट में निलंबन का आदेश करा लिया गया ! नरेंद्र भाटी का यह कहना आज सरकार के गले की हड्डी बन गया है कि मैंने मात्र चालीस मिनट में इस अधिकारी का निलंबन करा दिया,यही लोकतंत्र की ताकत है ! बड़ा सवाल ये है कि अगर वाकई वहाँ सामाजिक सदभाव बिगड़ सकते थे तो यह मामला जिलाधिकारी तक पहुचने से पहले मुख्यमंत्री तक कैसे पहुच गया जबकि जिलाधिकारी मौके पर भी नहीं पहुचे थे ! जबकि स्थानीय जिलाधिकारी अपनी रिपोर्ट में दुर्गाशक्ति नागपाल को क्लीन चीट दे चुके हैं, लेकिन सरकार उस रिपोर्ट को मानने को तैयार नहीं दिख रही ! निश्चित तौर पर सरकार की तरफ से दिये जाने वाले बयानों के पेंच इतने ढीले हैं कि मामला साफ़ तौर पर समझा जा सकता है ! इस पुरे मामले में सिवाय तुष्टिकरण की राजनीति और भू-माफियाओं को प्रश्रय देने के अलावा और कुछ नहीं किया गया है !
दैनिक जागरण में प्रकशित
     राजनितिक चश्मे से अगर देखा जाय तो आगामी लोकसभा चुनाव के लिहाज से समाजवादी पार्टी द्वारा एक बार फिर ऐसे संकेत दिये जाने की पहल शुरू हो चुकी है कि वो एकमात्र ऐसी पार्टी है जो अल्पसंख्यकों की हिमायती है ! चुकि उत्तरप्रदेश में मुस्लिम वोटर्स पर हमेशा से समाजवादी पार्टी की नजर रही है और कांग्रेस के पारम्परिक मुस्लिम वोटबैंक को तोड़ने का काम भी समाजवादी पार्टी ने ही किया है ! अत: लोकसभा चुनाव को देखते हुए दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन जैसे मामलों को तुल देकर सरकार अपना संदेश देने का काम कर रही है ! हालाकि दुर्गाशक्ति मामले में सरकार के पैतरें उसी के गले का घाव बन चुके हैं क्योंकि सरकार के इस पैतरें के खिलाफ खुद मुस्लिम संगठन ही खड़े हो चुके हैं ! दारुल उलूम ने तो साफ़ तौर पर कहा है कि समाजवादी पार्टी मुस्लिमों को अपने राजनीति का ढाल बनाने का प्रयास ना करें क्योंकि मुस्लिम समुदाय सब समझने लगा है ! हालाकि यूपीए की चेयरमैन सोनिया गाँधी ने इस मामले को संज्ञान में जरुर लिया है लेकिन अभी भी केन्द्र सरकार इस पर कुछ परिणामी कार्यवाही करेगी,ऐसा होता नहीं दिख रहा है ! चुकि, मामला मुस्लिम वोटबैंक का है तो कांग्रेस भी अपने कदम फूंक-फूंक कर ही उठाना चाहेगी ! गौरतलब है कि सोनिया गाँधी का यह पत्र तब लिखा गया जब उत्तरप्रदेश के मुस्लिम संस्थाओं की तरफ से समाजवादी पार्टी का विरोध किया गया ! अत: कांग्रेस इस बात को जरुर प्रचारित करना चाहेगी कि इस पुरे मामले में समाजवादी पार्टी सिवाय मुस्लिम वोटर्स को लुभाने के और कूछ नहीं कर रही ! दरसल, उत्तप्रदेश सरकार को बखूबी पता है कि यह रमजान का पाक महीना चल रहा है ऐसे में इन मामलों को तूल देना ज्यादा मुश्किल नहीं है ! कुल मिलाकर अगर देखा जाय तो निलंबन के बहाने अपनी राजनीति को पुख्ता करने में लगी समजवादी पार्टी फिलहाल अपने ही बयानों में फंसती नजर आ रही है ! क्योंकि, निलंबित अधिकारी दुर्गाशक्ति ने मुख्य सचिव को लिखे पत्र में साफ़ कहा है कि दीवार मैंने नहीं बल्कि ग्रामीणों ने खुद सहमति से गिरा दी ! वहीँ दूसरी तरफ विपक्ष भी पुरे मामले पर अपना विरोध जता रहा है ! निलंबन से सम्बंधित नूतन ठाकुर द्वारा दायर एक याचिका पर हाईकोर्ट की तरफ से बेशक इस निलंबन पर कोई टिप्पणी न की गयी हो लेकिन कोर्ट द्वारा भी भ-खनन की समस्या को संज्ञान में लिया गया है ! फिलहाल मामला जो भी हो लेकिन इतना तो तय है कि उत्तरप्रदेश सरकार अपने सियासी लाभ के लिए निलम्बन के बहाने तुष्टिकरण की सियासत कर रही है ! समजवादी पार्टी के चाल-चरित्र के बारे में यह शेर काफी प्रासंगिक नजर आता है कि “सियासत में जरूरी है रवादारी,समझता है, वो रोज़ा तो नहीं रखता मगर इफ्तारी समझता है !!
 
जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित

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